एक मुलाकात को बना दिया सनसनीखेज: नरेंद्र + नरेंद्र = मोहन
KHULASA FIRST
संवाददाता

एक नरेंद्र दूसरे नरेंद्र से क्या मिले मुलाकात रहस्यों से भर गई। 31 जुलाई से 4 अगस्त तक फिर 7 और 12 अगस्त तक हुई प्रदेश के अलग-अलग बड़े नेताओं की मुलाकात के राजनीतिक समीकरण मैं आखिरी परिणाम डॉ. मोहन यादव ही रहे। कल हुई एक ऐसी ही मुलाकात में विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्रसिंह तोमर की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई और इसका परिणाम भी मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के रूप में आया। यह परिणाम हमेशा धनात्मक ही रहता है, लेकिन प्रचारित ऋणात्मक निगेटिव नैरेटिव की तरह पेश किया जाता है यह जानते हुए कि प्रदेश सरकार और प्रदेश की राजनीति के सारे सूत्र पार्टी हाईकमान के हाथ में है। और यह भी स्पष्ट है मुख्यमंत्री हर मामले में हाईकमान की लाइन पर चलते हैं फिर भी लोग हैं कि मानते नहीं।
डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इस समय दतिया उपचुनाव को लेकर बासी कढ़ी में बार-बार उबाल लाया जा रहा है। दतिया का चुनाव मानो देश का चुनाव हो गया हो और चुनाव में हार देश के राष्ट्रीय भाजपा संगठन की हर हो गई हो ऐसा प्रचारित किया जा रहा है जबकि वास्तविकता कुछ और है।
यह चुनाव अपनी जगह है।इसके साथ ही कुछ और बड़े मुद्दे जैसे केंद्र की नीतियों के खिलाफ किसानों और छात्रों का आंदोलन हाईकमान के लिए चिंता का विषय है।
प्रदेश सरकार और संगठन को समय रहते चाक-चौबंद करने के लिए प्रधानमंत्री प्रदेश के अलग-अलग नेताओं से रायशुमारी करते प्रतीत हो रहे हैं। बताते हैं यह सब मुख्यमंत्री की जानकारी में हो रहा है। तोमर हो या शिवराज, मुख्यमंत्री के भरोसेमंद सलाहकार के रूप में केंद्र के मार्गदर्शन में सरकार और संगठन की बेहतरीन के लिए काम कर रहे हैं।
यह बात सभी जानते हैं। जो मुख्यमंत्री से निजी कारण से नाराज बताए जाते हैं, उन्हें भी मालूम है कि सारी मुलाकातें मुख्यमंत्री को कमजोर करने के लिए नहीं वरन ताकत देने के लिए है। फिर भी इनका दिल है कि मानता नहीं और बार-बार मोहन को टारगेट बनाने के प्रयास होते हैं हालांकि इन सब का कोई वजूद नहीं है।
प्रधानमंत्री ले रहे हैँ फीडबैक
फिलहाल अनुमान है मोदी समय रहते चुनौतियों का समाधान करना चाह रहे हों, जो अचानक प्रकट हुई है चाहे वह किसान आंदोलन हो या छात्र आंदोलन हो या चुनाव में हार और भाजपा सरकारों से जनता का मोहभग होना साथ में परिसीमन आदि विषय पर अनुसंधान और समाधान मोदी के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रधानमंत्री प्रदेश की राजनीतिक स्थिति, सरकार-संगठन के तालमेल और वरिष्ठ नेताओं के बीच संतुलन पर फीडबैक ले रहे है इसमें कोई दो मत नहीं। इसी तारतम्य में डॉ. मोहन यादव सरकार के कामकाज, राजनीतिक स्वीकार्यता, संगठन के साथ समन्वय और आगे की चुनौतियों पर वरिष्ठ नेताओं से राय ली जा रही हो।
कृषि, अमेरिका से ट्रेड डील और किसान आंदोलन भी केंद्र सरकार की चिंता के विषय हैं इसलिए भारत-अमेरिका व्यापार व्यवस्था, कृषि बाजार, एमएसपी , दलहन-तिलहन और देश के साथ मध्य प्रदेश के किसानों आंदोलन पर संभावित प्रभाव जैसे विषयों पर तोमर के अनुभव और सुझाव पर भी चर्चा की गई होगी क्योंकि तोमर देश के कृषि मंत्री रह चुके हैं। खेती-किसानी से जुड़े विषयों का उन्हें गंभीर गहरा अनुभव है इसलिए उनकी इन मामलों में सलाह मायने रखती है।
शिवराजसिंह चौहान के साथ प्रधानमंत्री के संवाद के बाद नरेंद्रसिंह तोमर से अलग मुलाकात को केवल शिष्टाचार भेंट मान लेना भी राजनीतिक रूप से मेल-मुलाकातों का अधूरा विश्लेषण होगा। असली महत्व इस बात का है प्रदेश के दो अनुभवी और प्रभावशाली नेताओं से प्रधानमंत्री का सीधा संवाद एक ही समय मे हो रहा है।
दूसरी और जैसा कि होता है इस तरह की मुलाकातों से मोहन विरोधियों को फिर मौका मिल गया और मुलाकात को सनसनीखेज बनाने में जी:जान से लग गए। इस मुलाकात की तस्वीरें सोशल मीडिया पर काफी साझा की गईं, जिसके बाद से राजनीतिक हलकों में कयासों का दौर शुरू हो गया है।
मोहन विरोधी फिर सक्रिय नजर आ रहे हैं। यहां तक फेंकी जा रही है कि मोदी ने तोमर से मोहन यादव के नेतृत्व पर असंतोष या मुख्यमंत्री बदलने को लेकर चर्चा की। अब इस बात पर तो न खुद शिवराज न वीडी शर्मा न ज्योतिरादित्य सिंधिया न कैलाश बाबू और न ही प्रहलाद पटेल और बाकी वे सब इनकी टोली के संघ और संगठन के नेता कुछ बोल सकते हैं।
वैसे भी मोदी के मन की बात को जानना-समझना-बूझना बहुत कठिन है उनके मन की बात को संघ प्रमुख बीते एक दर्जन बरस में नहीं समझ पाए न संगठन न करीबी समझ पाते हैं। यहां तक कि मोटा भाई तक कई बार गच्चा खा जाते हैं। लेकिन इन सबसे मोहन प्रभावित नहीं होते यह सब जानते हैं।
इसलिए कहा जाता है कि चतुर राजनीति प्रदेश के लोगों को ध्यान मूल मुद्दे से हटाकर शिगुफे बाजी के काम से लगाए रखती है। ऐसे में डॉ. मोहन यादव को लेकर बार-बार हवा में तीर चलाना बचकानापन ही कहा जा रहा है।
विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्रसिंह तोमर बड़े कद के नेता हैं। केंद्र में मंत्री रहने के साथ-साथ पार्टी के राष्ट्रीय संगठन में कई बड़े चुनाव और जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं, इसलिए देश के अन्य राज्यों (जैसे उप्र और अन्य चुनावी राज्यों) में भाजपा के प्रदर्शन, सांगठनिक सुदृढ़ता और आगामी राजनीतिक रणनीतियों पर भी इस दौरान बात की गई होगी।
कैलाश विजयवर्गीय और प्रह्लाद पटेल से प्रधानमंत्री ने बात नहीं की। विजयवर्गीय जरूर अमित शाह से मिले थे। यही इस घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प राजनीतिक पहलू है। यदि प्रधानमंत्री का उद्देश्य प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं से व्यापक राजनीतिक फीडबैक लेना होता, तो कैलाश विजयवर्गीय, प्रह्लाद पटेल, वीडी शर्मा अथवा अन्य वरिष्ठ नेताओं से भी संवाद संभव था लेकिन इनमे से किसी नेता को प्रधानमंत्री ने नहीं बुलाया।
मुलाकातों का राजनीतिक संदेश
प्रदेश भाजपा में फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न मुख्यमंत्री परिवर्तन नहीं, बल्कि सरकार, संगठन और वरिष्ठ नेताओं के बीच संतुलन है। मोदी–शिवराज और मोदी–तोमर संवाद को इसी व्यापक संदर्भ में देखना ज्यादा उचित होगा।
शिवराजसिंह चौहान के पास प्रदेश की राजनीति और किसान राजनीति का लंबा अनुभव है, जबकि तोमर के पास संगठन, केंद्र सरकार, कृषि और विधानसभा, चारों स्तरों का अनुभव है। ऐसे में दोनों नेताओं से अलग-अलग बातचीत का एक संभावित उद्देश्य प्रदेश की राजनीतिक स्थिति पर स्वतंत्र और वरिष्ठ फीडबैक हासिल करना हो सकता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है तोमर विधानसभा अध्यक्ष होने के कारण सीधे सरकार चलाने की भूमिका में नहीं हैं इसलिए यदि प्रधानमंत्री ने उनसे राजनीतिक स्थिति पर राय ली है तो वह अपेक्षाकृत स्वतंत्र संवैधानिक पद पर बैठे वरिष्ठ भाजपा नेता की दृष्टि से फीडबैक लेने की कवायद मानी जा सकती है।
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