आरएसएस विरोधियों को जरूर देखना-दिखाना चाहिए
KHULASA FIRST
संवाददाता

रमण रावल वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के निर्माण से लेकर अभी तक भारतीय समाज में इस संगठन को लेकर अनेक सवाल, संशय ,जिज्ञासा रहती आई हैं। जो पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं,उन्हें कभी-भी किसी भी मसले का सही जवाब मिल ही नहीं सकता, लेकिन जो कोरी स्लेट पर इबारत लिखना चाहता है,उसे संघ के सौ साला सफर को रेखांकित करने वाली फिल्म शतक काफी संतोषप्रद,सटीक और सटीक रूप में जानकारी देने में सक्षम है।
इसलिये मेरा तो मानना है कि संघ ने प्रयासपूर्वक देश के चुनिंदा शहरों में संघ विरोधियों के लिये विशेष शो आयोजित करना चाहिए। बेशक, वह ऐसा कभी नहीं करेगा, क्योंकि संघ कभी खंडन-मंडन के चक्कर में रहा ही नहीं । उसका एकमात्र ध्येय राष्ट्र निर्माण, हिंदू एकता और सामाजिक सद्भाव रहा है। इस मायने में 20 फरवरी को प्रदर्शित फिल्म शतक अपने मंतव्य में सफल कही जा सकती है ।
जिस तरह से मनुष्य की उम्र सौ साल हो जाना बड़ी उपलब्धि है और यह आनंद तब कई गुना बढ़ जाता है, जब वह व्यक्ति स्वस्थ-प्रसन्न भी हो। इस लिहाज से संघ सौ साल पूरे कर खुशहाल,मजबूत,लोकप्रिय और संभावनाओं से भरपूर है। पूरी तरह से गैर सरकारी सहायता प्राप्त किसी संगठन के सौ बरस पूरे होना ऐतिहासिक होने के साथ चमत्कृत करने वाला है।
उसकी खास वजह यह है कि उम्र बढ़ने के साथ यह अपेक्षाकृत सक्षम,अपने ध्येय में दृढ़ और राष्ट्र हित के संकल्प में अडिग साबित हुआ । यह बेहद असाधारण है। यह तब हुआ, जब सौ साल में से करीब 85 साल तो संघ संघर्ष ही करता रहा। अलबत्ता अटल बिहारी वाजपेयी के 5 साल व नरेंद्र मोदी सरकार के 10 साल के कार्यकाल में जरूर वह सरकारी प्रताड़ना से बचा रहा, वरना तो कभी उसे चैन की सांस नहीं लेने दी गई । बहरहाल।
शतक फिल्म में संघ के इसी संघर्षशील सफर को दिखाया गया है, वह भी बिना किसी अतिरेक के । हां, इतना अवश्य है कि जिन घटनाओं को लेकर संघ विरोधी लगातार दुष्प्रचार करते रहे,उनके वास्तविक स्वरूप को तथ्यात्मक तरीके से फिल्मांकित किया गया है।
कश्मीर में कबिलाइयों के भेष में घुसे पाकिस्तानी सैनिकों से लोहा लेना हो, दादरा नगर हवेली से विदेशियों को भगाना हो,चीन से युद्ध के बाद संघ के उल्लेखनीय योगदान के मद्देनजर दिल्ली की परेड में स्वयं सेवको को शामिल करना हो या तीन-तीन बार प्रतिबंध लगाना हो।
संघ ने अपनी कार्य पद्धति के परिप्रेक्ष्य में राजनीति से निश्चित दूरी बनाये रखने का भी ध्यान रखते हुए 1980 में भारतीय जनता पार्टी के गठन और 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के घटनाक्रम को स्पर्श भी नहीं किया, जो बताता है कि संघ श्रेय के भाव से काम नहीं करता।
इसीलिये स्वयं सेवक के लिये भी हमेशा यह स्पष्टता रही कि वह अपनी कोई भी निजी मान्यता और पूजा पद्धति रखे, लेकिन संघ के समाज कल्याण और राष्ट्र हित के भाव को धारण किये रहे,उतना काफी है।फ़िल्म में हेडगेवार जी,गुरु गोलवलकर और बाला साहेब देवरस का ही जिक्र है, जिन्होंने संघ को प्रारंभिक दृढ़ता प्रदान की। रज्जु भैया,सुदर्शन जी, व वर्तमान सर संघ चालक मोहन भागवत का उल्लेख न होना भी यह बताता है कि संघ में वर्चस्व और नाम की होड़ कभी नहीं रही।
फिल्म शतक पूरी तरह से दृश्य माध्यम के आवश्यक तकाजों का पालन करते हुए बनाई गई है, जिसमें सधा हुआ संपादन,जहां जरूरी हो, वहां संगीत,किसी सांप्रदायिक विद्वेष को बढ़ाने वाले घटनाक्रम से परहेज और क्रमबद्धता बरकरार रखी गई । तुर्की के शहंशाह के समर्थन में भारत में भड़के दंगों में हिंदुओं पर हुए अत्याचारों को जरूर दिखाया गया है, जो राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ा मसला था।
एक और उल्लेखनीय पक्ष यह है कि संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार की बाल्यकाल से युवावस्था तक स्वतंत्रता आंदोलन में प्रत्यक्ष योगदान की स्पष्ट घटनाओं को सविस्तार बताया गया है, ताकि संघ विरोधी राजनीतिक लोगों का झूठ सामने आये कि संघ के लोगों का आजादी में कोई योगदान नहीं है। जबकि श्यामाप्रसाद मुखर्जी,बलराज मधोक,वीर सावरकर आदि अनेक महापुरुषों ने फिरंगी सरकार से लोहा लिया था।
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