संस्था ने मेट्रो के लिए आरक्षित जमीन पर 20 प्लॉट काटकर बेचे
KHULASA FIRST
संवाददाता

पदाधिकारी दोषी, फिर भी एक साल से कार्रवाई नहीं, बिना रिकॉर्ड ऑडिट भी हो गया...
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
गांधी नगर हाउसिंग सोसायटी अध्यक्ष फूलचंद पांडे ने मेट्रो ट्रेन के लिए आरक्षित जमीन पर 20 प्लॉट काटकर बेच डाले। मामले की जांच सहकारिता विभाग के अंकेक्षक जीएस परिहार ने की और पांडे समेत पूरे संचालक मंडल को दोषी पाया।
आश्चर्य है कि करीब एक वर्ष बीतने के बाद भी उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। विभाग के पास संस्था का रिकॉर्ड ही मौजूद नहीं है फिर भी उपायुक्त मनोज जायसवाल दावा करते हैं कि संस्था का ऑडिट करवा लिया गया है। ये चमत्कार कैसे हुआ, कोई बताने की स्थिति में नहीं है।
शासन ने संस्था को 441 एकड़ भूमि लीज पर दी थी। संस्थाध्यक्ष फूलचंद पांडे और उसके संचालक मंडल ने जमीनों की मनमानी अफरा-तफरी की। तमाम शिकायतों के बाद जब सहकारिता विभाग के अंकेक्षक जीएस परिहार ने जांच की तो पाया कि भूखंडों का आवंटन सहकारी अधिनियम और संस्था की उपविधियों के विपरीत किया गया।
सदस्यता सूची में छेड़छाड़ कर अपात्र लोगों को प्लॉट दे दिए गए। चौंकाने वाली बात यह है कि वर्ष 2004 में जिस जमीन पर रजिस्ट्री रोकने के आदेश दिए गए थे, उसी भूमि पर बाद के वर्षों में प्लॉट काटकर पांडे और उसके साथी बेचते रहे। इसमें मेट्रो ट्रेन के लिए 2.68 हेक्टेयर जमीन भी शामिल थी, जिस पर पांडे ने कब्जा कर लिया था।
बाद में मेट्रो ट्रेन के लिए 2.10 हेक्टेयर जमीन पर ही कब्जा लिया गया और बाकी की 0.518 हेक्टेयर जमीन को पांडे ने बेच खाया। इसी पर उसने 20 प्लॉट काटे और बेच दिए। यह जमीन नजूल ने प्रकरण क्रमांक 0027/अ-20 (30)/2021-22 में 23 दिसंबर 2022 को पारित आदेश के तहत सर्वे क्र. 307/5 की 2. 68 हेक्टेयर मेट्रो ट्रेन के लिए नगरीय प्रशासन विभाग को आवंटित की थी।
इसके बाद 29 दिसंबर को मौका पंचनामा में संस्था की 2. 100 हेक्टेयर जमीन मेट्रो कॉर्पोरेशन को सौंपने का उल्लेख है, लेकिन शेष 0.518 हेक्टेयर जमीन का क्या हुआ वो आज तक अस्पष्ट है, जबकि हकीकत ये है कि इस जमीन पर संस्थाध्यक्ष फूलचंद पांडे और उसके गुर्गों ने प्लॉट काटे और बेच दिए।
ये भी मिला जांच में
परिहार की जांच में ये भी पता चला था कि 2004 में कलेक्टर ने संस्था द्वारा काटे गए प्लॉटों की रजिस्ट्री पर रोक लगा दी थी, लेकिन इसके बाजवूद प्लॉटों को बेचने का खेल चलता रहा। हद तो ये है कि सहकारिता विभाग की नाक के नीचे पांडे और उसके गिरोह ने फर्जी वरीयता सूची बना ली और प्लॉट बेच दिए।
इसमें वास्तविक सदस्यों को तो बाहर ही कर दिया गया। इसका उदाहरण ये कि सदस्यता क्र. 2270 पर सुनील राजपति का नाम दर्शाया गया है, जबकि इससे पूर्व की वास्तविक सदस्यता सूची में इसी क्रमांक पर मोहनसिंह रतनसिंह का नाम दर्ज है।
इसी तरह सदस्यता क्र. 1624 पर पूर्व की सूची में विद्या कैलाश का नाम दर्ज है, जबकि पांडे गिरोह की अवैध वरीयता सूची में इस नंबर पर शीला मधुसूदन सोडानी का नाम है। 26 अगस्त 2019 को संचालक मंडल की बैठक में ठहराव प्रस्ताव क्र. 3 में जिन 20 प्लॉटों के आवंटन का जिक्र है वो उन लोगों को दे दिए गए जो वास्तविक सदस्य थे ही नहीं।
मनमाने ढंग से बदला नक्शा
पांडे और उसके गिरोह पर ये भी आरोप है कि इन्होंने गांधी नगर हाउसिंग सोसायटी के मूल नक्शे में भी छेड़छाड़ करते हुए उसे बदल डाला। इस गिरोह ने संस्था को आवंटित सर्वे क्र. 307/5 की शासकीय रिक्त भूमि को भी अपना बताकर अवैध रूप से बेचा।
प्लॉट काटे और नामांतरण तक करवा दिया। सीएम हेल्पलाइन में 6 जून 2025 को हुई शिकायत (क्र. 32724413) में उपायुक्त ने जांच का काम सहायक आयुक्त एपीएस बिलौदिया को सौंपा, जिन्होंने 16 जुलाई 2025 को सौंपी अपनी रिपोर्ट में शिकायत को सही पाया कि संस्था ने नियमों को ताक पर रखकर प्लॉट काटे और आवंटित किए तथा नामांतरण भी कर दिया गया।
ये रिपोर्ट संयुक्त आयुक्त बीएल मकवाना के पास पहुंची, जिन्होंने अंकेक्षण अधिकारी केके जमरे से जांच करवाई और उन्होंने भी सभी शिकायतों को सही पाया। इसमें कहा गया कि पांडे के नेतृत्व वाले संचालक मंडल ने सहकारिता नियमों की खुलेआम अनदेखी की। ले आउट नक्शा बदल दिया गया और शासकीय जमीन पर अवैध रूप से प्लॉट काटकर बेचना दर्शाया।
रिकॉर्ड विभाग के पास ही नहीं तो ऑडिट कैसे हो गया?
मामले में सहकारिता विभाग के उपायुक्त मनोज जायसवाल का कहना है कि संस्था का ऑडिट करवा लिया गया है और अब नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी, लेकिन हकीकत ये है कि विभाग के पास संस्था का रिकॉर्ड है ही नहीं तो ऑडिट कैसे हो गया?
ये सीधे-सीधे गांधी नगर संस्था के भ्रष्ट अध्यक्ष फूलचंद पांडे को बचाने की कोशिश नहीं तो और क्या है? आश्चर्य की बात है कि संयुक्त आयुक्त बीएल मकवाना ने पांडे को पत्र लिखकर जब्त रिकॉर्ड की कॉपी कोर्ट से प्राप्त करने को कहा है, जबकि उपपंजीयक मनोज जायसवाल का दावा है कि कई वर्षों का ऑडिट हो चुका है।
तत्कालीन उपपंजीयक अंबरीश वैद्य ने भी परिहार की जांच रिपोर्ट को सही पाया था और कार्रवाई की अनुशंसा की थी। अब विभाग पांडे को पत्र लिखकर उसे बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
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