मां कूष्मांडा: एक मुस्कान; जो अंधकार को सृष्टि में बदल देती है
KHULASA FIRST
संवाददाता

शारदीय नवरात्रि : चतुर्थ दिवस
राजकुमार जैन स्वतंत्र लेखक, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
जीवन में हर शुरुआत के लिए बड़े साधनों या अनुकूल परिस्थितियों की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी एक छोटी-सी उम्मीद भी बदलाव का आधार बन जाती है। जब रास्ते बंद दिखाई दें और भविष्य अनिश्चित लगे, तब सकारात्मक दृष्टि ही आगे बढ़ने का साहस देती है।
शारदीय नवरात्रि के चतुर्थ दिवस मां कूष्मांडा की आराधना हमें यही संदेश देती है कि जहां हमें शून्य दिखाई देता है, वहीं सृजन की पहली संभावना छिपी हो सकती है।
सृष्टि की मुस्कान और रचनात्मकता का संदेश... पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब चारों ओर अंधकार था और सृष्टि का प्रकट रूप अस्तित्व में नहीं आया था, तब मां कूष्मांडा ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की।
उनके नाम की पारंपरिक व्याख्या में ‘कू’, ‘ऊष्मा’ और ‘अंड’ को क्रमशः छोटा, ऊर्जा और ब्रह्मांड से जोड़कर देखा जाता है। वे सृजन, प्रकाश और जीवनदायिनी ऊर्जा की प्रतीक हैं। उन्हें सूर्यमंडल में निवास करने वाली देवी के रूप में भी प्रतिष्ठित किया गया है।
उनकी आठ भुजाएं, जिनमें विविध अस्त्र, कमल, कलश और जपमाला जैसे प्रतीक हैं, शक्ति, साधना और कर्म के समन्वय का बोध कराती हैं। उनका स्वरूप सिखाता है कि कल्पना को वास्तविकता में बदलने के लिए संकल्प के साथ साहस, अनुशासन और निरंतर प्रयास भी आवश्यक हैं।
मां कूष्मांडा की स्तुति में कहा गया है-
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥
यह स्तुति देवी के कल्याणकारी स्वरूप का स्मरण कराती है और भक्त के मन में शक्ति, विश्वास तथा मंगल की भावना जगाती है।
युवाओं के लिए तीन जीवन-संदेश... आज का युवा सूचनाओं से घिरा है, लेकिन मानसिक शांति और आत्मविश्वास के लिए संघर्ष करता है। दूसरों की उपलब्धियों से अपनी तुलना, असफलता का भय और भविष्य की चिंता उसकी ऊर्जा को क्षीण कर सकते हैं। ऐसे समय में मां कूष्मांडा का जीवन-दर्शन तीन महत्वपूर्ण सीख देता है।
पहली सीख: परिस्थितियों से अधिक अपने दृष्टिकोण पर विश्वास रखें।
हर प्रयास तत्काल सफलता नहीं देता, लेकिन असफलता जीवन का अंतिम निर्णय भी नहीं है। वह अपनी रणनीति सुधारने और नई दिशा खोजने का अवसर हो सकती है। सकारात्मकता का अर्थ समस्याओं से मुंह मोड़ना नहीं, बल्कि उनका सामना करते हुए समाधान तलाशना है।
मां कूष्मांडा की मुस्कान हमें याद दिलाती है कि कठिन समय में भी उम्मीद का स्थान बना रहता है। बदलाव की शुरुआत संसार को बदलने से पहले स्वयं पर विश्वास करने से होती है।
दूसरी सीख : अपनी ऊर्जा शिकायत में नहीं, सृजन में लगाएं।
समय और मानसिक ऊर्जा सीमित हैं। इन्हें निरर्थक विवादों, अनावश्यक आलोचना और अंतहीन डिजिटल व्यस्तताओं में खर्च करना आसान है। इसके विपरीत, नया कौशल सीखना, पुस्तक पढ़ना, कला का अभ्यास करना या किसी सामाजिक समस्या के समाधान में योगदान देना हमारी क्षमता को सार्थक दिशा देता है।
हर व्यक्ति ब्रह्मांड की रचना नहीं कर सकता, लेकिन अपने परिवार, कार्यक्षेत्र और समाज में नई संभावनाएं अवश्य पैदा कर सकता है।
तीसरी सीख : स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन को प्राथमिकता दें।
रचनात्मकता के लिए केवल उत्साह पर्याप्त नहीं, स्वस्थ शरीर और संतुलित मन भी आवश्यक हैं। पर्याप्त नींद, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और आत्मचिंतन के लिए कुछ समय हमारी कार्यक्षमता को बेहतर बना सकते हैं। आध्यात्मिक साधना भी मन को एकाग्र करने और विचारों को समझने का अवसर देती है। अपने स्वास्थ्य की देखभाल लक्ष्य से पीछे हटना नहीं, बल्कि उसे प्राप्त करने की तैयारी है।
अंधकार को कोसने के बजाय दीप जलाएं... मां कूष्मांडा की आराधना का सार है कि प्रकाश की प्रतीक्षा करने के बजाय स्वयं पहल करें। कार्यस्थल पर अव्यवस्था हो तो अपनी जिम्मेदारी निभाएं, समाज में कटुता हो तो संवाद और सद्भाव बढ़ाएं, किसी युवा के सामने अवसरों की कमी हो तो उसके मार्गदर्शन का माध्यम बनें।
इस नवरात्रि के चतुर्थ दिवस स्वयं से एक प्रश्न पूछें-मैं अपनी क्षमता और सकारात्मक ऊर्जा से किसी दूसरे के जीवन में कितना प्रकाश जोड़ सकता हूं? यही प्रश्न भक्ति को व्यवहार से जोड़ता है और आस्था को जीवन-मूल्य में बदलता है।
दुनिया को बदलने के लिए सूर्य बनना आवश्यक नहीं, बल्कि किसी निराश मन में उम्मीद की एक किरण जगाना ही पर्याप्त होता है।
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