करोड़ों की सरकारी जमीन का फर्जी नामांतरण आदेश: निजी नाम पर दर्ज कर बेचने की कोशिश
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सांवेर तहसील के चित्तौड़ा गांव में करीब 20 करोड़ रुपए से अधिक कीमत की सरकारी जमीन को निजी नाम पर दर्ज कराने और बेचने का बड़े मामले का खुलासा हुआ है।
जांच में जमीन के नामांतरण से जुड़ा आदेश फर्जी पाया गया है। हैरानी की बात यह है कि इस जमीन पर सहकारी समिति से कर्ज भी लिया गया है।
मामला सामने आने के बाद राजस्व विभाग में हड़कंप मच गया है। अधिकारियों ने रिकॉर्ड की जांच शुरू कर दी है और जमीन को दोबारा सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
आवेदन से पहले ही तैयार हो गया फर्जी आदेश
जानकारी के अनुसार चित्तौड़ा गांव की सरकारी जमीन लंबे समय से रिकॉर्ड में निजी व्यक्ति के नाम दर्ज थी।
बाद में इस जमीन को दूसरे व्यक्ति को बेच दिया गया। जमीन खरीदने वाले ने नामांतरण के लिए नायब तहसीलदार कार्यालय में आवेदन किया।
लेकिन जांच में सामने आया कि आवेदन पर वास्तविक कार्रवाई होने से पहले ही नामांतरण का आदेश तैयार कर लिया गया था।
जुलाई 2025 में सांवेर के नायब तहसीलदार सीएल टाक के नाम से जारी आदेश में बताया गया कि तेजूबाई ने 1.456 हेक्टेयर जमीन राजेश वर्मा से खरीदी है।
इसमें 24 जून 2021 को हुई रजिस्ट्री के आधार पर तेजूबाई के नाम नामांतरण स्वीकृत किए जाने की बात लिखी गई थी। हालांकि जांच के दौरान यह आदेश फर्जी पाया गया।
असली आदेश में खारिज हुआ था नामांतरण
राजस्व रिकॉर्ड की जांच में पता चला कि इस मामले में वास्तविक आदेश 6 अक्टूबर 2025 को जारी हुआ था। केस नंबर भी वही था, लेकिन वास्तविक आदेश में नामांतरण आवेदन को खारिज कर दिया गया था।
आदेश के मुताबिक तेजूबाई और राजेश वर्मा दोनों ही सुनवाई के दौरान कोर्ट में उपस्थित नहीं हुए थे। वहीं पटवारी की रिपोर्ट में खुलासा हुआ संबंधित जमीन वर्ष 1956 से सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि जमीन सहकारी समिति में बंधक है और इस पर कर्ज भी चल रहा है। इसके अलावा जमीन को अहस्तांतरणीय बताया गया है, यानी इसका हस्तांतरण या बिक्री नियमों के विपरीत है।
सरकारी जमीन को निजी बनाने की कोशिश
तहसीलदार सीएल टाक ने बताया कि जुलाई 2025 में जारी नामांतरण आदेश पूरी तरह फर्जी है। उन्होंने कहा, संबंधित जमीन सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है और पहले हरिजन संस्था के नाम पर रही है।
उन्होंने बताया कि जमीन का रिकॉर्ड सुधारने और इसे दोबारा सरकारी दर्ज कराने के लिए फाइल उच्च अधिकारियों को भेजी गई है।
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि फर्जी आदेश के जरिए सरकारी जमीन की खरीदी-बिक्री करने का प्रयास किया गया।
राजस्व विभाग अब इस मामले में फर्जी दस्तावेज तैयार करने वालों और जमीन के रिकॉर्ड में हेरफेर करने वालों की भूमिका की जांच कर रहा है।
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