आस्था का सफर प्रकृति के सम्मान के साथ: देवभूमि की पवित्रता बचाने और पर्यावरण संरक्षण की ओर
KHULASA FIRST
संवाददाता

चारधाम यात्रा में बढ़ रही पर्यावरण चेतना; श्रद्धालुओं ने दिए सुझाव बोले- आस्था के साथ प्रकृति का संरक्षण भी जरूरी
खुलासा फर्स्ट, देहरादून/बद्रीनाथ।
उत्तराखंड की चारधाम यात्रा इस समय अपने चरम पर है। लाखों श्रद्धालु बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम पहुंच रहे हैं। इसी बीच यात्रा मार्गों और तीर्थस्थलों पर बढ़ते प्लास्टिक कचरे, भीड़ और पर्यावरणीय दबाव को लेकर श्रद्धालुओं ने चिंता जताई है। कई यात्रियों का मानना है कि आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी प्राथमिकता देना समय की आवश्यकता है।
पर्यावरण बचाने की शुरुआत नागरिकों से...कर्नाटक के बेलगाम से बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालु श्रीधर का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि लोगों की आदतों से भी जुड़ा हुआ है।
उनके अनुसार बच्चों को स्कूल स्तर से ही नदियों, पहाड़ों और प्राकृतिक संसाधनों के महत्व के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि नई पीढ़ी को बचपन से पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार बनाया जाए तो भविष्य में प्रदूषण और कचरे जैसी समस्याओं को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
‘जो कचरा लेकर जाएं, वापस भी लाएं’...मध्यप्रदेश के डबरा निवासी हर्षित गुप्ता ने चारधाम यात्रा में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया।
उनका कहना है कि यात्री अपने साथ लाए गए प्लास्टिक, बोतलें और अन्य कचरे को वापस अपने साथ लेकर लौटें। उन्होंने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में कचरे का निस्तारण आसान नहीं होता।
ऐसे में ‘कैरी इन, कैरी आउट’ यानी जो सामान साथ लेकर जाएं, उसका कचरा भी वापस लेकर आएं, जैसी व्यवस्था को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
क्या तय होनी चाहिए यात्रियों की संख्या?...कानपुर निवासी और पेशे से चिकित्सक डॉ. आयुष पांडे का मानना है कि चारधाम जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की एक सीमित वहन क्षमता होती है। यदि उससे अधिक संख्या में लोग पहुंचते हैं तो इसका सीधा असर पर्यावरण और स्थानीय संसाधनों पर पड़ता है।
उन्होंने सुझाव दिया कि यात्रा के दौरान प्रतिदिन आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए, ताकि प्राकृतिक संतुलन बना रहे और व्यवस्थाओं पर अत्यधिक दबाव न पड़े।
सीवर और कचरा प्रबंधन पर भी उठे सवाल...डॉ. आयुष पांडे की बहन मंजुला पांडे ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण में सरकार के साथ-साथ यात्रियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।
उन्होंने चारधाम क्षेत्रों में सीवर और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता बताई।
उनका कहना है कि बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आगमन से निकलने वाले अपशिष्ट का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन होना चाहिए, ताकि नदियों और जल स्रोतों पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े।
बद्रीनाथ में मौजूद है सीवेज ट्रीटमेंट सिस्टम... सरकारी आंकड़ों के अनुसार बद्रीनाथ क्षेत्र में सीवेज प्रबंधन के लिए बुनियादी ढांचा मौजूद है।
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा को भेजी गई रिपोर्ट के मुताबिक बामणी गांव में 0.26 एमएलडी क्षमता का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट संचालित है, जबकि सस्पेंशन ब्रिज क्षेत्र में 1 एमएलडी क्षमता का एसटीपी भी कार्यरत है।
हालांकि मंदिर परिसर के निकट स्थित एक छोटे एसटीपी का संचालन मास्टर प्लान के तहत चल रहे निर्माण कार्यों के कारण प्रभावित बताया गया है।
आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन की जरूरत... चारधाम यात्रा के दौरान सामने आए सुझाव यह संकेत देते हैं कि श्रद्धालु अब केवल दर्शन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हिमालयी पर्यावरण को लेकर भी संवेदनशील हो रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रशासनिक व्यवस्थाओं के साथ नागरिक जागरूकता को जोड़ा जाए तो चारधाम यात्रा को अधिक स्वच्छ, सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल बनाया जा सकता है।
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