अरे ओ भिया, जरा संभलकर: घर पर कोई इंतजार कर रहा है; इंदौर में हर साल 300 लोग गंवा रहे जान
KHULASA FIRST
संवाददाता

राजकुमार जैन स्वतंत्र लेखक खुलासा फर्स्ट।
जरा संभलकर, घर पर कोई इंतजार कर रहा है। शहर के चौराहों पर यह आवाज किसी प्रशासनिक लाउडस्पीकर की नहीं, बल्कि उस कड़वी हकीकत की है, जिससे हम हर दिन नजरें चुराकर गुजर जाते हैं।
यातायात प्रबंधन विशेषज्ञ राजकुमार जैन द्वारा शहर के चौराहों से साझा किए गए कुछ दृश्य हमारी इसी खतरनाक लापरवाही की गवाही दे रहे हैं। ये तस्वीरें बताती हैं कि हम सड़कों पर न सिर्फ अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं, बल्कि दूसरों के लिए भी काल बन रहे हैं।
आंकड़े बेहद डरावने हैं। देश में हर 3 मिनट में एक व्यक्ति सड़क हादसे में दम तोड़ रहा है। मध्य प्रदेश की बात करें तो यह आंकड़ा लगभग 50 मौतें प्रतिदिन का है, जबकि अकेले इंदौर में हर साल 300 लोग सड़कों पर अपनी जान गंवा देते हैं।
यानी मौत हर दिन किसी न किसी के घर का दरवाजा खटखटा रही है। अगर हमारी लापरवाही का यही आलम रहा, तो अगली आहट किसी के भी दरवाजे पर हो सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, सड़क सुरक्षा को लेकर आम जनता के मन में कई गलत पूर्वाग्रह घर कर चुके हैं।
लोग अक्सर सोचते हैं "यातायात नियमों का पालन करना मेरा काम नहीं, पुलिस का है। वे इसी बात की तनख्वाह लेते हैं।" बड़ा सवाल: प्रशासन की नाकामी या पुलिस की कोताही के खिलाफ आवाज उठाना लोकतंत्र में जनता का अधिकार है, लेकिन क्या इस नाकामी को आधार बनाकर हमें नियम तोड़ने का अधिकार मिल जाता है?
चौंकाने वाली बात यह है कि रेड लाइट जंप करने या रॉन्ग साइड जाने के बाद हमारे भीतर कोई पछतावा नहीं होता, बल्कि एक झूठा ‘विजेता भाव' (जीतने का अहसास) पैदा होता है। अपनी और दूसरों की सुरक्षा के लिए इस मानसिकता को तुरंत बदलने की जरूरत है।
यातायात नियमों का आविष्कार सड़कों पर सुरक्षित सफर के लिए हुआ था, न कि किसी पर बंदिशें लगाने के लिए। विशेषज्ञों का मानना है कि जहां एक तरफ जनता को सुधरना होगा, वहीं दूसरी तरफ पुलिस को भी अपनी कार्यप्रणाली में बदलाव करना होगा।
वर्तमान में चौराहों पर पुलिस केवल चालान काटते हुए ही ज्यादा सक्रिय दिखाई देती है, जबकि जरूरत सख्ती और जागरूकता के साथ-साथ बेहतर ट्रैफिक मैनेजमेंट (प्रबंधन) की है। जब तक व्यवस्था और जनभागीदारी दोनों पटरी पर नहीं आएंगे, तब तक इंदौर की सड़कों को सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)
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