पिछड़े नेता अगड़ों से आगे तो क्या जरूरत ओबीसी आरक्षण की: आरक्षण का खेल नहीं, अब सुधार की करें बात
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
एक हिंदी फिल्म का गीत है-‘जिधर देखूं तू ही तू नजर आती है...।’ इसी तर्ज पर मध्य प्रदेश के लिए कहा जा सकता है, जिधर देखें पिछड़ा ही पिछड़ा नजर आता है...। लेकिन प्रदेश के बेचारे पिछड़े राजनेता इतने समृद्ध हो गए हैं कि अगड़े धन कुबेरों से कहीं आगे निकल गए हैं।
ऐसी स्थिति में ओबीसी वर्ग के लोगों को जितना आरक्षण मिला है पर्याप्त है। नेताओं के पीछे अंधभक्त जनता को अपने पिछड़ेपन पर गर्व होना चाहिए कि उनकी बदौलत उनके पिछड़े होने के कारण उनके राजनेता इतने समृद्धिशाली हो चुके हैं कि अब आरक्षण की जरूरत ही नहीं रह गई।
यही कोर्ट ने भी कहा है कि सब तरफ तो पिछड़े नेता ताकतवार संवैधानिक पदों पर विराजमान है, फिर किस बात का झगड़ा है...। हमारा प्रदेश दसों दिशाओं में चहुंओर पिछड़ा हुआ है। ऐसे मंे आरक्षण और ओबीसी को लेकर पक्ष-विपक्ष को चिंतित होने की क्या जरूरत है।
राजनीति में प्रदेश और प्रदेश की जनता को इतना पिछड़ा हुआ रखा है कि इस सदी में भी प्रदेश अगड़ा यानी सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरण रूप से समृद्ध नहीं हो पाएगा। यदि राजनीति के यही हालात रहे तो लगता नहीं है कि राजनीति आरक्षण के नाम पर अपना गंदा खेल खेलना बंद करेगी।
युवा और पिछड़े ही कहने लगे हैं कि प्रगतिशील दुनिया से बराबरी करने के लिए अब आरक्षण के जिन्न को बोतल से बाहर निकालने का कोई मतलब नहीं है।
राज्य को गंदी राजनीति के खिलाड़ियों ने आरक्षण को बारूद का ढेर बनाकर रखा है, जिसमें जब चाहे तब आग लगा सकते हैं। यह बात जनता को भी समझना चाहिए।
अगड़े और पिछड़ों की राजनीति के खेल में माहिर नेताओं ने सोची-समझी साजिश से मध्य प्रदेश को बीमारू और पिछड़ा रखा है। हर तरफ और हर तरह से यह अजब-गजब राज्य पिछड़ा है। अगड़े हैं, जो बेचारे बहुत पिछड़े थे।
भ्रष्ट राजनीति के इस प्रदेश में जब पार्षद से लेकर विधायक, मंत्री, सांसद और मुख्यमंत्री तक पिछड़े रहे हैं, इन नेताओं की समृद्धि क्या यह साबित नहीं करती कि अब प्रदेश को पिछड़ा आरक्षण की जरूरत नहीं है?
पिछड़ों की आरक्षण राजनीति के सहारे नेता इतने आगे जा चुके हैं कि पिछड़े प्रदेश को इन राजनेताओं के किए-धरे पर गर्व होना चाहिए कि जिस जनता के, प्रजा के सेवक जनप्रतिनिधि पिछड़े होने के बावजूद धन कुबेरों को पीछे छोड़ चुके हैं, वह कितना समृद्ध होगा!
तो प्रजा भला कैसे पिछड़े रहेगी। फिर कोर्ट ने क्या गलत कहा है, जिसे चुनौती देने के लिए विपक्षी दल बावले हो रहे हैं। सत्ता पक्ष भी डरा हुआ है, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। युग परिवर्तन और विज्ञान व टेक्नोलॉजी के इस दौर में मंडल-कमंडल की तरह आरक्षण की आग में राजनीति की रोटियां सेंकने का धत्कर्म बंद होना चाहिए।
ऐसा इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि राजनीति की आग में रोटियां सेंकते हुए इन्होंने अपनी और अपनी सात पुश्तों के लिए राजनीति और सत्ता में बने रहने के लिए इतने भारी-भरकम इंतजाम कर लिए हैं कि इनके आगे अगड़े भी दूर-दूर तक नहीं ठहर सकते। यह राजनेता प्रजा की सेवा में पिछड़े नहीं रह जाएं, इसलिए दलबदल के खेल में भी पीछे नहीं रहते।
उनकी कोशिश यही रहती है कि सरकार कोई भी रहे, यह पिछड़े नहीं रह जाएं, क्योंकि बेचारी जनता को पिछड़े वर्ग से आगे वर्ग में ले जाना जो चाहते हैं और इसीलिए आरक्षण के कर्मकांड करते हुए पाए जाते हैं, ताकि आरक्षण का कभी अंत न हो पाए।
इनका और प्रदेश की राजनीति का बस चले तो मंडल-कमंडल के दावानल जैसा वातावरण सत्ता के लिए फिर से खड़ा करवा दें। इतनी सारी बात इसलिए कि जबलपुर हाई कोर्ट का आरक्षण पर आया फैसला राज्य के राजनीतिक और प्रशासनिक इतिहास में एक मील का पत्थर है। इसके आधार पर आरक्षण को लेकर मापदंडों इत्यादि पर पुनर्विचार होना चाहिए। यह समय की जरूरत है।
युवा वर्ग का मानना है कि फैसला जेन-जी और युवाओं के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है और ऐसा होना भी चाहिए। राजनीति को समझ लेना चाहिए कि समाज को बांटने वाली राजनीति जेन-जी को मंजूर नहीं।
इसी राजनीति ने प्रदेश ही नहीं, देश की भी दुर्गति की हुई है। युवाओं को दिशाहीन कर दिया है। इस निर्णय का सबसे बड़ा असर युवाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों पर पड़ेगा।
भर्ती प्रक्रियाओं में स्पष्टता... पिछले कई वर्षों से मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग और अन्य राज्य परीक्षाओं के परिणाम कोर्ट में लंबित मामलों की वजह से अटके या अनिश्चित थे। इस फैसले से कानूनी स्थिति स्पष्ट हुई है, जिससे रुकी हुई नियुक्तियों के रास्ते खुलेंगे।
योग्यता और अवसर का संतुलन... जेन-जी (आज की युवा पीढ़ी) पारदर्शिता, समय पर परीक्षा और बिना अदालती चक्करों के पारदर्शी चयन प्रक्रिया चाहती है। नीतिगत अनिश्चितता खत्म होने से युवाओं का सिस्टम पर भरोसा लौटता है।
पुनर्विचार का समय... यह फैसला नीति-निर्माताओं को संदेश देता है कि आरक्षण नीतियों को केवल राजनीतिक वादों के आधार पर बढ़ाने के बजाय ठोस सर्वे, जातिगत डेटा और संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहकर ही लागू किया जा सकता है।
विपक्ष (कांग्रेस) का हमला
कांग्रेस का तर्क है कि 2019 में कमल नाथ सरकार के समय 27% आरक्षण का प्रावधान लाया गया था, जिसे मौजूदा भाजपा सरकार अदालत में सही तथ्यों के साथ बचा नहीं सकी।
सत्तापक्ष (भाजपा) का रुख
सरकार का कहना है कि यह मामला कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़ा है और इस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील करेंगे।
राजनीतिक फायदा-नुकसान
ओबीसी वर्ग मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा वोट बैंक है। कोई भी दल इस वर्ग को नाराज नहीं करना चाहता, इसलिए दोनों ही प्रमुख दल खुद को ओबीसी हितैषी और दूसरे को आरक्षण विरोधी साबित करने में जुट गए हैं। सकारात्मक पहलू…
लोकतंत्र में उपेक्षित या सामाजिक-शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की आवाज उठाना और उनके अधिकारों के लिए नीतिगत लड़ाई लड़ना राजनीतिक दलों का कर्त्तव्य माना जाता है। राजनीतिक दबाव के बिना सामाजिक सुधारों की गति धीमी हो जाती है।
यह भी स्पष्ट है कि जब राजनीतिक दल ठोस संवैधानिक आधार और प्रशासनिक डेटा तैयार किए बिना केवल वोट बैंक के लिए लोक-लुभावन घोषणाएं करते हैं, तो अंततः कानून के समक्ष वे टिक नहीं पातीं।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (जबलपुर) की डिवीजन बेंच (जस्टिस आनंद पाठक और विनय सराफ) द्वारा दिए गए 159 पन्नों के ऐतिहासिक फैसले ने राज्य की राजनीति, प्रशासनिक भर्ती प्रक्रियाओं और सामाजिक-संवैधानिक विमर्श को एक नया मोड़ दे दिया है।
अदालत ने 2019 के संशोधन अधिनियम को असंवैधानिक घोषित करते हुए ओबीसी आरक्षण को 27 प्रतिशत से घटाकर पुनः 14 प्रतिशत पर सीमित कर दिया है।
मध्य प्रदेश में लगभग 50-52% ओबीसी आबादी का हवाला देकर 27% आरक्षण की मांग की जाती रही है। फैसले के आते ही राज्य में राजनीतिक बयानबाजी और दोषारोपण का दौर शुरू हो गया है।
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