मालवा की माटी से राष्ट्रभाषा का संकल्प: जब इंदौर के मंच से गूंजी थी बापू की हुंकार
KHULASA FIRST
संवाददाता

गांधी जयंती पर विशेष
हिंदी, राष्ट्रवाद और ‘इंदौर मेथड’: बापू के सामाजिक प्रयोगों की ऐतिहासिक गवाह है होलकर नगरी
बग्घी का जुलूस, अपनी थाली खुद धोना और ‘लंदन कनेक्शन’, इंदौर में महात्मा गांधी के दो यादगार पड़ाव
गांधी और इंदौर: वैचारिक क्रांति, सादगी और स्वच्छता के अटूट रिश्ते की अनकही कहानी
भाषा, कृषि और स्वच्छता के ‘वैश्विक’ मॉडल का ऐतिहासिक सफर
हेमंत उपाध्याय 99930-99008, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का मध्य प्रदेश और विशेष रूप से मालवा के केंद्र इंदौर से केवल राजनीतिक नाता नहीं था, बल्कि यह उनके जीवन के वैचारिक और सामाजिक प्रयोगों की उर्वर भूमि थी।
बापू के इंदौर आगमन ने न केवल देश में हिंदी आंदोलन की नींव रखी, बल्कि वैज्ञानिक कृषि और स्वच्छता के उस दृष्टिकोण को भी जन्म दिया, जिसका प्रभाव आज पूरी दुनिया देख रही है।
आज गांधी जयंती पर हम फिर याद करते हैं वर्ष 1918 और 1935 में हुए बापू के दो ऐतिहासिक इंदौर प्रवासों की विस्तृत, तथ्यात्मक और रोचक गाथा, जो इस शहर के गौरवशाली इतिहास को बयां करती है।
1918 का प्रथम आगमन: बग्घी का जुलूस और हिंदी राष्ट्रभाषा का संकल्प
28 मार्च 1918 को जब महात्मा गांधी पहली बार रेल मार्ग से इंदौर स्टेशन आए, तो पूरे शहर में एक अभूतपूर्व उत्सव जैसा माहौल था। उनका ऐतिहासिक और भव्य स्वागत किया गया।
शहर में निकला जुलूस: इंदौर के उत्साही युवाओं ने बापू के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए उन्हें एक भव्य बग्घी में बैठाया। यह जुलूस रेलवे स्टेशन से शुरू होकर, इंदौर की ऐतिहासिक पहचान राजबाड़ा और खजूरी बाजार होते हुए तत्कालीन डिस्को पार्क (जो वर्तमान में नेहरू पार्क के नाम से जाना जाता है) तक पहुंचा।
15 हजार की जनसभा: नेहरू पार्क के इसी विशाल मैदान में अष्टम हिंदी साहित्य सम्मेलन का आयोजन हुआ, जिसकी अध्यक्षता स्वयं महात्मा गांधी ने की थी। लगभग 15,000 लोगों की ऐतिहासिक उपस्थिति में बापू ने इसी सार्वजनिक मंच से पहली बार गरजते हुए हुंकार भरी कि हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाया जाना चाहिए।
दक्षिण भारत में हिंदी का अलख: बापू केवल विचार देने में नहीं, बल्कि उसे धरातल पर उतारने में विश्वास रखते थे। इसी अधिवेशन में यह बड़ा फैसला हुआ कि गैर-हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी का प्रचार किया जाए।
इसके लिए गांधीजी ने अपने पुत्र देवदास गांधी, स्वामी सत्यदेव, हरिहर शर्मा और ऋषिकेश जैसे विद्वानों को तत्कालीन मद्रास (अब चैन्नई) भेजने का ऐतिहासिक निर्णय लिया।
होलकर राजवंश का अभूतपूर्व सहयोग: इंदौर के इस भाषाई आंदोलन को गति देने में स्थानीय होलकर राजघराने ने दिल खोलकर मदद की। महाराजा तुकोजीराव पवार (तृतीय) ने हिंदी भवन के लिए न केवल रातो-रात भूमि आवंटित की (जिसका शिलान्यास बापू ने किया), बल्कि 10 हजार रुपए की आर्थिक सहायता भी दी। इसके साथ ही प्रसिद्ध उद्योगपति सर हुकुमचंद और इंदौर के प्रबुद्ध नागरिकों ने मिलकर कुल 1,35,000 की विशाल थैली बापू को सौंपी।
सादगी की मिसाल: जब बापू ने खुद धोए अपने बर्तन...
इस पहली यात्रा के दौरान बापू की सादगी का एक बेहद अनूठा किस्सा इंदौर के इतिहास में दर्ज है। इंदौर प्रवास के समय महात्मा गांधी भोजन करने के बाद अपना बर्तन (थाली और कटोरी) खुद साफ करते थे और उसे अपने साथ ही वापस ले जाते थे।
बापू की सादगी और उनके स्पर्श से पावन हुई उस ऐतिहासिक थाली और कटोरी को बाद में देशप्रेमियों के बीच नीलाम किया गया था।
1935 का द्वितीय आगमन: पहनावे का बदलाव और ‘इंदौर मेथड' का कौतुक
20 से 23 अप्रैल 1935 के दौरान महात्मा गांधी दूसरी बार तीन दिवसीय प्रवास पर इंदौर आए। इस बार अवसर था 24वें हिंदी साहित्य सम्मेलन का, जिसकी अध्यक्षता उन्होंने पुनः की। इस यात्रा के दौरान उन्होंने अपने हाथों से 'मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति' के भव्य और नवविर्मित भवन का अनावरण किया।
पहनावे में जीवन यात्रा का संदेश: सर्वोदय मंडल के जानकारों के अनुसार, बापू की इन दोनों यात्राओं के बीच उनके पहनावे का अंतर उनके वैचारिक रूपांतरण को दर्शाता था।
1918 में जब वे पहली बार आए थे, तब वे पारंपरिक साफा और धोती-कुर्ता पहने हुए थे। लेकिन 1935 की दूसरी यात्रा तक वे पूरी तरह से जन-सामान्य के रंग में रंग चुके थे और केवल एक सूती धोती में इंदौर पहुंचे थे।
दत्त मंदिर पर तड़के जनसंवाद: अपने इस दूसरे प्रवास के दौरान बापू ने कृष्णपुरा पुल स्थित दत्त मंदिर के समीप तड़के (प्रातःकाल) एक विशेष सभा को संबोधित किया और वहां मौजूद आम जनता से स्वदेशी अपनाने तथा ग्राम-विकास से जुड़ने का आह्वान किया।
लंदन की प्रदर्शनी से इंदौर के कृषि कॉलेज तक: 'कचरे से कंचन' की कहानी
1935 की यात्रा का सबसे रोचक और वैज्ञानिक पहलू बापू की कृषि और पर्यावरण में गहरी रुचि से जुड़ा हुआ था, जिसका कनेक्शन सीधे लंदन से था। लंदन में देखा भारत के नक्शे पर इंदौर: साल 1932 में जब गांधीजी तीसरे गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन में थे, तब वहां एक प्रदर्शनी में अंग्रेजों ने भारत के नक्शे पर विशेष रूप से 'इंदौर' की तख्ती लगा रखी थी।
बापू के पूछने पर अंग्रेजों ने बताया कि इंदौर के 'इंस्टिट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्री' (वर्तमान कृषि कॉलेज) में कचरे और फसल के अवशेषों से एक बेहद वैज्ञानिक जैविक खाद बनाने की तकनीक खोजी गई है, जो पूरी दुनिया में मशहूर हो रही है।
कैम्ब्रिज के प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट हार्वर्ड द्वारा विकसित इस अनूठी कंपोस्टिंग तकनीक को दुनिया 'इंदौर मेथड' के नाम से जानती थी।
कृषि कॉलेज का दौरा: लंदन की इस बात को बापू भूले नहीं थे। इसलिए 23 अप्रैल 1935 को वे स्वयं इंदौर के कृषि कॉलेज पहुंचे। वहां उन्होंने कचरे से खाद बनाने की इस 'इंदौर विधि' को बेहद बारीकी से समझा और देखा।
इस अनूठे वैज्ञानिक प्रयोग से बापू इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने आगे चलकर अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'ग्राम स्वराज' और अपने कई अन्य लेखों में इंदौर की इस तकनीक की जमकर सराहना की।
अतीत से वर्तमान का सेतु: हिंदी और स्वच्छता का 'वैश्विक सिरमौर' इंदौर
महात्मा गांधी ने जिस स्वच्छ भारत और भाषाई स्वाभिमान का सपना देखा था, इंदौर आज उन दोनों ही विचारों का सबसे बड़ा जीवंत उदाहरण बनकर उभरा है। बापू की प्रेरणा से स्थापित 'श्री मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति' आज भी इंदौर के रवींद्र नाट्य गृह मार्ग पर अपने ऐतिहासिक स्वरूप में सीना ताने खड़ी है, जहां बापू द्वारा स्थापित शिलालेख, उनके पदचिह्न और लगभग 25,000 दुर्लभ पुस्तकों का पुस्तकालय आज भी सुरक्षित है। इसके अलावा, इंदौर रेलवे स्टेशन पर बापू के आगमन की स्मृति में एक विशेष स्मारक चबूतरा और सुंदर भित्ति चित्र (पेंटिंग्स) बनाए गए हैं।
यह इंदौर की इसी वैचारिक और ऐतिहासिक चेतना का कमाल है कि जिस शहर ने 1935 में कचरे से खाद बनाने के 'इंदौर मेथड' से बापू को प्रभावित किया था, वही इंदौर आज लगातार स्वच्छता सर्वेक्षण में देश में शीर्ष (नंबर 1) पर बना हुआ है।
हिंदी के प्रति अनुराग और स्वच्छता का यह जज्बा, इंदौर की माटी को महात्मा के विचारों से हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर देता है।
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