संवैधानिक संस्थाओं पर विश्वास का सच
KHULASA FIRST
संवाददाता

योगेंद्र योगी स्वतंत्र पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
अधिकारियों के साथ बैठक के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ने कथित तौर पर कहा कि चुनाव से पहले कानून और व्यवस्था बनाए रखने में किसी भी प्रकार की चूक बर्दाश्त नहीं की जाएगी और यदि अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों का ठीक से निर्वहन करने में विफल रहते हैं, तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी…
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी देश में लोकतांत्रिक सरकारों का अजीब इतिहास लिखने में जुटी हैं। पश्चिम बंगाल सहित देश के कई राज्यों में गैर भाजपा सरकारें हैं, किन्तु देश की संवैधानिक संस्थाओं और केंद्र सरकार के साथ जिस तरह का रवैया मुख्यमंत्री बनर्जी अपना रही हैं, उससे लगता यही है कि उन्होंने तय कर रखा है कि मुद्दा चाहे जैसा भी हो, हर हाल में टकराना है।
ममता की इस टकराहट से केंद्र सरकार के साथ रिश्ते कटु होते जा रहे हैं, साथ ही देश के लोकतंत्र को नुकसान पहुंच रहा है। मुख्यमंत्री बनर्जी के तौर-तरीकों से लगता यही है कि उन्हें शीर्ष अदालत के आदेशों की भी परवाह नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में एसआईआर के लिए झारखंड और ओडिसा के जिला न्यायालय के न्यायिक अधिकारियों को लगाया है, ताकि इस कार्रवाई में किसी भी पक्ष द्वारा पक्षपात का आरोप नहीं लगे।
इसके बावजूद ममता सरकार हस्तक्षेप से बाज नहीं आ रही है। मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार कोलकाता पहुंचे, उनके खिलाफ जमकर नारेबाजी की गई। साथ ही उनके विरोध में काले झंडे भी लहराए गए। मुख्य चुनाव आयुक्त कोलकाता के प्रसिद्ध कालीघाट मंदिर पहुंचे थे, वहां भी उनका विरोध किया गया।
प्रदर्शनकारियों ने ‘वापस जाओ’ के नारे लगाए। कोलकाता में करीब तीन जगहों पर विरोध प्रदर्शनों का सामना किया। विरोध प्रदर्शनों के बीच ज्ञानेश कुमार ने चुनावी राज्य में लाखों बंगाली भाषी नागरिकों का दिल जीतने की कोशिश की।
देश में इससे पहले ऐसा रवैया किसी भी राज्य की सरकार ने चुनाव आयोग के साथ नहीं अपनाया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अगले दो महीनों में होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारियों की समीक्षा के लिए वहां पहुंचे। सीएम ममता बनर्जी और अन्य टीएमसी नेताओं ने चुनाव आयोग पर एसआईआर के बाद मतदाता सूची से वोटर्स के नाम हटाने का आरोप लगाते हुए तीन दिन तक धरना दिया।
पश्चिम बंगाल में इस तरह की हरकतें तब हो रही हैं, जब सुप्रीम कोर्ट न्यायिक निगरानी में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण को अंजाम देने में जुटा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ममता सरकार के प्रति नाराजगी तक जाहिर कर चुका है।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के कई नेताओं की ओर से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को चुनौती दी गई। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को बार-बार कोर्ट न आने की सलाह दी थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने नाराज होकर पूछा, ‘क्या सुप्रीम कोर्ट के पास पश्चिम बंगाल के एसआईआर के अलावा सुनने के लिए कुछ और नहीं है?’
इससे पहले भी पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाने से जुड़े मामलों की सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश ने राज्य सरकार को फटकार लगाई थी। उन्होंने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सभी पक्षों को चेताया और कहा कि न्यायिक अधिकारियों पर सवाल उठाने की हिम्मत न करें। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि हमें पता था कि जैसे ही न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त किया जाएगा, आप लोग पीछे हट जाएंगे।
हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने हमें बताया कि 10 लाख मामलों का निपटारा हो चुका है। पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी से मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि ऐसे आवेदन दाखिल करने की हिम्मत कैसे हुई? मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि आपका आवेदन समय से पहले दायर किया गया है और इससे ऐसा लगता है कि आपको न्यायिक अधिकारियों पर भरोसा नहीं है।
पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने अदालत को बताया कि करीब 7 लाख दावों का निपटारा न्यायिक अधिकारियों ने किया है, जबकि पहले 63 लाख दावे विचाराधीन थे और अब करीब 57 लाख मामले शेष हैं। इस पर वरिष्ठ वकील गुरुस्वामी ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार न्यायिक अधिकारियों पर सवाल नहीं उठा रही है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि हो सकता है कि आपने सीधे तौर पर सवाल न उठाया हो, लेकिन आवेदन में सवाल उठते दिखते हैं। मुख्य न्यायाधीश के रूप में मैं इसे सहन नहीं करूंगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत को विश्वास है कि न्यायिक अधिकारी अपना काम ठीक से कर रहे हैं, लेकिन सावधानी के तौर पर राज्य सरकार को निर्देश दिया जाता है कि वह न्यायिक अधिकारियों के काम के लिए सभी आवश्यक सुविधाएं दें।
चुनाव आयोग यह सुनिश्चित करेगा कि कोई भी अनिवार्य कदम ऐसा न उठाया जाए जो इस प्रक्रिया को बाधित करे, जब तक कि उसे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अनुमति न मिल जाए। अदालत ने अपील की व्यवस्था पर भी स्पष्ट किया कि न्यायिक अधिकारी के फैसले के खिलाफ किसी प्रशासनिक निकाय के समक्ष अपील नहीं होगा।
इसके बजाय संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दो पूर्व हाईकोर्ट जज या मौजूदा हाईकोर्ट जजों की बेंच गठित कर सकते हैं, जो इन अपीलों पर सुनवाई करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि अधिकारियों को सभी जरूरी सुविधाएं दी जाएं। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग कोई भी ऐसा नियम लागू नहीं करेगा जिससे परेशानी हो।
अदालत की निगरानी में मतदाता सूची की पूरी प्रक्रिया संचालित होने के बावजूद ममता सरकार और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस चुनाव आयोग को लगातार निशाना बना रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता में एसआईआर के बाद मतदाता सूची से कथित मनमानी तरीके से नाम हटाए जाने के विरोध में चौथे दिन के धरने के दौरान भाषण दिया।
ममता ने कोलकाता में एक बैठक के दौरान पश्चिम बंगाल के अधिकारियों को धमकाने का आरोप लगाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त पर आरोप लगाया और कहा कि वह सुपरमैन और सुपर गॉड की तरह व्यवहार कर रहे हैं। सुश्री बनर्जी ने दावा किया कि श्री कुमार ने अधिकारियों को चेतावनी दी थी कि मई में विधानसभा चुनाव के बाद भी उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल के अधिकारियों को धमकियां दी गई हैं। साहस होना अच्छी बात है, लेकिन झूठी बहादुरी नहीं। अधिकारियों के साथ बैठक के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ने कथित तौर पर कहा कि चुनाव से पहले कानून और व्यवस्था बनाए रखने में किसी भी प्रकार की चूक बर्दाश्त नहीं की जाएगी, और यदि अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में विफल रहते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
धरने से तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ने भाजपा को चुनौती देते हुए कहा कि निष्पक्ष चुनाव के हित में भगवा पार्टी को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिन मतदाताओं के नाम अंतिम मतदाता सूची में हैं, उन्हें मतदान करने की अनुमति दी जाए। मुख्यमंत्री ने पार्टी सदस्यों से कहा कि वे भाजपा कार्यकर्ताओं को ‘पकड़ें’ और विरोध स्थल के पास कथित तौर पर पर्चे बांटने के आरोप में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करें।
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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