दुकानों के 28 लाख रुपए बकाया: अब अचानक सीलिंग से दुकानदारों में आक्रोश; सालों तक सुध न लेने वाले निगम प्रशासन ने 8 दुकानों पर लगाए ताले
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नगर निगम की लापरवाही और प्रशासनिक अनदेखी पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। शास्त्री मार्केट में सालों से किराया बाकी रहने की याद निगम प्रशासन को अब आई, तो आनन-फानन में कार्रवाई करते हुए 8 दुकानें सील कर दीं। हैरानी की बात यह है कि निगम की ही कमजोर व्यवस्था के कारण दुकानों पर कुल बकाया 28 लाख रुपए से अधिक पहुंच गया।
जब वसूली नहीं हो पाई तो उक्त दुकानों पर ताले लगा दिए। प्रभारी आयुक्त आकाश सिंह के आदेश पर चलाए गए इस सीलिंग अभियान से पूरे शास्त्री मार्केट के दुकानदारों में आक्रोश गहरा गया है।
स्थानीय कारोबारियों का कहना है कि निगम खुद अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहा है। सालों तक नियमित वसूली न करना और आवंटियों को समय पर नोटिस न देना निगम के ही बदहाल प्रबंधन का नतीजा है।
अचानक दस्ता लेकर पहुंचे निगमकर्मियों ने दुकानों में मूल आवंटी के बजाय अन्य व्यक्तियों द्वारा व्यवसाय किए जाने और बकाया राशि का हवाला देकर सीलिंग की कार्रवाई कर दी। व्यापारियों का सीधा सवाल है कि जब सालों से नियम-कायदों की अनदेखी हो रही थी और बकाया राशि लाखों में पहुंच रही थी, तब नगर निगम क्या कर रहा था?
नगर निगम द्वारा जिन दुकानों को सील किया गया है, उसमें प्रतापसिंह खुराना की दुकान नंबर 240 (बकाया 6,68,546 रुपए), मीनाबाई जैन की दुकान नंबर 255 (बकाया 5,73,870 रुपए), अनिल सुराणा की दुकान नंबर 236 (बकाया 4,10,500 रुपए), पुष्पपाल सुराणा की दुकान नंबर 235 (बकाया 4,10,172 रुपए), अशोक अग्रवाल की दुकान नंबर 266/बी (बकाया 2,54,752 रुपए), अंजना सकलेचा की दुकान नंबर 239 (बकाया 2,37,883 रुपए), केशरीमल जैन की दुकान नंबर 155 (बकाया 1,60,655 रुपए) और राकेश खंडेलवाल की दुकान नंबर 274 (बकाया 1,22,118 रुपए) शामिल हैं।
इन आठों दुकानों को मिलाकर कुल बकाया आंकड़ा 28,38,502 रुपए तक पहुंच गया, जिसे समय रहते वसूलने में निगम तंत्र पूरी तरह नाकाम रहा और अंत में दुकानों को सील करने की कार्रवाई कर दी।
व्यापारी संगठनों ने निगम की इस कार्यशैली पर विरोध दर्ज कराया है। उनका तर्क है कि एक तरफ शहर का व्यापारी वर्ग तमाम चुनौतियों से जूझ रहा है, वहीं दूसरी तरफ नगर निगम अपनी प्रशासनिक नाकामी और समय पर रिकवरी न कर पाने का खामियाजा दुकानदारों पर थोप रहा है।
यदि निगम समय-समय पर किराया जमा करने की प्रक्रिया को नियमित रखता, तो इतनी बड़ी राशि अटकी ही नहीं रहती। दुकानों को अचानक सील किए जाने से न केवल संबंधित दुकानदारों का कारोबार ठप हो गया है, बल्कि उनसे जुड़े कर्मचारियों के सामने भी रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
अनुबंध का सीधा उल्लंघन
दूसरी ओर, नगर निगम प्रशासन ने अपने रुख को सही ठहराते हुए कहा है कि यह कदम केवल नियमों का पालन कराने के उद्देश्य से उठाया गया है। सरकारी खजाने का बकाया न चुकाना और बिना अनुमति दुकानों को अन्य हाथों में सौंपना अनुबंध का सीधा उल्लंघन है।
निगम अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि शहर की अन्य मार्केटों में भी ऐसा ही अभियान चलाया जाएगा, लेकिन इस पूरी कार्रवाई ने नगर निगम की उस व्यवस्था का खुलासा कर दिया है, जहां लापरवाही के चलते मामले सालों तक खिंचते रहते हैं और फिर अचानक एक दिन कार्रवाई का ढिंढोरा पीटकर अपनी नाकामियों को ढंकने का प्रयास किया जाता है।
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