दवा से ज्यादा साहब के दस्तखत की कीमत: लालफीताशाही में फंसी बीमित श्रमिकों की जिंदगी
KHULASA FIRST
संवाददाता

नंदा नगर बीमा अस्पताल में 15 से 30 दिन तक भटक रहे कैंसर और किडनी के मरीज
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
कर्मचारी राज्य बीमा निगम में वेतन से हर महीने अंशदान देने वाले श्रमिकों के लिए अस्पताल का पर्चा दवा मिलने का साधन नहीं, बल्कि सरकारी प्रक्रियाओं का जाल बन चुका है। कैंसर और किडनी फेल जैसी जानलेवा बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को दवाओं के लिए हफ्तों सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटना पड़ रहे हैं।
सामान्य और निजी अस्पतालों में जीवनरक्षक व नियमित उपयोग वाली दवाओं का पर्याप्त अग्रिम भंडार रखा जाता है, ताकि पर्ची मिलते ही मरीज को दवा थमा दी जाए। इसके विपरीत नंदा नगर बीमा अस्पताल में हर मरीज के लिए दवा की अलग से खरीदी प्रक्रिया चलाई जाती है।
डॉक्टर के पर्चा लिखने के बाद फाइल बनाई जाती है, फिर वह दफ्तरों में घूमती है, श्रम आयुक्त के दस्तखत होते हैं, तब जाकर कंपनी को क्रय आदेश भेजा जाता है। इसके बाद जब कंपनी दवा भेजती है, तब मरीज को उपलब्ध कराई जाती है।
ऑनलाइन दावों के बीच कागजी फाइलों का जाल... अस्पताल प्रबंधन और केंद्रीय औषधि भंडार की इस संवेदनहीन कार्यप्रणाली से ऑनलाइन व्यवस्था के बड़े-बड़े दावों का खुलासा हो रहा है।
कंप्यूटर प्रणाली में मरीज का पूरा इतिहास, जांच रिपोर्ट, अंशदान रिकॉर्ड और डॉक्टर की पर्ची दर्ज होने के बावजूद मरीजों से कागजी दस्तावेजों के तीन-तीन सेट मांगे जा रहे हैं। मरीजों को दो-दो साल का वेतन रिकॉर्ड, अंशदान की पर्चियां, पहचान-पत्र और शुरुआती जांच रिपोर्ट लेकर दफ्तरों के चक्कर काटना पड़ रहे हैं।
अधिकारी के सेवानिवृत्त होने से बिगड़े हालात... 30 जून 2026 को स्टोर प्रभारी डॉ. चंद्रशेखर जायसवाल के सेवानिवृत्त होने के बाद स्थिति और विकट हो गई हैं। संभाग की श्रम आयुक्त शीतला पाटले के पास प्रभार है।
नंदा नगर स्थित केंद्रीय औषधि भंडार में जब बेबस मरीज और उनके परिजन दवा न मिलने का कारण पूछते हैं, तो कर्मचारी साफ कहते हैं श्रम आयुक्त कार्यालय से फाइल पर हस्ताक्षर नहीं हुए, इसलिए आदेश अटका है।
श्रमिकों के हक और त्वरित इलाज की मांग... इस पूरे मामले में अधिवक्ता नमन दुबे ने कहा है कि बीमित श्रमिक कोई खैरात या सरकारी मदद नहीं मांग रहे। श्रमिक अपनी गाढ़ी कमाई का अंशदान हर महीने जमा करते हैं, इसलिए समय पर और सम्मानजनक इलाज कानूनी अधिकार है।
जब सारा डेटा कंप्यूटर पर दर्ज है, तो मरीज को बार-बार अपनी पात्रता साबित करने के लिए मजबूर करना ऑनलाइन व्यवस्था के उद्देश्य को ही खत्म करता है।
गंभीर बीमारियों में 15 दिन का इंतजार खतरनाक
प्रशासनिक स्तर पर यदि यह मान भी लिया जाए कि नई व्यवस्था या नियमित अधिकारी आने के बाद प्रक्रिया 15 दिन में पूरी हो जाएगी, तो भी सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जिस कैंसर या किडनी के मरीज को डॉक्टर ने आज से ही नियमित दवा अनिवार्य की है, वह 15 दिन सांसों को कैसे रोके रखेगा? गंभीर बीमारियों में दवा का समय सरकारी फाइल की चाल के हिसाब से तय नहीं हो सकता।
आपात भंडार और त्वरित व्यवस्था की आवश्यकता
अभिभाषक नमन दुबे ने पूर्व में इस संबंध में श्रम मंत्री प्रह्लाद पटेल को पत्र भेजने के अलावा तत्कालीन स्टोर प्रभारी के समक्ष भी यह मुद्दा उठाया था। उन्होंने मांग की गंभीर मरीजों के लिए तत्काल प्रभाव से आपात भंडार रखा जाए और फाइलों की आवाजाही बंद कर तेज व्यवस्था लागू की जाए।
जब तक अग्रिम भंडार की नीति नहीं बनती, तब तक श्रमिकों का जीवन सरकारी फाइलों और हस्ताक्षरों के बीच ही फंसा रहेगा।
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