अपना घर गंदा न करें: नंबर वन शहर की सड़कों को बंधक बनाकर हक मांगना कितना न्यायसंगत
KHULASA FIRST
संवाददाता

सात बार के ‘स्वच्छता सिरमौर’ के माथे पर बदरंग दाग, क्या ऐसे बचेगा देश का सबसे साफ शहर?
सात आसमान छूते गौरव पर कचरे का दाग, हक की लड़ाई में क्यों लहूलुहान हो रही इंदौर की गरिमा?
कर्मचारियों के पसीने का हो सम्मान पर विरोध की आड़ में जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ एक गंभीर अपराध
हड़तालियों की जिद के बीच पिस रही जनता, जागरूक नागरिक आगे आएं, अपने इंदौर की साख बचाएं
हक की हुंकार अपनी जगह, पर इंदौर को बीमार करने का हक किसी को नहीं
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी उचित मांगों के लिए आवाज उठाना, विरोध दर्ज कराना या हड़ताल करना हर श्रमिक का संवैधानिक अधिकार है। सफाई कर्मचारियों की समस्याएं, उनके वेतन, सुरक्षा उपकरण और कार्यदशाओं से जुड़े मुद्दे पूरी तरह मानवीय और संवेदनशील हैं।
उनके इस हक की लड़ाई को कतई गलत नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि एक स्वच्छ समाज का निर्माण तब तक अधूरा है, जब तक उसे साफ रखने वाले हाथ खुद को उपेक्षित महसूस करें।
परंतु इस संघर्ष का जो स्वरूप सड़कों पर बिखरे कचरे के रूप में सामने आया, उसने इंदौर की आत्मा को ठेस पहुंचाई है। अपनी मांगों को मनवाने के लिए जानबूझकर सड़कों पर कचरा फैलाना या गंदगी फैलाकर दबाव बनाना किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।
यह न केवल इंदौर की उस गरिमा के खिलाफ है, जिसे हर इंदौरी ने सहेजकर रखा, बल्कि यह आम नागरिकों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ और एक गंभीर जन-अपराध भी है। जिस शहर की पहचान ही स्वच्छता से हो, वहां कचरे को हथियार बनाकर विरोध प्रदर्शन करना आत्मघाती कदम है।
अपने ही घर को गंदा करके कोई भी जंग नहीं जीती जा सकती। हक की हुंकार जरूर गूंजे, लेकिन उसकी कीमत पर इस देवतुल्य जनता के स्वास्थ्य और शहर के मान-सम्मान को दांव पर न लगाया जाए।
देश के सबसे स्वच्छ शहर के माथे पर लगा सात बार की देशव्यापी स्वच्छता का गौरवशाली तिलक आज सड़कों पर बिखरे कचरे और दुर्गंध के बीच धुंधलाता नजर आ रहा है। अपनी विभिन्न मांगों को लेकर सफाई कर्मचारियों की हड़ताल और उसके बाद उपजे हालात ने आज पूरे शहर को एक गंभीर संकट में डाल दिया है।
लोकतंत्र में हर वर्ग को अपनी जायज मांगों के लिए आवाज उठाने और विरोध दर्ज करने का पूरा अधिकार है। सफाई कर्मचारियों के पसीने की हर बूंद का सम्मान होना चाहिए और उनकी उचित समस्याओं का समाधान शासन-प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता होना चाहिए। उनके मानवीय अधिकारों की अनदेखी किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है।
परंतु अपने हक की इस लड़ाई में जिस तरह कचरे को ही हथियार बना लिया गया, उसने इंदौर की आत्मा और इसकी साख पर गहरा आघात किया है। अपनी मांगों को मनवाने के लिए जानबूझकर सड़कों पर कचरा फैलाना, डंपरों को पलटना और शहर को गंदगी के दलदल में धकेलना किसी भी दृष्टिकोण से न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। यह न केवल एक नागरिक के रूप में शहर के प्रति गद्दारी है, बल्कि जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने जैसा एक गंभीर अपराध भी।
जिस शहर ने दुनियाभर में स्वच्छता का एक अनुपम उदाहरण पेश किया, वहां विरोध प्रदर्शन का यह अमर्यादित रूप बेहद चिंताजनक है। यह समय उंगलियां उठाने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का है।
नगर निगम प्रशासन को चाहिए कि वह हठधर्मिता छोड़कर सफाई मित्रों की जायज मांगों पर मानवीय आधार पर तुरंत और ठोस निर्णय ले, ताकि गतिरोध समाप्त हो सके। वहीं सफाई कर्मचारी संगठनों को भी यह समझना होगा कि इंदौर की यह गरिमा किसी एक की नहीं, हम सबकी साझी विरासत है।
अपने ही घर को गंदा करके कोई भी जंग नहीं जीती जा सकती। हक की हुंकार जरूर गूंजे, लेकिन उसकी कीमत पर इस देवतुल्य जनता और शहर के मान-सम्मान को दांव पर न लगाया जाए।
इंदौर की जागरूक जनता से एक आत्मीय अपील
यह संकट की घड़ी इंदौर के आम नागरिकों के धैर्य और उनकी उस चेतना की भी परीक्षा है, जिसने इस शहर को ‘नंबर वन’ बनाया है। इंदौर की देवतुल्य जनता से अपील है कि इस कठिन समय में पैनिक न करे और न ही व्यवस्था को पूरी तरह चरमराने दे।
अगर सड़कें गंदी की जा रही हैं, तो नागरिक के तौर पर हमारा यह कर्त्तव्य बनता है कि हम अपने घरों का कचरा बाहर न फेंकें। गीला और सूखा कचरा अलग रखें और स्थिति सामान्य होने तक प्रशासन का सहयोग करें। इंदौर की गरिमा को किसी एक वर्ग के गुस्से के कारण बिखरने नहीं दिया जा सकता। यह शहर हमारा साझा घर है और इसकी साख को बचाना हम सबकी साझी जिम्मेदारी है।
देर रात जागा प्रशासन संवाद से थमा गतिरोध
शहर की साख को पूरी तरह मटियामेट होने से बचाने के लिए आखिरकार बुधवार देर रात प्रशासन को आगे आना ही पड़ा। रेसीडेंसी कोठी पर कलेक्टर शिवम वर्मा और निगमायुक्त क्षितिज सिंघल की मौजूदगी में हुई मैराथन बैठक के बाद सफाई कर्मचारियों की मांगों पर सहमति बनी और हड़ताल समाप्त हुई।
जहां महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने सड़कों पर कचरा फेंककर शहर की छवि खराब करने वाली ताकतों को आड़े हाथों लिया और कुछ मांगों को राज्य सरकार के अधीन बताया, वहीं निगमायुक्त ने साफ किया कि संवाद ही एकमात्र रास्ता था।
राहत की बात यह है कि सफाई मित्र काम पर लौट आए हैं, लेकिन प्रशासन को यह याद रखना होगा कि ऐसी नौबत दोबारा न आए।
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