घात-प्रतिघात: दतिया में भितरघात का शिकार हो गया ‘कमल’
KHULASA FIRST
संवाददाता

तीन राज्यों की तीन विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव से भाजपा चिंतन पर मजबूर
‘अपनों ने डुबोया-गैरों में कहां दम था’ की तर्ज पर भाजपा में आकर टिक गया दतिया उपचुनाव का परिणाम
पूरी ताकत झोंकने के बाद भी भाजपा के लिए विपरीत आए परिणाम से सदमे में संगठन-सरकार
कमल की हार पर आज सीएम हाउस में महत्वपूर्ण बैठक, प्रदेश अध्यक्ष ने चुनाव में लगे सभी नेताओं को किया तलब
भाजपा की अंतर्कलह से कांग्रेस की लगी लॉटरी, प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी का सूबे से लेकर दिल्ली तक बड़ा दबदबा
प्रशांत किशोर की जीत ने भाजपा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर चिंतन-मंथन की पैदा की स्थिति, बिहार में बदले समीकरण
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
उपचुनाव का नतीजा सिर्फ एक सीट का फैसला नहीं है, बल्कि यह भाजपा की पहली बड़ी चुनावी परीक्षा थी। दूसरी तरफ कांग्रेस भी ऐसा चुनाव लड़ रही थी, जहां अंतर्कलह चरम पर थी। उसे अपने पूर्व विधायक राजेंद्र भारती को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित तक करना पड़ा।
चुनाव प्रचार के आखिरी दिनों में कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने राजेंद्र भारती पर भाजपा के साथ मिलकर चुनाव प्रभावित करने की कोशिश का आरोप लगाया। दूसरी तरफ राजेंद्र भारती ने दावा किया कि घनश्याम सिंह के संबंध भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा से हैं।
यह लगातार दूसरी बार है जब दतिया विधानसभा सीट पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। उपचुनाव से विधानसभा में भाजपा के बहुमत पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इसके बावजूद दोनों दलों ने इस सीट पर पूरी ताकत झोंक दी थी।
मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष, मंत्रियों और संगठन के वरिष्ठ नेताओं ने चुनाव प्रचार किया। भाजपा ने इसे अपनी संगठनात्मक ताकत की परीक्षा की तरह लड़ा। दूसरी तरफ कांग्रेस ने स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ भाजपा की अंदरूनी कलह को भी चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की।
दतिया उपचुनाव की चर्चा नरोत्तम मिश्रा का नाम लिए बिना पूरी नहीं हो सकती। करीब तीन दशक तक दतिया की राजनीति में प्रभाव रखने वाले नरोत्तम मिश्रा को इस बार भाजपा ने टिकट नहीं दिया। उनकी जगह पहली बार चुनाव लड़ रहे आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया गया।
टिकट की घोषणा के बाद विरोध प्रदर्शन हुए, कुछ पदाधिकारियों ने इस्तीफा दिया और चुनाव प्रचार के दौरान नरोत्तम मिश्रा का भावुक होना भी चर्चा का विषय बना। हालांकि बाद में उन्होंने कार्यकर्ताओं से शांत रहने की अपील की और पार्टी उम्मीदवार के लिए चुनाव प्रचार भी किया। बावजूद इसके पूरे चुनाव के दौरान यह सवाल बना रहा कि क्या वर्षों से नरोत्तम मिश्रा के साथ काम करने वाला संगठन उतनी सहजता से नए उम्मीदवार के साथ खड़ा हो पाएगा?
सरकार पर परिणाम का असर नहीं, पर चिंतन जरूरी
उपचुनाव से सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं होगा, लेकिन भाजपा के लिए परिणाम ने चिंतन जरूरी कर दिया है। हालांकि दतिया सीट पर चुनावों का इतिहास बताता है कि यहां मुकाबला हमेशा कांटे का रहा है।
नरोत्तम मिश्रा भले ही कई बार इस सीट से चुनाव जीत चुके हों, लेकिन उनकी जीत का अंतर अधिकांश चुनावों में कम ही रहा। 2018 में भी मुकाबला बेहद करीबी रहा था। 2023 में तो वे हार गए। दतिया की राजनीति किसी एक नेता के प्रभाव से नहीं, बल्कि स्थानीय समीकरणों से संचालित होती रही है।
सबसे अधिक चर्चा पूर्व विधायक राजेंद्र भारती की भूमिका को लेकर रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनके समर्थकों का एक हिस्सा पारंपरिक मतदान पैटर्न से अलग गया, जिससे चुनावी समीकरण प्रभावित हुए। इस घटनाक्रम ने दोनों प्रमुख दलों की रणनीति पर असर डाला और परिणामों को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण कारक बन गया।
कांग्रेस का आत्मविश्वास चरम पर पहुंचा... कांग्रेस के लिए इस जीत को मोटिवेशनल बूस्टर के तौर पर देखा जा रहा है। अध्यक्ष जीतू पटवारी का कद न सिर्फ सूबे में, बल्कि दिल्ली दरबार में बढ़ जाएगा। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि दतिया में भाजपा की हार अहंकार और जनभावनाओं की अनदेखी का परिणाम है।
जनता ने यह संदेश दिया है कि लोकतंत्र में जनता से बड़ा कोई नहीं होता। सिंघार ने जीत का श्रेय दतिया के मतदाताओं के साथ समाजवादी पार्टी और चुनाव में सहयोग करने वाले कार्यकर्ताओं को भी दिया। लेकिन एक सवाल अभी अनुत्तरित है कि क्या कांग्रेस की जीत स्थानीय समीकरणों का नतीजा है या यह प्रदेश की राजनीति में बदलते माहौल का संकेत है?
दतिया से पटना तक भाजपा के लिए श्रावण का पहला सोमवार शुभ नहीं रहा। दतिया में पार्टी ढाई साल में दूसरी बार हार गई। यहां कमलदल ‘घात-प्रतिघात’ का शिकार होना बताया जा रहा है। पटना में तो पार्टी वो सीट हार गई, जो 1995 से अब तक नहीं हारी थी।
पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष व उनके परिवार की पहचान से जुड़ी सीट पर पार्टी को अब तक की सबसे बड़ी हार मिली और बिहार सहित देश की राजनीति में एक नए दल ‘सुराज’ का उदय भी हो गया। पार्टी के लिए सुकून सिर्फ अपने भरोसेमंद गुजरात से ही मिला।
तीन राज्यों की तीन विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में कमल सिर्फ प्रधानमंत्री के प्रांत में ही खिला। मध्य प्रदेश में सरकार की तमाम कोशिशें भितरघात का शिकार हो गईं। ‘दतिया के दद्दा’ के आंसुओं की नमी उपचुनाव के परिणाम को भी भिगो गई।
सरकार की सेहत पर उपचुनाव परिणाम कोई असर नहीं डालेंगे, लेकिन पार्टी इसे हलके में नहीं ले रही। आज ही, यानी मंगलवार को एक बड़ी बैठक सीएम हाउस में हार के कारणों को लेकर हो रही है। इसके बाद ‘भितरघातियों’ पर कार्रवाई तय मानी जा रही है।
कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार का चयन दतिया के मिजाज के अनुरूप किया...कांग्रेस ने दतिया के मिजाज के अनुरूप उम्मीदवार उतारा। घनश्याम सिंह पहले भी जनता का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और क्षेत्र में उनकी पहचान मजबूत मानी जाती है।
स्थानीय स्तर पर संगठन, जनसंपर्क और व्यक्तिगत प्रभाव के कारण मतदाताओं के बीच उनकी स्वीकार्यता से उन्हें चुनाव में बढ़त मिली। भाजपा ने इस उपचुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते हुए कई वरिष्ठ नेता और मंत्री चुनाव प्रचार में सक्रिय रहे, लेकिन इसका अपेक्षित लाभ उम्मीदवार को नहीं मिल सका।
स्थानीय स्तर पर मतदाताओं की अपेक्षाओं और मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठा न पाने के कारण भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा। यहां स्थानीय समस्याएं और क्षेत्रीय असंतोष भी महत्वपूर्ण भूमिका में रहे।
मतदाताओं ने विकास, जनसुविधाओं और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दी। यहां चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों के बजाय क्षेत्रीय परिस्थितियों के इर्द-गिर्द केंद्रित दिखाई दिया।
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