दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर प्रदेश की बेटी के कदम: संघर्ष के साथ साहस और दृढ़ संकल्प की बनी मिसाल; मुश्किलों में भी नहीं मानी हार
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के छोटे से गांव सेमरी की रहने वाली पर्वतारोही अंजना यादव ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट (8,848.86 मीटर) पर तिरंगा फहराकर प्रदेश और देश का नाम रोशन किया है। 27 मई को एवरेस्ट फतह करने वाली अंजना की यह उपलब्धि सिर्फ एक पर्वतारोहण अभियान नहीं, बल्कि संघर्ष, साहस और दृढ़ संकल्प की प्रेरणादायक कहानी है।
एवरेस्ट अभियान से लौटने के बाद अंजना ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि यह यात्रा शारीरिक से ज्यादा मानसिक मजबूती की परीक्षा थी। उन्होंने कहा कि एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान हर कदम पर मौत का खतरा रहता है और रास्ते में कई पर्वतारोहियों के शव भी दिखाई देते हैं। ऐसे दृश्य किसी भी व्यक्ति का मनोबल तोड़ सकते हैं, लेकिन उन्होंने अपने लक्ष्य पर फोकस बनाए रखा।
अंजना 3 अप्रैल को नेपाल की राजधानी काठमांडू पहुंची थीं। वहां से उन्होंने एवरेस्ट बेस कैंप के लिए रवाना होकर अपनी तैयारी शुरू की। करीब दो महीने तक 5 हजार मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र में रहकर उन्होंने खुद को मौसम और ऊंचाई के अनुकूल बनाया। इस दौरान उन्हें कई बार अलग-अलग कैंपों तक जाकर वापस लौटना पड़ा, जिसे पर्वतारोहण की भाषा में रोटेशन कहा जाता है।
उन्होंने बताया कि एवरेस्ट अभियान का सबसे कठिन क्षण तब आया जब 20 मई को समिट के लिए निकलने के बाद वे लगभग 7 हजार मीटर की ऊंचाई वाले तीसरे कैंप तक पहुंच गई थीं। खराब मौसम और तेज हवाओं के कारण उनके गाइड ने आगे बढ़ने से मना कर दिया। मजबूरी में उन्हें वापस लौटना पड़ा।
अंजना ने कहा कि उस समय वह बेहद भावुक हो गई थीं, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि उनका सपना अधूरा रह जाएगा। हालांकि उन्होंने हार नहीं मानी और दोबारा तैयारी शुरू कर दी। कुछ दिनों बाद उन्हें फिर मौका मिला और उन्होंने नई ऊर्जा के साथ अभियान जारी रखा।
25 मई को उन्होंने एक बार फिर अंतिम चढ़ाई शुरू की। 26 मई को चौथे कैंप पहुंचने के बाद शाम को शिखर की ओर बढ़ना शुरू किया। उन्होंने बताया कि अंतिम चरण के दौरान मौसम बेहद कठिन था। तेज हवाओं के कारण कई टेंट उड़ गए थे और परिस्थितियां लगातार चुनौतीपूर्ण बनी हुई थीं।
अंजना के अनुसार वे लगभग 36 घंटे तक बिना पानी और भोजन के लगातार आगे बढ़ती रहीं। कठिन परिस्थितियों और अत्यधिक थकान के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। करीब नौ घंटे की अंतिम चढ़ाई के बाद वह एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचीं और वहां तिरंगा फहराकर अपने सपने को साकार किया।
उन्होंने बताया कि इस उपलब्धि के पीछे उनके परिवार का सबसे बड़ा योगदान है। शादी के बाद उन्हें लगा था कि शायद उनका सपना अधूरा रह जाएगा, लेकिन परिवार ने हर कदम पर उनका साथ दिया। विशेष रूप से उनके पिता और पति ने उन्हें लगातार प्रोत्साहित किया।
अंजना ने कहा कि उनके पिता हमेशा कहते थे कि "तेरा सपना मेरा सपना है।" यही विश्वास उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देता रहा। एवरेस्ट अभियान की तैयारी के दौरान उन्होंने अरुणाचल प्रदेश से गुजरात तक करीब 4600 किलोमीटर की साइकिल यात्रा भी की थी।
सरकारी स्कूल में पढ़ाई करने वाली अंजना 2018 से खेलों में सक्रिय हैं। अब तक वह 22 राष्ट्रीय और तीन अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुकी हैं। इसके अलावा वे 20 पर्वत चोटियों पर सफलतापूर्वक चढ़ाई कर चुकी हैं।
देश की बेटियों के नाम संदेश देते हुए अंजना ने कहा कि कोई भी सपना छोटा या बड़ा नहीं होता। यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत ईमानदारी से की जाए तो किसी भी ऊंचाई को छुआ जा सकता है। उन्होंने कहा कि गांवों की लड़कियां भी बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने का साहस रखें।
एवरेस्ट फतह के बाद अब अंजना की नजर दुनिया की अन्य ऊंची चोटियों पर है। साथ ही वह पर्यावरण संरक्षण और समाजसेवा के क्षेत्र में भी सक्रिय योगदान देना चाहती हैं। उनकी यह उपलब्धि न केवल मध्य प्रदेश बल्कि पूरे देश की बेटियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है।
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