उत्तराखंड-गंगा-यमुना समेत 18 बड़ी नदियां गंदी: सीवर-टूरिज्म से बिगड़ी हालत
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, रुद्र प्रयाग।
उत्तराखंड में गंगा-यमुना समेत 18 नदियों पर किए गए एक रिसर्च में सामने आया है कि सीवर, कचरा, बढ़ता टूरिज्म और उद्योग नदियों की हालत बिगाड़ रहे हैं। देहरादून की रिस्पना की हालत सबसे खराब उदाहरणों में है, जहां 100 मिलीलीटर पानी में 24 लाख से ज्यादा मल वाले बैक्टीरिया मिले। वहीं नैनीताल की नंधौर पर करीब 73 उद्योगों के कचरे का दबाव सामने आया। गंगा, यमुना और कोसी में भी गंदे पानी और बढ़ती गतिविधियों का असर मिला है।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि अलकनंदा के पानी में प्लास्टिक के बेहद छोटे कण पहुंच चुके हैं। हरिद्वार की गंगा में मिले 49 तरह के बैक्टीरिया में 20 पर एक एंटीबायोटिक का असर नहीं हुआ। यानी नदियों की समस्या सिर्फ कचरे या गंदे पानी तक सीमित नहीं है, बल्कि पानी में ऐसी चीजें भी पहुंच रही हैं जो सीधे दिखाई तक नहीं देतीं।
देहरादून की रिस्पना नदी इस संकट की सबसे गंभीर तस्वीर पेश करती है। अध्ययन में रिस्पना में BOD यानी जैविक ऑक्सीजन मांग 390 मिलीग्राम प्रति लीटर तक दर्ज होने का उल्लेख है।
आसान भाषा में समझें तो नदी में जैविक गंदगी और मलजनित प्रदूषण का स्तर बेहद गंभीर है। अध्ययन में इसके प्रमुख कारणों में नदी के कैचमेंट क्षेत्र में बसी अनियोजित बस्तियां और बिना उपचार वाला सीवेज बताया गया है। पानी में क्षारीयता, कठोरता और TDS के अलावा सल्फेट, एल्युमिनियम, आयरन, मैंगनीज और कैडमियम जैसे तत्वों के भी मानकों से अधिक होने का उल्लेख किया गया है।
बिंदाल नदी में काले पानी की तस्वीर...देहरादून की बिंदाल नदी भी प्रदूषण के गंभीर दबाव में है। अध्ययन के मुताबिक नदी का पानी काला पड़ने और उसकी विषाक्तता बढ़ने जैसी स्थिति सामने आई है। कचरे से निकलने वाला लीचेट और शहरों का सीवेज नदी में पहुंचकर पानी की भौतिक-रासायनिक गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है।
रिस्पना और बिंदाल के मामले में शोधकर्ताओं ने खास तौर पर सीवेज, भारी धातुओं और घुले हुए ठोस पदार्थों के बढ़ते दबाव की ओर ध्यान दिलाया है। इसके पीछे नदी किनारे की आबादी, नगर निकायों का कचरा और पर्याप्त सीवेज ट्रीटमेंट व्यवस्था का अभाव प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
नंदाकिनी से गंगा तक बढ़ता दबाव...चमोली की नंदाकिनी नदी में अलकनंदा से मिलने से पहले टोटल कोलीफॉर्म और फीकल कोलीफॉर्म का प्रदूषण अधिक पाया गया। शोध में इसका संभावित कारण नदी किनारे बढ़ती अनियोजित आबादी बताया गया है।
हरिद्वार में गंगा पर धार्मिक और पर्यटन गतिविधियों का दबाव भी सामने आया है। एक अध्ययन में गंगा के पानी के जैविक विश्लेषण में 49 बैक्टीरियल आइसोलेट्स मिले, जिनमें से 20 इमिपेनेम एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोधी पाए गए। शोध में फीकल प्रदूषण को देखते हुए डाउनस्ट्रीम सीवेज ट्रीटमेंट को मजबूत करने की जरूरत बताई गई है।
यमुना-सोंग नदी पर पर्यटन और शहरीकरण का असर...देहरादून क्षेत्र में यमुना नदी की जल गुणवत्ता पर अनियंत्रित पर्यटन और पर्याप्त सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की कमी का असर बताया गया है। अध्ययन में TDS, टोटल कोलीफॉर्म, कठोरता और तापमान जैसे मानकों में बदलाव दर्ज किए गए। सोंग नदी में घनी आबादी और वाहनों से जुड़े प्रदूषण का असर सामने आया। नदी में जिंक, सीसा और तांबा जैसी भारी धातुओं की अधिक मात्रा दर्ज होने का उल्लेख है।
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