बचेगी अरावली पर्वतमाला: देश में जल-जंगल-जमीन बचाने की बहस हुई तेज, जनमानस उद्वेलित
Khulasa First
संवाददाता

अरावली की हरियाली के उजड़ने पर दिल्ली के रेगिस्तान बनने का मंडराया खतरा..!
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दिल्ली से राजस्थान तक सड़कों पर उतरे लोग
मध्य प्रदेश में भी जंगलों पर कटाई का मंडरा रहा बड़ा खतरा, सिंगरौली से चोरल तक हरियाली पर संकट
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
अरावली पर्वतमाला का विस्तार राजस्थान के उदयपुर जिले में है, जो दक्षिणी अरावली क्षेत्र का हिस्सा है और घनी व ऊंची पहाड़ियों के लिए जाना जाता है, जबकि इसका सबसे कम विस्तार अजमेर जिले में मिलता है। सुप्रीम कोर्ट के हाल के एक फैसले ने अरावली पहाड़ियों को लेकर पर्यावरणविदों और आम जनता के बीच बहस छेड़ दी है।
इस फैसले को ‘100 मीटर का फैसला' कहा जा रहा है, जिसमें यह साफ किया गया है कि अरावली इलाके में 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अपने आप ‘जंगल' के तौर पर क्लासिफाई नहीं किया जा सकता। ‘सेव अरावली ट्रस्ट' ने इस फैसले पर गंभीर चिंता जताई है। ट्रस्ट का कहना है कि हरियाणा में सिर्फ दो चोटियां ही 100 मीटर से ऊपर हैं एक तोसाम (भिवानी जिला) और दूसरी मधोपुरा (महेंद्रगढ़ जिला)। बाकी क्षेत्र अब संरक्षण से बाहर हो सकता है।
पर्यावरणविदों को चिंता
पर्यावरण पर चिंता करने वालों का मानना है कि इससे पूरे इकोसिस्टम को खतरा है। अरावली थार मरुस्थल की धूल को रोकती है। भूजल रिचार्ज करती है और जैव विविधता बनाए रखती है। अगर संरक्षण कमजोर हुआ तो धूल और प्रदूषण बढ़ेगा। दिल्ली में पहले से ही ये समस्या गंभीर है। भूजल स्तर गिरेगा, बोरवेल सूखेंगे। गर्मी अधिक तेज होगी। सांस संबंधी समस्याओं का इजाफा होगा। लोगों का पलायन हो सकता है। उद्योगपतियों को फायदा होगा। खनन और निर्माण आसान हो जाएगा।
पर्वतमाला न होगी तो दिल्ली क्षेत्र रेगिस्तान हो जाएगा
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली पर्वतमाला का महत्व उसकी ऊंचाई में नहीं, बल्कि उसके कार्यों में है। ये पर्वतमालाएं एक प्राकृतिक जल संग्रहण प्रणाली की तरह काम करती हैं, जहां इनकी पथरीली संरचना वर्षा के पानी को धीरे-धीरे भूमिगत रिसने देती है और जल-भंडारों को भर देती है।
ये जल-भंडार राजस्थान के कई कस्बों और दिल्ली, गुरुग्राम, फरीदाबाद व अलवर जैसे बड़े शहरों को पानी की आपूर्ति करते हैं। अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि बड़े पैमाने पर खनन और पर्वतमाला की कटाई से यह प्रक्रिया बाधित होती है, जिससे भूजल का दीर्घकालिक नुकसान होता है। अरावली पर्वतमाला थार रेगिस्तान के पूर्वी भारत की ओर फैलने की गति को धीमा करने में भी सहायक है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि पर्वतमाला को नुकसान पहुंचाना जारी रहा, तो दिल्ली व उसके आसपास मरुस्थलीकरण बढ़ सकता है।
विवाद की वजह क्या है?
नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की आधिकारिक पहचान के संबंध में केंद्र सरकार के एक प्रस्ताव से सहमति जताई। कोर्ट ने कहा नियामक उद्देश्यों के लिए केवल वे पहाड़ियां, जो आसपास की भूमि से कम से कम 100 मीटर ऊपर उठती हैं या एक-दूसरे के निकट स्थित ऐसी पहाड़ियों के समूह अरावली पर्वतमाला का हिस्सा माने जाएंगे। कोर्ट ने केंद्र सरकार को क्षेत्र का सावधानीपूर्वक मानचित्रण करने और इसके प्रबंधन के लिए एक स्पष्ट योजना तैयार करने के भी निर्देश दिए। इस योजना में यह नियम शामिल होंगे कि खनन कहां किया जाना है।
अरावली को लेकर भ्रम- यादव
केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने अरावली क्षेत्र में 100 मीटर की सुरक्षा सीमा को लेकर फैले भ्रम को दूर किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह सुरक्षा सीमा पहाड़ी के निचले आधार से मानी जाएगी, न कि पहाड़ी के ऊपर से। इस क्षेत्र में किसी भी तरह की खुदाई या गतिविधि की अनुमति नहीं होगी।
यह कदम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत उठाया गया है, जिसका उद्देश्य अरावली क्षेत्र में खनन पर सख्त और स्पष्ट नियम लागू करना है। यादव ने बताया अरावली को लेकर कानूनी प्रक्रिया कोई नई नहीं है। 1985 से इस मामले में याचिकाएं चल रही हैं। इनका मुख्य मकसद अरावली क्षेत्र में खनन के लिए कड़े और साफ नियम बनाना है।
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