महज 30 रुपए में नेताओं की आरसी डाउनलोड होने का दावा: मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्री तक के वाहनों की जानकारी का खुलासा
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
समग्र पोर्टल से जुड़े डेटा सुरक्षा के सवालों के बीच अब सरकारी परिवहन डेटा की गोपनीयता को लेकर भी गंभीर चिंताएं सामने आई हैं।
एक निजी वेबसाइट पर बिना स्पष्ट ऑथेंटिकेशन प्रक्रिया के वाहन की रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (RC) डाउनलोड होने का दावा किया गया है।
पड़ताल में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री, मंत्रियों और केंद्रीय मंत्री समेत कई सार्वजनिक हस्तियों से जुड़े वाहनों की RC उपलब्ध होने की बात सामने आई।
गोपनीयता और सुरक्षा कारणों से वाहन नंबर, चेसिस नंबर, इंजन नंबर, बैंक और अन्य निजी विवरण यहां सार्वजनिक नहीं किए जा रहे हैं।
30 रुपए में RC डाउनलोड होने का दावा
पड़ताल के मुताबिक संबंधित वेबसाइट पर वॉलेट सिस्टम के जरिए अलग-अलग सेवाओं के लिए भुगतान किया जाता है। इनमें वाहन संबंधी सेवाएं भी शामिल हैं।
जांच के दौरान एक RC के लिए करीब 30 रुपए का भुगतान किया गया और दस्तावेज डाउनलोड होने का दावा किया गया।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि इस प्रक्रिया में सरकारी परिवहन विभाग की आधिकारिक व्यवस्था जैसी मालिक की पहचान, इंजन नंबर और OTP आधारित सत्यापन प्रक्रिया नजर नहीं आई।
चुनावी हलफनामों से मिले वाहन नंबरों से की गई पड़ताल
पड़ताल में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध चुनावी हलफनामों और अन्य स्रोतों से वाहन संबंधी जानकारी जुटाई गई। इन जानकारियों के आधार पर वेबसाइट पर वाहनों की जांच की गई।
दावा है कि कई मामलों में संबंधित वाहन की RC स्क्रीन पर उपलब्ध हो गई और उसे डाउनलोड भी किया जा सका।
इससे सवाल उठता है कि यदि किसी व्यक्ति के वाहन का नंबर सार्वजनिक स्रोत से मिल जाए, तो क्या उसकी RC और उसमें मौजूद निजी जानकारी तक कोई अनधिकृत व्यक्ति पहुंच सकता है?
CM मोहन यादव की कार की RC उपलब्ध होने का दावा
पड़ताल में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से जुड़ी निजी कार की RC भी उपलब्ध होने का दावा किया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक वाहन नंबर दर्ज करने के बाद RC डाउनलोड हो गई। डाउनलोड किए गए दस्तावेज में वाहन से संबंधित कई जानकारियां दिखाई देने का दावा है। इनमें चेसिस और इंजन नंबर जैसी सूचनाएं भी शामिल हैं।
हालांकि, व्यक्तिगत गोपनीयता को ध्यान में रखते हुए ऐसे संवेदनशील विवरणों को सार्वजनिक नहीं किया गया है।
परिवहन मंत्री और अन्य मंत्रियों के वाहनों की भी जांच
पड़ताल में मध्यप्रदेश के परिवहन मंत्री राव उदय प्रताप सिंह से जुड़े दो वाहनों की RC उपलब्ध होने का दावा किया गया है।
इसी तरह तकनीकी शिक्षा एवं आयुष मंत्री इंदर सिंह परमार से जुड़े वाहन की RC भी वेबसाइट के माध्यम से डाउनलोड होने की बात सामने आई है। इन मामलों में भी RC में मौजूद निजी और तकनीकी जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया गया है।
नितिन गडकरी से जुड़े वाहनों तक पहुंच का दावा
यह पड़ताल मध्यप्रदेश से आगे बढ़ाकर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से जुड़े वाहनों तक की गई। रिपोर्ट के मुताबिक उनके नाम से जुड़े कई वाहनों की RC भी वेबसाइट पर उपलब्ध हो गई।
इससे मामला और गंभीर हो जाता है, क्योंकि यदि अलग-अलग राज्यों में पंजीकृत वाहनों का डेटा एक ही प्लेटफॉर्म से हासिल किया जा सकता है, तो सवाल केवल मध्यप्रदेश के परिवहन विभाग तक सीमित नहीं रह जाता।
RC में कौन-कौन सी जानकारी होती है?
RC महज वाहन का नंबर बताने वाला दस्तावेज नहीं है। इसमें वाहन की पहचान और स्वामित्व से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां होती हैं।
कुछ मामलों में इसमें वाहन का रजिस्ट्रेशन विवरण, चेसिस और इंजन से संबंधित जानकारी, वाहन मालिक से संबंधित विवरण, वाहन के फाइनेंस से जुड़ी जानकारी, वाहन की श्रेणी और तकनीकी विवरण, जैसी सूचनाएं शामिल हो सकती हैं।
ऐसे डेटा तक अनधिकृत पहुंच होने पर पहचान की नकल, फर्जी दस्तावेज तैयार करने या वाहन संबंधी धोखाधड़ी जैसे जोखिम बढ़ सकते हैं।
सरकारी व्यवस्था में OTP आधारित सत्यापन
परिवहन विभाग की आधिकारिक व्यवस्था में RC से जुड़ी सेवाओं के लिए निर्धारित सत्यापन प्रक्रिया अपनाई जाती है।
वाहन संबंधी जानकारी दर्ज करने के साथ कई मामलों में इंजन नंबर और OTP जैसे अतिरिक्त सत्यापन की आवश्यकता होती है।
ऐसे में यदि कोई निजी प्लेटफॉर्म बिना पर्याप्त सत्यापन के वही दस्तावेज उपलब्ध करा रहा है, तो यह जांच का महत्वपूर्ण विषय बन जाता है कि उसके पास डेटा कहां से आया और उसे किस आधार पर उपलब्ध कराया जा रहा है।
RTO से जवाब लेने की कोशिश, नहीं मिला आधिकारिक पक्ष
मामले में संबंधित परिवहन अधिकारियों से संपर्क कर उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया। जबलपुर RTO अधिकारी से संपर्क नहीं हो सका।
फोन पर संपर्क का प्रयास किया गया और संदेश भी भेजा गया, लेकिन रिपोर्ट तैयार होने तक जवाब प्राप्त नहीं हुआ। विभाग का आधिकारिक पक्ष मिलने के बाद उसे भी रिपोर्ट में शामिल किया जाना जरूरी होगा।
वेबसाइट का पता सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?
पड़ताल में जिस निजी वेबसाइट का इस्तेमाल किए जाने का दावा किया गया है, उसका पता सार्वजनिक नहीं किया गया है।
इसके पीछे वजह यह है कि यदि वेबसाइट पर वास्तव में बिना पर्याप्त सत्यापन के संवेदनशील दस्तावेज उपलब्ध हैं, तो उसका सार्वजनिक प्रचार अनधिकृत लोगों को ऐसी सुविधा का गलत इस्तेमाल करने का अवसर दे सकता है।
जांच एजेंसियों की ओर से जानकारी मांगे जाने पर संबंधित साक्ष्य और तकनीकी विवरण उपलब्ध कराए जा सकते हैं।
मामला सिर्फ MP तक सीमित नहीं
पड़ताल में मध्यप्रदेश के अलावा दिल्ली और महाराष्ट्र में पंजीकृत वाहनों से संबंधित जानकारी भी उपलब्ध होने का दावा किया गया है।
यदि इसकी स्वतंत्र जांच में पुष्टि होती है, तो यह केवल किसी एक वेबसाइट या राज्य का मामला नहीं रहेगा, बल्कि देशभर के परिवहन डेटा की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर सवाल बन सकता है।
साइबर सुरक्षा के दावों की भी परीक्षा
सरकारें लगातार डिजिटल सेवाओं और साइबर सुरक्षा को मजबूत करने पर जोर दे रही हैं। ऐसे में किसी निजी प्लेटफॉर्म पर संवेदनशील सरकारी डेटा तक संभावित पहुंच की शिकायत की स्वतंत्र तकनीकी जांच जरूरी है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि निजी वेबसाइट के पास यह डेटा आया कहां से, उसे किस स्रोत से एक्सेस मिला और क्या संबंधित डेटा आधिकारिक सिस्टम से अनधिकृत तरीके से निकाला गया?
इन सवालों के जवाब तकनीकी ऑडिट और संबंधित एजेंसियों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे। फिलहाल उपलब्ध जानकारी को लेकर संबंधित विभाग और साइबर सुरक्षा एजेंसियों की प्रतिक्रिया का इंतजार है।
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