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मां कंसमर्दिनी सिद्धपीठ- योगमाया का जाग्रत पौराणिक केंद्र

KHULASA FIRST

संवाददाता

03 जून 2026, 6:38 pm
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मां कंसमर्दिनी सिद्धपीठ- योगमाया का जाग्रत पौराणिक केंद्र

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
जहां प्राचीन ताम्रपात्र में छिपे हैं द्वापर युग के रहस्य; एक किसान के हल से टकराई शिला और गूंजी थी आकाशवाणी, श्रीनगर गढ़वाल की सिद्धपीठ, मथुरा से देवभूमि तक योगमाया का सफर, चार धाम रूट का वो गुप्त कोना, गोरखा काल के निर्माण की गवाह है यह धरा, संतान दायिनी के रूप में देशभर में मान्यता उत्तराखंड की पावन देवभूमि में चार धाम यात्रा मार्ग पर स्थित श्रीनगर गढ़वाल केवल एक प्रशासनिक या शैक्षणिक केंद्र नहीं है, बल्कि यह आदि-अनादि काल से सनातन आस्था के सबसे जाग्रत स्तंभों को खुद में समेटे हुए है।

अलकनंदा नदी के आंचल में बसे इसी ऐतिहासिक शहर के नर्सरी रोड पर स्थित है मां कंसमर्दिनी सिद्धपीठ। धार्मिक और पौराणिक कड़ियों को जोड़ता यह एक ऐसा दुर्लभ स्थल है, जिसका सीधा संबंध द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण के जन्म और कंस के अहंकार के पतन की अमर गाथा से है।

यहां स्थापित देवी साक्षात महामाया (योगमाया) हैं, जिन्होंने पापी कंस के अत्याचारों का अंत करने के लिए इस भूभाग को अपनी क्रीड़ास्थली बनाया था।

द्वापर की वो आसमानी बिजली, जो गढ़वाल के पहाड़ों में बन गई शिला... मथुरा के कारागार की वो कथा हर सनातनी के जेहन में दर्ज है, जब अत्याचारी राजा कंस ने देवकी की आठवीं संतान समझकर यशोदा की नवजात कन्या को पत्थर की शिला पर पटकना चाहा था, लेकिन वह कन्या साक्षात योगमाया थीं, जो कंस के हाथों से छूटकर बिजली की कड़क के साथ आसमान में विलीन हो गईं। आकाशवाणी करते हुए उन्होंने कंस को ललकारा था कि तुझे मारने वाला पैदा हो चुका है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कंस का घमंड चूर-चूर करने के बाद महामाया आकाश मार्ग से सीधे गढ़वाल के इन शांत पर्वतों की ओर आईं और इसी पावन स्थान पर एक पवित्र शिलाखंड के रूप में स्थापित हो गईं। कंस के अहंकार का मर्दन करने के कारण ही सदियों से इन्हें ‘मां कंसमर्दिनी’ के नाम से पूजा जाता है।

रामचंद्र धनाई का हल और पुरानी वो लोककथा...स्थानीय इतिहास और बुजुर्गों के अनुसार, कई वर्ष पूर्व यह क्षेत्र जंगलों और खेतों से घिरा था। तब यहां के एक स्थानीय ग्रामीण रामचंद्र धनाई अपने बैलों के साथ खेत में हल चला रहे थे।

अचानक उनका हल एक शिला से टकराया और वातावरण में एक अलौकिक दिव्य ध्वनि गूंज उठी। आकाशवाणी के वे शब्द आज भी लोककथाओं में जीवंत हैं- मैं पास के इस बेडू (पहाड़ी अंजीर) के पेड़ के नीचे नग्न अवस्था में हूं।

तुम्हारे पास इस समय जो भी वस्तु उपलब्ध हो, उससे मुझे तुरंत ढंक दो। रामचंद्र धनाई के पास उस वक्त अनाज नापने का एक तांबे का पारंपरिक बर्तन (जिसे स्थानीय भाषा में पाथा कहा जाता है) मौजूद था। उन्होंने श्रद्धापूर्वक दौड़कर उस पाथे से उस शिला को ढक दिया। इसके बाद से ही यह स्थान एक जाग्रत सिद्धपीठ के रूप में पूजा जाने लगा।

गोरखा सेनापति का निर्माण और आधुनिक भव्यता...यूं तो इस सिद्धपीठ का अस्तित्व आदिकाल से माना जाता है, लेकिन मंदिर की पक्की और व्यवस्थित संरचना का इतिहास उत्तराखंड के गोरखा काल से जुड़ता है।

इतिहास के पन्नों के अनुसार गोरखा सेनापति बम्पा सिंह थापा की अगुवाई में इस मंदिर के भव्य गर्भगृह और मुख्य ढांचे का निर्माण कराया गया था। समय की थपेड़ों को झेलने के बाद, हाल के वर्षों में स्थानीय भक्तों, प्रवासियों और मंदिर समिति के सामूहिक सहयोग से इस परिसर का भव्य जीर्णोद्धार किया गया है, जिससे आज यह मंदिर कलात्मक और अलौकिक रूप में नजर आता है।

नवरात्रि में उमड़ता है आस्था का सैलाब...कंसमर्दिनी मैया को इलाके में सुख, शांति और समृद्धि की देवी माना जाता है। विशेष रूप से जिन दंपत्तियों को संतान सुख की प्राप्ति नहीं होती, वे यहां आकर विशेष मन्नत मांगते हैं और मां की कृपा से उनकी झोली भर जाती है।

चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान यहां का माहौल पूरी तरह उत्सवमय हो जाता है। इन नौ दिनों में दूर-दूर से श्रद्धालु कन्या पूजन और अनुष्ठान के लिए पहुंचते हैं।

ताम्रपत्र से क्यों ढंकी रहती है मूल मूर्ति?
कंसमर्दिनी मंदिर का सबसे बड़ा और अनोखा रहस्य इसके गर्भगृह में छिपा है। यहां देवी की जो प्राचीन मूर्ति है, वह प्राकृतिक शिलाखंड पर एक नग्न कन्या के स्वरूप में अंकित है।

मर्यादा और पौराणिक विधान के अनुसार, इस नग्न कन्या स्वरूप मूर्ति को कभी भी खुला नहीं छोड़ा जाता। यही कारण है कि सदियों से इस दिव्य विग्रह को हमेशा एक विशेष ताम्रपत्र (तांबे के बर्तन) से ढंककर रखा जाता है। केवल मुख्य पुजारी ही विशिष्ट पूजा के समय इस व्यवस्था का संचालन करते हैं।

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