तंत्र के मंत्र से भयमुक्त देश: जनतंत्र का जादू-मंतर; बच्चों ने तोड़ा सत्ता का अहंकार
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर विश्व विख्यात क्रांतिकारी वैज्ञानिक सोनम वांगचुक ने बीती रात अपना 26 दिन का अनशन समाप्त किया। वांगचुक के उपवास से देश के युवाओं को शक्ति मिली और उन्होंने देश को हाल फिलहाल तंत्र के भय से मुक्त कर दिया।
छात्रों के आंदोलन ने देशवासियों के भयभीत कर दिए गए मानस को भय से आजादी दिला दी। सरकारी तंत्र की गलत नीतियों के खिलाफ देश को मुखर कर दिया। बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषकों, रणनीतिकारों और मीडिया को भी आईना दिखाते हुए उनके सारे बड़बोले अनुमानों को युवाओं ने धूल चटा दी। बीते 12 वर्ष में सरकारों ने अपने सत्ता के कर्मकांडी मंत्र से देश को वशीभूत कर दिया।
तंत्र के मंत्र से अवाम में ऐसा डर पैदा किया कि सरकार और उसके संगठनों के बारे में किसी भी तरह की टीका-टिप्पणी, असहमति, आलोचना आदि पर सजा तय है, इसलिए देश में हर तरफ हर तरह के अन्याय के खिलाफ सन्नाटा छाया हुआ था।
सत्ता के दांव-पेंच इतने खतरनाक हो चुके हैं कि भ्रष्टाचार या न्याय के खिलाफ किसी भी तरह के आंदोलन की गूंज इस देश में नहीं बची है, ऐसा दृढ़ विश्वास बन गया था और इसके प्रमुख कारण भी बताए गए कि किस तरह से समाज और देश के हर स्तंभ की स्थिति ऐसी बना दी गई या बन गई है कि किसी भी तरह के बड़े आंदोलन की उम्मीद नहीं की जा सकती।
ये सारी धारणाएं और जनता के मन में बैठा डर विद्यार्थियों के आंदोलन की ताकत से दूर हो गया। सरकार को आखिर में मानना पड़ा देश वाकई उसके बच्चों और वांगचुक के साथ खड़ा है। यह सरकार की गलती रही कि वह देश के साथ खड़ी नहीं हो पाई।
सरकार ने यह सोचने की भी जरूरत नहीं समझी कि उसके अनुषंगिक संगठनों के निरंकुश और मनमानी करने वाले नेता-कार्यकर्ता वर्ग द्वारा राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के नाम पर देश को एक तरह से भयभीत किया जाता रहा।
क्या युवा और क्या बच्चे, सब के साथ सरकार और समाज स्तर पर विकट स्थितियां बनाई हुई हैं। ऐसे कई कारण रहे, जिनके आधार पर मान लिया गया कि सरकार राज्य में हो या केंद्र में, उसके आगे जनता अपना सिर नहीं उठा सकती और ऐसा करने वाले सफल भी नहीं हो सकते।
आखिर में सरकार की चाटुकारिता करते नजर आए वरिष्ठ पत्रकार वर्ग ने सरकार को यह भी संदेश दिया कि पिछली मनमोहन सरकार जैसी गलती मोदी सरकार न करे। ऐसा कहने वालों में अंग्रेजी के पत्रकार राजदीप जोर देकर कहते रहे कि अन्ना आंदोलन में सरकार ने अन्ना से संवाद किया, अपने मंत्री भेजे, इस कारण आंदोलन सफल हो गया और मनमोहन सरकार के खिलाफ जन आंदोलन खड़ा हो गया।
यानी मोदी सरकार भूलकर भी वांगचुक और विद्यार्थियों के आंदोलन को महत्व न दे। सोशल मीडिया और मुख्य धारा का मीडिया सरकार की जंजीरों में जकड़ा होने के बाद भी आंदोलन को जगह देने के लिए मजबूर हुआ। सरकार उसके मंत्रियों और उसके संगठनों को लेकर देशभर में आलोचनाएं, निंदा और प्रतिरोध खुलकर व्यक्त किया गया, जिसकी कल्पना तक नहीं थी।
इसका सबसे बड़ा फायदा विपक्ष को मिला। दिशाहीन, मुद्दाविहीन और लोक आवरण से सुरक्षित सरकारी तंत्र से लड़ने में विफल विपक्ष ने इस आंदोलन के प्रति अपना समर्थन देकर सकारात्मक भूमिका तो निभाई, साथ ही राजनीतिक जमीन मजबूत करने का अवसर भी हासिल किया।
इसलिए कहा जा सकता है कि 26 दिन का उपवास टूटने के साथ ही देश के युवा अपने देश को सत्ता तंत्र के भय से मुक्त करने में सफल हुए। बीते करीब 12 वर्षों से देश के जनतंत्र को तंत्र और उसके अनुषंगिक संगठनों ने एक अजीब से भय से जकड़ दिया था। सत्ता के साथ उसके संगठन के नेता, कार्यकर्ता और भाई साहब लोग व उनके सेवक का एक अजीब-सा खौफ देश के जनमानस में बैठाया हुआ है।
विश्व प्रसिद्ध और देश-दुनिया को बेहतर बनाने के लिए सर्वस्व बलिदान करने के लिए तत्पर, बहुमुखी प्रतिभा के धनी वैज्ञानिक और पर्यावरण के ज्ञाता सोनम वांगचुक देश की 140 करोड़ आबादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
अभी जाकर मुख्य धारा का कुछ-कुछ मीडिया और पब्लिक का सोशल मीडिया वर्ग उनकी बात करने लगा है। उनके समर्थन और आलोचना की बात हो रही है, लेकिन आंदोलन के उस मुद्दे की नहीं, जो देश का है। ऐसे विषय आंदोलन करने वालों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मुद्दा भारतीय जनता पार्टी हो या आरएसएस या फिर सत्तापक्ष के सारे जनप्रतिनिधि नेता, सबके परिवारों और उनके बच्चों से सरोकार रखता है, ऐसे विषय विपक्ष तक ही सीमित नहीं हैं।
सरकार पर किसी भी तरह की असहमति, आलोचनात्मक टीका-टिप्पणी करने वाले का नोटिस तत्काल लिए जाने से लोग मौन रहे। अब पूरे दर्जन बरस बीतने के बाद कहा जा रहा है कि देश भयमुक्त हो रहा है। जनता मुखर होने लगी है।
सोशल मीडिया पर खुलकर सरकार और उसके नेताओं की कड़ी आलोचना की जा रही है। बीते एक दशक से अधिक समय से देश और समाजहित की बात करने वाले सरकारी और प्रायोजित सामाजिक संचार माध्यमों द्वारा किए जाने वाले दमन से भयभीत रहे हैं। त्रिस्तरीय कवच वाली सरकार (संघ, संगठन और सत्ता) का खौफ छात्रों के आंदोलन से पूरी तरह टूटा नहीं है।
यह एक हद तक ही सही हो सकता है, क्योंकि विरोध के स्वर तो लगातार उठ ही रहे हैं। ऐसा भी नहीं है कि वांगचुक सरकार के खिलाफ राजनीतिक आंदोलन कर रहे हों। उनका विषय तो सरकार के सुशासन का है, जो सरकार के लिए ही हितकारी है, लेकिन इसमें सरकार और उससे जुड़े बहुआयामी संगठनों को अपना दूरगामी सत्ताहित कमजोर होने का अंदेशा बना लेता है, इसलिए सरकार के हित की बात को भी शत्रुवत भाव से दबाया जाता है। विश्लेषकों का समाजसेवा से जुड़े लोगों और बुद्धिजीवियों का मानना है कि यही कारण है तबीयत से पत्थर उछलने के बाद भी लहर पैदा नहीं होती। यानी जन आंदोलन खड़े नहीं होते। जो भी आंदोलन हो रहे हैं, वे सीमित इलाकों में हैं।
जनता हर तरह के संकट झेलने के लिए तैयार है, लेकिन आवाज उठाने के लिए नहीं और न ही उनके लिए संघर्ष या आंदोलन करने वालों के प्रति उनका कोई समर्पण नजर आता है। अमूमन यह स्थिति हर जगह है। नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुआ आंदोलन इसका ताजा उदाहरण है।
देश में गुस्से के बजाय अजीब-सी खामोशी है। पेपर लीक का विषय सीमित नहीं है। हर भारतीय परिवार और राष्ट्र के युवा भविष्य से जुड़ा हुआ है। देश का हर छोटा-बड़ा नागरिक, यहां तक कि गर्भस्थ शिशु से लेकर हर प्राणी मात्र हर पल, हर समय झेल रहा है। इन दो मुद्दों को लेकर वांगचुक अनशन पर रहे और उनकी हालत नाजुक होती गई।
उनके फिक्र करने वाले भी उनके बारे में जो कह रहे हैं, उसमें शब्दों का प्रयोग ठीक से नहीं किया जा रहा। दूसरा वर्ग वह है, जो दूर से बैठकर आंदोलन और आंदोलन कर रहे लोगों को लेकर टीका-टिप्पणी करता है। आंदोलन करने वालों की स्वीकार्यता पर सवाल खड़े करता है, बजाय इसके कि यह आंदोलन और अनशन देश के लिए है।
टीका-टिप्पणी करने वालों के परिवार और उनके बच्चों के लिए है। सोशल मीडिया के ऐसे वर्ग के लोग भीड़ की गिनती लगाने में ज्यादा रुचि लेते हैं, बजाय सवाल उठाकर सरकार को जवाबदेह बनाने के। इन तथ्यों के साथ बार-बार सवाल खड़ा होता है कि देश के मुद्दों पर संघर्ष करने वालों के साथ देश क्यों नहीं खड़ा हो पाया? कॉकरोच जनता पार्टी आंदोलन की पड़ताल तो यही कह रही है।
वांगचुक का अनशन अब तीसरे हफ्ते में पहुंच चुका है और सीजेपी का आंदोलन एक महीने से ज्यादा समय से जंतर-मंतर पर जारी है। फिर भी यह देशव्यापी जन-उभार में तब्दील नहीं हो पाया। पड़ताल से सामने आए तथ्य बताते हैं कि यह कमी अनिच्छा से ज्यादा संरचनात्मक कारणों से जुड़ी है।
सरकारी कार्रवाई का साया
आंदोलन को पहले भी दबाव का सामना करना पड़ा। मई में सीजेपी का एक्स अकाउंट खुफिया एजेंसी के इनपुट पर राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर ब्लॉक किया गया था, जिसे बाद में दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर 7 जुलाई को बहाल किया गया।
ऐसी कार्रवाइयां आम लोगों को खुलकर जुड़ने से हतोत्साहित कर सकती हैं। राजनीतिक दलों से। वांगचुक और दीपके दोनों ने बार-बार स्पष्ट किया कि यह किसी पार्टी का मंच नहीं है। उन्होंने भाजपा नेताओं को भी बिना पार्टी-झंडे के शामिल होने का न्योता दिया। यह गैर राजनीतिक रुख आदर्शवादी नैतिकता के रूप में मजबूत है, पर इससे भीड़ जुटाने वाली किसी संगठित पार्टी का साथ आंदोलन को नहीं मिल पाता।
आंदोलन की शुरुआत और उभार
सीजेपी की शुरुआत 16 मई 2026 को राजनीतिक संचार रणनीतिकार अभिजीत दीपके ने की थी, जब भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की एक टिप्पणी में बेरोजगार युवाओं को "तिलचट्टे’ कहे जाने पर देशभर में आक्रोश फैला था।
शुरुआती हफ्ते में ही आंदोलन को इंस्टाग्राम पर दो करोड़ से ज्यादा फॉलोअर और साढ़े तीन लाख से अधिक साइन-अप मिले। नीट-2026 पेपर लीक और सीबीएसई मार्किंग गड़बड़ी को लेकर शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए वांगचुक 28 जून से बिना अन्न ग्रहण किए बैठे और उनके साथ ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन के कुछ छात्रों ने भी उपवास किया।
समर्थन क्यों सीमित रह गया
मुख्यधारा मीडिया की अनदेखी। न्यूज लांड्री की एक रिपोर्ट में सवाल उठाया गया कि अगर यह सच में बड़ा युवा आंदोलन है, तो यह मुख्यधारा टेलीविजन पर लगभग अदृश्य क्यों है? यही रिपोर्ट बताती है कि समर्थकों के दावों के उलट, आंदोलन देशव्यापी जनसमर्थन जुटाने में अब तक नाकाम रहा है।
मुद्दे का व्यक्तिगत बनाम सामूहिक अनुभव
जयपुर से आए 22 वर्षीय समर्थक संतोष सिंह जैसे युवाओं की कहानियां भावनात्मक रूप से गहरी हैं। सिंह अपने उस भाई के लिए विरोध में शामिल हुए, जो परीक्षा रद्द होने के बाद मानसिक रूप से टूट गया था।
वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन जनता की उदासीनता से नहीं, बल्कि मीडिया की चुप्पी, प्रशासनिक दबाव, जानबूझकर बनाई गई गैर राजनीतिक पहचान और मुद्दे के सीमित प्रत्यक्ष प्रभाव, इन चार कारकों के मेल से जूझ रहा है।
युवाओं का गुस्सा असली है, जैसा कि ऑनलाइन समर्थन की शुरुआती लहर दिखाती है, पर उसे सतत, संगठित और देशव्यापी सड़क-आंदोलन में बदलने के लिए जो ढांचागत ताकत चाहिए- बड़े राजनीतिक दलों का खुला समर्थन, मुख्यधारा मीडिया कवरेज और सुरक्षा का भरोसा, मिलना जरूरी है और इससे भी ज्यादा देश को साथ में खड़ा होना होगा हर तरह के सत्ता से जुड़े प्रत्यक्ष और परोक्ष डर से, दमन से, तब असल में जनतंत्र का जादू मंत्र काम करेगा।
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