'जेन-जी' की उम्मीद हैं राहुल गांधी: युवाओं को राजनीति से नहीं; जमीनी मुद्दों और समाधान से है सरोकार
KHULASA FIRST
संवाददाता

'छात्रों की गूंज' और युवाओं की उम्मीद: क्या विरोध की राजनीति से आगे निकलकर 'भविष्य का खाका' पेश कर पाएंगे राहुल?
डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम छात्र-छात्राओं से सीधा संवाद करेंगे। इस बारे में छात्रों का स्पष्ट कहना है कि सत्तापक्ष और गोदी मीडिया से जुड़े पत्रकार युवाओं के विषयों को संख्याबल, कार्यक्रम स्थल और राहुल के शहर में आने के मार्ग की अनुमति तथा युवाओं के संवाद का राजनीतिकरण नहीं करें।
ऐसा करना देश और समाज के हित में नहीं है। सभी को राहुल गांधी के मन की बात सुनना चाहिए। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे दीपांशु धुर्वे बताते हैं कि देश की राजनीति में इन दिनों विपक्ष की भूमिका और जनता, विशेषकर युवाओं से सीधे संवाद का मुद्दा सबसे केंद्र में है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार देश के युवाओं, छात्रों और आम नागरिकों के बीच जाकर संवाद स्थापित कर रहे हैं। उनके इस प्रयास से युवा, यानी जेन-जी सरकार और राजनीति के लिए चिंता का विषय बन गया है। जो भी पक्ष युवा वर्ग को वोट बैंक की तरह ट्रीट करेगा वह घाटे में रहेगा।
छात्रों का कहना है कि जेन-जी अब धर्म-संप्रदाय, मंदिर-मस्जिद, फ्री कल्चर, भ्रष्ट शासन-प्रशासन व्यवस्था, गोदी मीडिया द्वारा युवाओं के सरोकार को राजनीतिक रंग देना, पार्टी पॉलिटिक्स, अगड़े-पिछड़े और सवर्ण राजनीति से पूरी तरह ऊब चुका है।
हमारे मन की बात इस समय राहुल गांधी देश के समक्ष आक्रामक तरीके से रख रहे हैं, इसलिए युवाओं को उनसे बेहतरी की अपेक्षा है। हाल ही शिक्षा व्यवस्था, रोजगार के संकट और अर्थव्यवस्था से जुड़े तमाम मुद्दों पर उनका आक्रामक रुख देखने को मिला है।
ऐसे में यह सवाल बड़ा हो जाता है कि राहुल गांधी और युवाओं के बीच संवाद क्यों जरूरी है और जनता को आज के दौर में उनकी बातें क्यों सुननी चाहिए? ऐसा इसलिए कि राहुल युवाओं के बीच संवाद स्थापित करने और उनके मुद्दों को मुखरता से उठाने के मामले में एक बड़े आकर्षण और केंद्र-बिंदु के रूप में उभरे हैं।
जहां तक उन्हें दिशा देने की क्षमता का सवाल है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वे इन संवादों को नीतिगत बदलावों और जमीनी स्तर पर एक ठोस विजन में कितना प्रभावी ढंग से बदल पाते हैं।
युवाओं की राजनीतिक सरोकार से ज्यादा यह अपेक्षा है कि वह संसद में युवाओं से जुड़े विषयों को ताकत से रखें और इसी तरह विपक्ष राज्यों में युवाओं के मुद्दों पर बात करे। युवा अब भाजपा सरकारों की आलोचना से ज्यादा देश में उसकी समस्याओं के साथ समाधान की बात सुनना चाहता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि युवाओं के बीच राहुल गांधी की स्वीकार्यता बढ़ी है, क्योंकि वे सीधे तौर पर परीक्षा तंत्र की खामियों और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दों पर मुखर हैं, लेकिन युवाओं की आवाज पूरी तरह बनने के लिए उन्हें विरोध की राजनीति से आगे निकलकर एक भरोसेमंद ‘भविष्य के विजन’ और जमीनी क्रियान्वयन को साबित करना होगा, तभी युवा उन्हें अपने स्थायी प्रतिनिधि के रूप में देखेंगे। यह तो भविष्य की बात है। फिलहाल युवा अपने से जुड़े मसलों पर उनका फोकस चाहते हैं।
‘छात्रों की गूंज’ जैसे कार्यक्रमों और अभियानों के जरिये उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक, बेरोजगारी और शिक्षा प्रणाली की कमियों जैसे ज्वलंत मुद्दों को उठाया, जिससे एक बड़ा वर्ग उनकी ओर आकर्षित हुआ है। जानकारों का कहना है कि इस सबके बीच राहुल गांधी को अपने सलाहकारों से बचना होगा, जो इस अभियान को राजनीतिक अवसर के रूप में देख रहे हैं।
आज की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में राहुल और युवाओं के बीच का संवाद केवल एक राजनीतिक गतिविधि नहीं, बल्कि देश के नीतिगत फैसलों पर एक गंभीर मंथन है। नीतियों की कमियों को परखने तथा वैकल्पिक विजन को समझने के लिए जनता और युवाओं को हर दृष्टिकोण से अवगत होना आवश्यक है।
युवाओं के लिए केवल सत्तापक्ष की नीतियों की आलोचना सुनना पर्याप्त नहीं है। एक परिपक्व नेतृत्व की कसौटी यह है कि वह आधुनिक तकनीकी युग (एआई, स्टार्टअप्स और ग्लोबल इकॉनमी) में रोजगार सृजन का एक अकाट्य और व्यावहारिक विकल्प पेश करे।
युवाओं को उम्मीद रखनी चाहिए, लेकिन साथ ही उन्हें ठोस नीतियों का आकलन भी करना होगा। जहां तक राहुल गांधी के नेतृत्व का सवाल है, सत्य की खोज की तरह ही राजनीति में भी नेतृत्व की परख केवल उसके दावों से नहीं, बल्कि उसके कर्म और नीयत की पारदर्शिता से होती है।
राहुल गांधी से युवाओं को गंभीर और ठोस नेतृत्व की उम्मीद तभी सार्थक मानी जाएगी, जब यह संवाद केवल चुनावी मंचों तक सीमित न रहकर देश की नीतिगत और व्यावहारिक दिशा में सकारात्मक परिवर्तन ला सके।
‘गूंज’ के आगे राहुल गांधी को और भी कई जतन करना होंगे। उनके संगठन से जुड़े जमीनी संगठनों की सक्रियता भी बहुत जरूरी है। कांग्रेस के एनएसयूआई और युवा विंग को केवल बड़े कार्यक्रमों तक सीमित न रखकर कॉलेज परिसरों में छात्रों के रोजमर्रा के मुद्दों (फीस वृद्धि, होस्टल की समस्याएं और अकादमिक प्रशासनिक कमियां) पर लगातार संघर्ष करना होगा।
युवा, रोजगार और परीक्षा तंत्र: देश का भविष्य...
भविष्य का सवाल... परीक्षा तंत्र और व्यवस्था पर बहस: ‘छात्रों की गूंज’ जैसे अभियानों के जरिये राहुल गांधी लगातार देशभर के छात्रों से रूबरू हो रहे हैं। आज देश का युवा पेपर लीक, परीक्षा प्रणाली की कमियों और बेरोजगारी से जूझ रहा है। युवाओं के लिए केवल एक ही विकल्प (प्रतियोगी परीक्षाएं) बचा होने और उस व्यवस्था के चरमराने के दावों पर उनका सीधा संवाद युवाओं को एक मंच प्रदान करता है।
महंगाई और डिजिटल टैक्स पर सवाल: हाल ही यूपीआई ट्रांजेक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) और नए शुल्कों को लेकर राहुल गांधी ने सरकार पर तीखा हमला बोला है। उनका तर्क है कि इससे अंततः आम आदमी और छोटे व्यापारियों की जेब पर असर पड़ेगा।
आर्थिक असमानता: देश की संपदा और संसाधनों के केंद्रीयकरण के खिलाफ राहुल लगातार मुखर रहे हैं। उनकी आर्थिक नीतियों की आलोचनाओं को सुनना इसलिए जरूरी है, ताकि यह समझा जा सके कि देश का धन किस प्रकार वितरित हो रहा है।
मूलभूत सुविधाओं की कमी: हाल ही मध्य प्रदेश के बालाघाट क्षेत्र में आदिवासी बच्चों की स्वास्थ्य व कुपोषण से हुई मौतों जैसे संवेदनशील मुद्दों पर राहुल गांधी ने सरकार को घेरा है। सामाजिक असमानता, स्वास्थ्य सेवाओं और पिछड़ों-वंचितों के अधिकारों की बात को राष्ट्रीय पटल पर लाने के लिए राहुल का पक्ष सुनना प्रासंगिक माना जाता है।
संविधान और लोकतंत्र की रक्षा: राहुल गांधी संसद के भीतर और बाहर लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और संविधान की रक्षा के लिए लगातार मुखर हैं, जो देश के बुनियादी ढांचे को प्रभावित करता है।
ग्रामीण एवं आदिवासी युवाओं के लिए विशेष रोजगार नीति जरूरी: ग्रामीण इलाके से इंदौर शहर में आए युवा छात्र राहुल डाबर और उनके मित्र बताते हैं कि इंदौर जैसे शहरों में ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों से बड़ी संख्या में युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने आते हैं, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के इन युवाओं के लिए वर्षों तक शहर में रहकर तैयारी करना आसान नहीं है।
8–10 वर्षों तक कोचिंग, किराया, भोजन और अध्ययन का खर्च उठाना हर परिवार के लिए संभव नहीं रहता। इसीलिए ग्रामीण एवं आदिवासी युवाओं के लिए जिला एवं ब्लॉक स्तर पर निःशुल्क या कम लागत वाले प्रतियोगी परीक्षा प्रशिक्षण केंद्र, डिजिटल लाइब्रेरी, इंटरनेट सुविधा, छात्रावास और गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
सरकारी भर्तियों में समयबद्ध वार्षिक भर्ती कैलेंडर लागू हो, परीक्षा और परिणाम समय पर हों तथा लंबे समय से रिक्त आदिवासी एवं बैकलॉग पदों पर विशेष भर्ती अभियान चलाया जाए।
ग्रामीण युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर कौशल विकास और रोजगार से जोड़ने वाली योजनाएं बनाई जाएं, ताकि उन्हें रोजगार की तलाश में लगातार बड़े शहरों की ओर पलायन न करना पड़े। विशेष रूप से आदिवासी अंचलों के युवाओं के लिए भाषाई एवं आर्थिक बाधाओं को ध्यान में रखते हुए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की बेहतर व्यवस्था की जाए।
प्रतिभा की कमी नहीं है, जरूरत केवल समान अवसर और उचित संसाधन उपलब्ध कराने की है। युवाओं की मांग है अवसर शहर तक सीमित न रहें, रोजगार व तैयारी की सुविधाएं गांव और आदिवासी अंचल तक पहुंचें।
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