जय श्री महाकाल: श्रावण की फुहारों में शिवमय हो उठती है महाकाल की नगरी उज्जैन...
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संवाददाता

काल के परे महाकाल, अवंतिका की माटी में श्रावण साधना और अनंत चेतना का पर्व; दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग और भस्म आरती के दर्शन, श्रावण में महाकाल आराधना, शून्य रेखा से मोक्षदायिनी शिप्रा तक, खगोलीय संधिकाल, भक्ति और प्रकृति के संरक्षण का अद्भुत संगम, समय चक्र के अधिपति, श्रावण सोमवार पर अकाल भय मुक्ति और शाश्वत शिवत्व की पावन यात्रा
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
ज ब गगन से श्रावण की बूंदें धरती का संताप मिटाने उतरती हैं, तब अवंतिका की फिजाओं में केवल एक ही गूंज सुनाई देती है-‘जय श्री महाकाल’। यह गूंज किसी साधारण नगर की नहीं, बल्कि मृत्युलोक के एकमात्र राजाधिराज भगवान महाकाल के द्वार की है।
सनातन विश्वास में महाकाल केवल पूजा के देवता नहीं हैं, वे समय का अनादि चक्र हैं, ब्रह्मांड की स्पंदन-ध्वनि हैं और उस अनन्त चेतना का नाम हैं जहां भौतिक जगत् का अहम् विलीन हो जाता है। सावन का पावन महीना आते ही इस प्राचीन धर्मनगरी का कण-कण शिवमय हो उठता है। महाकाल की आराधना मनुष्य को जीवन के समस्त तनावों और बंधनों से उबारकर परम शांति की ओर ले जाती है।
अवंतिका की माटी और महाकाल का अद्वितीय तादात्म्य... उज्जैन को यदि भारतीय आध्यात्म का केंद्रबिंदु कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। प्राचीन खगोलीय गणना और ज्योतिषीय परंपराओं में उज्जैन को शून्य रेखा और ब्रह्मांड का नाभि-स्थान माना गया है।
प्राचीन काल से ही जब समय का निर्धारण होता था, तो उज्जैन की स्थिति को ही मानक माना जाता था। इसीलिए समय के निर्धारण की इस भूमि पर स्वयं महाकाल अधिपति बनकर विराजे। यहां विराजमान महाकाल शब्द दो शब्दों के योग से बना है- महा अर्थात परम या विशाल, और काल अर्थात समय व मृत्यु। जो समय के चक्र को संचालित करते हैं और जो काल की सीमाओं से परे हैं, वही महाकाल हैं।
द्वादश ज्योतिर्लिंगों की पावन माला में उज्जैन के महाकालेश्वर इसलिए सबसे अलग और विशिष्ट हैं क्योंकि यह एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग हैं। परंपरा और शास्त्र में दक्षिण दिशा को काल, यम और मृत्यु की दिशा स्वीकार किया गया है। स्वयं महाकाल उस दिशा की ओर मुख करके विराजमान हैं, जिसका गूढ़ सांकेतिक अर्थ यह है कि जो भी साधक महाकाल की शरण में आता है, उसे मृत्यु, संकट, भय और अनहोनी छू भी नहीं पाती।
ब्रह्मांडीय संधिकाल और अवंतिका का खगोलीय स्वरूप... अवंतिका केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन वैज्ञानिक चेतना का भी प्रतीक है। प्राचीन खगोलशास्त्रियों के अनुसार कर्क रेखा और भूमध्य रेखा का कटान स्थल इसी क्षेत्र के आसपास माना जाता था।
उज्जैन का वराहमिहिर और राजा जयसिंह की वेधशालाओं से सीधा संबंध रहा है। सावन के महीने में जब सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करता है और वायुमंडल में आद्रता बढ़ती है, तब इस खगोलीय परिवर्तन का प्रभाव मानव शरीर और मन पर पड़ता है। ऐसे संधिकाल में महाकाल की पूजा और शिप्रा के शीतल जल से अभिसिंचित वातावरण मन को प्राकृतिक संतुलन और आत्मिक एकाग्रता प्रदान करता है।
श्रावण में महाकाल आराधना का आध्यात्मिक दर्शन एवं फल... श्रावण में प्रकृति जब नवजीवन का शृंगार करती है, तब भगवान शिव की उपासना इंसान के भीतर के मानसिक विकारों को धो डालती है। सावन में महाकाल की आराधना के तीन प्रमुख आध्यात्मिक आयाम माने गए हैं।
पहला आयाम अकाल मृत्यु और भय से मुक्ति है। माना जाता है कि जो प्राणी श्रावण में महाकाल का स्मरण, दर्शन और स्पर्श करता है, उसका अकाल संकट टल जाता है। जल और बिल्वपत्र का निष्काम अर्पण साधक के जन्म-जन्मांतर के संचित पापों का शमन करता है और जीवन में स्थिरता लाता है।
दूसरा आयाम भस्म दर्शन है, जो जीवन का अंतिम और कटु सत्य दिखाता है। महाकाल की प्रसिद्ध भस्म आरती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन का सबसे बड़ा दर्शन है। तड़के भस्म से होने वाला भगवान का दिव्य शृंगार यह निरंतर संदेश देता है कि यह नश्वर शरीर और भौतिक उपलब्धियां अंततः राख में तब्दील हो जाएंगी।
श्रावण में भस्म-लेपित शिव के दर्शन से व्यक्ति के भीतर का अहंकार, मोह और भय स्वतः समाप्त होने लगता है। तीसरा आयाम मानसिक शीतलता और चेतना का विस्तार है। श्रावण की ठंडी फुहारों के बीच महाकाल का जलाभिषेक करने से साधक का मन शांत और एकाग्र होता है। यह पूजा मनुष्य के भीतर विषमताओं और विकट परिस्थितियों को सहने का धैर्य जागृत करती है।
महाकाल की दिव्य वंदना...भगवान महाकाल के इस अनादि और अनन्त स्वरूप का ध्यान करते हुए उनके तीनों लोकों में विस्तार को इस प्रकार नमन किया गया है- आकाश लोक में तारक लिंग चमचमाता है, पाताल लोक में हाटकेश्वर विराजमान हैं और इस मर्त्यलोक यानी पृथ्वी पर संपूर्ण जीवों के कल्याण के लिए स्वयं महाकाल उपस्थित हैं।
तीनों लोकों के इन मुख्य ज्योतिर्लिंगों को मेरा बारंबार नमस्कार है। भगवान महाकाल के कालजयी स्वरूप का स्मरण करते हुए कहा गया है-जो समय से भी परे हैं, जो स्वयं काल का स्वरूप हैं, जो अपनी इच्छा से इस जगत् में विराट रूप धारण करते हैं तथा जो प्रकृति और तीनों गुणों के स्वामी हैं, उन भगवान महाकाल को सादर प्रणाम है।
मोक्षदायिनी शिप्रा और रुद्रसागर का सह-अस्तित्व...महाकाल की गाथा शिप्रा नदी के बिना अधूरी है। मान्यता है कि क्षिप्रा केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि अमृत मंथन के कणों से सिंचित मोक्षदायिनी नदी है। सावन के सोमवार को जब महाकाल की पालकी मंदिर से निकलती है, तो सबसे पहले उनका पड़ाव रामघाट पर शिप्रा के तट पर ही होता है।
वहां नदी के पावन जल से भगवान का अभिषेक किया जाता है। जल और शिव का यह संबंध प्रकृति के संरक्षण और ‘जल ही जीवन है’ के सनातन दर्शन को उजागर करता है। सावन माह ही क्यों अब तो तकरीबन पूरे वर्ष उज्जैन नगरी के मार्ग में हर दिन उमड़ता अपार जनसैलाब, हाथों में लहराती भगवा ध्वजाएं, डमरुओं की गूंज, हवा में उड़ता गुलाल और जय श्री महाकाल का गगनभेदी उद्घोष यह सिद्ध कर देता है कि महाकाल के दरबार में आकर संसार का हर संताप, चिंता और भय विलीन हो जाता है।
सावन में महाकाल की आराधना केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवन की अनित्यता को सहज स्वीकार कर शाश्वत शिवत्व में लीन होने की एक पावन और आनंदमयी यात्रा है। फिर से एक बार कहिये- जय श्री महाकाल।
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