आदतन भ्रष्ट था गोरखे: न डीन डॉ. घनघोरिया ने ध्यान दिया, न यादव ने
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
एमवाय अस्पताल के फार्मासिस्ट राकेश गोरखे के घर ईओडब्ल्यू की छापामारी में मिले खजाने को लेकर कई सवाल उठ खड़े हुए हैं। बताया जाता है कि वो आदतन भ्रष्ट था और जहां भी पदस्थ रहा, अपनी आदत से बाज नहीं आया।
लेकिन फिर भी उस पर न तो मेडिकल कालेज के डीन डॉ. अरविंद घनघोरिया ने ध्यान दिया और न एमवाय के डीन डॉ. अशोक यादव ने। उनके पूर्ववॢतयों तक भी उसकी शिकायतें पहुंची थी, लेकिन कोई एक्शन नहीं लिया गया। जिसका फायदा वो उठाता रहा।
कल सुबह ईओडब्ल्यू ने एमवाय अस्पताल के फार्मासिस्ट राकेश गोरखे पर शिकंजा कसा तो उसके पास आय से कहीं गुना ज्यादा संपत्ति मिली। वो एमजीएम मेडिकल कालेज और एमवाय अस्तपाल दोनों के लिए खरीदी करता था।
इस छापे के बाद दोनों संस्थानों में खरीद-फरोख्त संदेह के घेरे में आ गई है। ईओडब्ल्यू ने उसके व परिवार की वैध आय को 1.11 करोड़ रुपए आंका जबकि उसके पास जो संपत्तियों का रिकार्ड मिला वो 2.13 करोड़ का है।
अभी उसकी जांच जारी है और माना जा रहा है कि ये आंकड़ा 2.50 करोड़ पार हो सकता है। बताया जाता है कि गोरखे को 2007 में एमवाय अस्पताल में फार्मासिस्ट के पद पर नियुक्त किया गया था। शुरू में तो वो सीधा था लेकिन बाद में भ्रष्ठ हो गया।
अभी उसकी स्थिति ऐसी थी कि किसी भी डॉक्टर से कोई भी काम हो वो करवाने का दम भरता था। 2008 में उसे एमजीएम मेडिकल कॉलेज की क्रय शाखा का प्रभार भी दे दिया गया। इसके बाद तो वो खुलकर भ्रष्टाचार करने लगा।
2012 में तत्कालीन डीन डॉ. पुष्पा वर्मा की मेहरबानी से उसने अपना गोरखधंधा खूब चलाया। दवाइयों, मेडिकल उपकरणों और अन्य खरीदी प्रक्रिया में उसकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही। चालक गोरखे दस्तावेजों पर खुद हस्ताक्षर नहीं करता था। यानी खरीदी की सौदेबाजी तो वो करता लेकिन कागजों पर कहीं उसका नाम नहीं रहता था।
डीन बदले, लेकिन गोरखे नहीं
एमवाय अस्पताल के डीन बदलते रहे, लेकिन गोरखे नहीं बदला। डीन बदलने के बावजूद खरीदी प्रक्रिया में उसकी भूमिका न बदली न कम हुई। डॉ. एमके राठौर और डॉ. शरद थोरा की मेहरबानी या यूं कहें कि अनदेखी का वो फायदा उठाता रहा। कहा जाता है कि उसने ऐसा नेटवर्क तैयार कर लिया था, जिसमें दवाइयों और उपकरणों की खरीद प्रक्रिया बिना किसी बड़ी बाधा के संचालित होती रही। डॉ. ज्योति बिंदल के कार्यकाल में भी वो प्रमुख रहा।
दवाइयों और मेडिकल उपकरणों की आपूर्ति, खरीद और समन्वय का बड़ा हिस्सा उसके हाथ में था। दवा कंपनियों और सप्लायरों से नजदीकियां बढ़ाकर उसने खेल किए। वो डीन रहे डॉ. संजय दीक्षित का चहेता माना जाता था। वो अक्सर डीन के साथ दिखाई देता।
उसे नर्सिंग कॉलेज में पदस्थ किया गया, लेकिन उसकी सक्रियता एमजीएम मेडिकल कॉलेज में ही बनी रही। हालांकि बाद में जब डॉ. अरविंद घनघोरिया डीन बने तो गोरखे की प्रशासनिक पकड़ कमजोर पड़ने लगी और दोनों के बीच तालमेल नहीं बैठ सका। लेकिन इसके बावजूद उसकी भ्रष्टाचार की करतूतें जारी रहीं।
थाईलैंड यात्रा पर भी गया था गोरखे
छापे में जब्त पासपोर्ट से पता चला कि वो अक्टूबर 2023 में थाईलैंड की यात्रा भी कर चुका है। इसके लिए उसने विभागीय अनुमति नहीं ली। यात्रा का खर्च भी जोड़ा जा रहा है। संपत्तियों के दस्तावेज, बैंक पासबुक, रजिस्ट्री की प्रतियां, पासपोर्ट और 1.51 लाख भी जब्त किए गए हैं।
27 जून 2025 को एमजीएम मेडिकल कॉलेज में डीन के निजी सहायक भावेश उपाध्याय को उसने बेल्ट से पीटा था। मामले की रिपोर्ट थाने में हुई थी। इसके बाद उसे निलंबित कर मानसिक चिकित्सालय, बाणगंगा में अटैच कर दिया गया लेकिन वो वहां भी अपनी भ्रष्ट करतूतों से बाज नहीं आया।
10 दिसंबर को उसे आरोप पत्र भी दिया गया। इसेस पूर्व विभागीय जांच भी हुई लेकिन गत 6 अप्रैल को उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। गोरखे मशीनों के रखरखाव को लेकर हुए घोटाले में भी शामिल रहा है।
तब तत्कालीन डीन डॉ. संजय दीक्षित, तत्कालीन प्रशासकीय अधिकारी (वित्त) दिव्या शर्मा, संदीप वसावा और राकेश गोरखे के बीच मिलीभगत के आरोप लगाए गए थे। मामला ये था कि एचएलएल हाईट्स कंपनी को मशीनों के रखरखाव के लिए भुगतान किया गया, जबकि कई विभाग खराबी की शिकायत करते रहे और सुधार नहीं हुआ।
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