जलकांड की जांच रिपोर्ट में बड़ा खुलासा: 2018 में ही दी दूषित भूजल की चेतावनी; 7 साल तक नहीं बदली पाइपलाइन
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई जनहानि की जांच के लिए गठित आयोग की रिपोर्ट में नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
हाईकोर्ट में पेश रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने वर्ष 2018 में ही भागीरथपुरा समेत शहर के कई इलाकों के भूमिगत जल के दूषित होने की जानकारी दे दी थी।
इसके बावजूद पाइपलाइन बदलने और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने की दिशा में समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि अधिकारियों ने समय रहते उपलब्ध रिपोर्टों और शिकायतों के आधार पर निर्णय लिया होता, तो हालात को बिगड़ने से रोका जा सकता था।
2018 में मिल गई थी दूषित भूजल की रिपोर्ट
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 2018 में भागीरथपुरा और आसपास के क्षेत्रों के बोरिंग व भूमिगत जलस्रोतों के सैंपल लिए थे। रिपोर्ट में कई जगहों का पानी पीने योग्य नहीं पाए जाने और भूजल के प्रदूषित होने की बात सामने आई थी।
रिपोर्ट में नालों से आने वाली गंदगी और अन्य रासायनिक प्रदूषकों के कारण भूमिगत जल के दूषित होने की आशंका जताई गई थी।
साथ ही यह भी बताया गया था कि कई रहवासी इस पानी का रोजमर्रा के कामों के साथ पीने के लिए भी इस्तेमाल कर रहे हैं।
7 साल तक अटकी पाइपलाइन, हादसे के बाद 7 महीने में काम
जांच आयोग की रिपोर्ट में सबसे अहम सवाल 25 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन को लेकर उठाया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, जिन पाइपलाइनों को बदलने की जरूरत लंबे समय से सामने आ रही थी, उनका काम वर्षों तक आगे नहीं बढ़ा।
दिसंबर 2025 में क्षेत्र में दूषित पानी से लोगों के बीमार पड़ने और जनहानि के बाद इसी पाइपलाइन को बदलने की प्रक्रिया तेज हुई।
रिपोर्ट के अनुसार, करीब 25 किलोमीटर की लाइन लगभग सात महीने में बिछा दी गई।आयोग ने इस अंतर को अधिकारियों की निर्णय प्रक्रिया और कार्यप्रणाली के संदर्भ में गंभीरता से लिया है।
योजनाओं के लिए पैसा मिला, फिर भी काम नहीं हुआ
रिपोर्ट में शहर की पेयजल व्यवस्था से जुड़ी योजनाओं का भी उल्लेख है। आयोग के मुताबिक, निगम को दो बड़ी योजनाओं के तहत पेयजल व्यवस्था और खराब पाइपलाइनों को बदलने के लिए राशि उपलब्ध कराई गई थी। भागीरथपुरा की पाइपलाइन भी इन कार्यों में शामिल थी।
इसके बावजूद क्षेत्र की पुरानी पाइपलाइनों को समय पर बदलने का काम नहीं हो सका। आयोग ने इस देरी को अधिकारियों की कार्यप्रणाली से जोड़ते हुए सवाल उठाए हैं।
लोग बीमार पड़ते रहे, शिकायतों के बाद भी नहीं चेते अफसर
रिपोर्ट में रहवासियों के बयान भी दर्ज हैं। लोगों ने आयोग को बताया कि क्षेत्र में गंदे पानी की समस्या लंबे समय से बनी हुई थी। कई रहवासियों के मुताबिक, उन्होंने जनप्रतिनिधियों और संबंधित अधिकारियों से शिकायतें भी कीं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि दिसंबर 2025 की शुरुआत से ही लोगों के बीमार पड़ने की जानकारी सामने आने लगी थी। इसके बावजूद समस्या की गंभीरता को समय रहते नहीं पहचाना गया। स्थिति बिगड़ने और जनहानि के बाद प्रशासनिक अमला सक्रिय हुआ।
शिकायतों पर मिलता रहा सिर्फ आश्वासन
आयोग के सामने दिए गए बयानों में रहवासियों ने आरोप लगाया कि जब भी वे गंदे पानी की शिकायत लेकर पहुंचे, उन्हें समस्या का समाधान कराने का आश्वासन दिया गया, लेकिन समय पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
यानी दूषित पानी की शिकायतें, 2018 की प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की चेतावनी और पाइपलाइन बदलने की जरूरत तीनों संकेत मौजूद थे, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान समय पर नहीं हो सका।
आयोग ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल
जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट के निष्कर्ष में अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर टिप्पणियां की हैं। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि समय पर निर्णय लेकर पाइपलाइन और पेयजल व्यवस्था में सुधार किया जाता तो स्थिति को बिगड़ने से रोका जा सकता था।
अब हाईकोर्ट में पेश इस रिपोर्ट के बाद यह सवाल अहम हो गया है कि 2018 में खतरे की जानकारी मिलने के बावजूद सात साल तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई और जिम्मेदारी तय करने के लिए आगे क्या कदम उठाए जाएंगे।
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