कद से ऊंचे या मेहरबानी के बलबूते: कागजों पर सब फिट और धरातल पर नियम फुस्स
KHULASA FIRST
संवाददाता

क्या भीम सिंह कुशवाह और मितेंद्र सिंह परिहार की पदोन्नतियों की फाइलें खोलने से कतरा रहा है महकमा?
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
वन विभाग में इन दिनों गजब का खेल चल रहा है, जहां फाइलों में नियम इतने लचीले हो जाते हैं कि कद-काठी के पैमाने भी खुद-ब-खुद बदल जाते हैं। महकमे में चर्चा आम है कि जब भर्ती के लिए इंच टेप लेकर जवान खड़े होते हैं तो कुछ खास चेहरों के सामने ये पैमाने बदल जाते हैं?
क्या वन रक्षक से लेकर वनपाल तक की सीढ़ियां चढ़ने वाले भीम सिंह कुशवाहा और मितेंद्र सिंह परिहार की नियुक्ति के समय कागजों पर नहीं, बल्कि वास्तव में नियमों की कसौटी पर परखा गया था?
या फिर बिकाऊ एवं झोलाछाप पर्यवेक्षकों ने शासन स्तर के नियम-मापदंडों को ताक पर रखकर बिना पूरी कद-काठी और न्यूनतम ऊंचाई के ही नौकरी के आदेश जारी करने का खेल खेला?
अब जब महकमे के गलियारों में इन दोनों की पात्रता और शारीरिक मानकों को लेकर सुगबुगाहट तेज है तो क्या कोई अधिकारी इन सवालों का सीधा जवाब देने की हिम्मत जुटाएगा या फिर फाइलों को हमेशा के लिए लाल फीते में बांधकर दबा दिया जाएगा?
वन विभाग की नौकरी में वर्दी पहनना और जंगल की सुरक्षा का जिम्मा संभालना कोई बच्चों का खेल नहीं है, इसके लिए पुख्ता मानक तय किए जाते हैं, लेकिन भीम सिंह कुशवाह और मितेंद्र सिंह परिहार के मामले में यह देखना दिलचस्प होगा कि जब इनकी शुरुआती नियुक्तियां हुई थीं, तब क्या इंच टेप सचमुच हरकत में आया था या फिर बिकाऊ व झोलाछाप पर्यवेक्षकों की मिलीभगत से कागजी घोड़े दौड़ाकर सबको फिट घोषित कर दिया गया था?
सामान्य श्रेणी से ताल्लुक रखने वाले इन कर्मचारियों के पास ऊंचाई या शारीरिक दक्षता में ऐसा कौन सा जादुई कोटा था, जिसने सारे नियमों को बौना कर दिया? यदि भर्ती के वक्त मेडिकल परीक्षण और शारीरिक माप के रिकॉर्ड आज खंगाले जाएं तो कई खुलासे हो सकते हैं।
एक दिहाड़ी मजदूर थे कुशवाह... इस पूरे किस्से में भीम सिंह कुशवाह का अध्याय तो किसी फिल्मी ड्रामे से कम नहीं है। कभी वन विभाग में महज एक दिहाड़ी मजदूर और मस्टर कर्मी के तौर पर सेवाएं देने वाले कुशवाह की किस्मत का सितारा तब चमका, जब अधिकारियों की चापलूसी को ही उन्होंने अपनी सबसे बड़ी योग्यता बना लिया।
इसी जी हुजूरी के बल पर उन्होंने न केवल ड्राइवर की कमान संभाली,बल्कि नियमों की परवाह किए बिना वन रक्षक से वनपाल तक की सीढ़ियां भी फांद डालीं। सामान्य श्रेणी से ताल्लुक रखने और निर्धारित शारीरिक कद-काठी व ऊंचाई के पैमाने पर खरे न उतरने के बावजूद उन पर मेहरबानियों की बरसात होती रही।
चर्चा तो यहां तक है कि सांवेर क्षेत्र में तैनाती के दौरान कथित तौर पर अवैध वसूली और अनियमितताओं के चलते उन्हें निलंबित कर आलीराजपुर स्थानांतरित किया गया, लेकिन भ्रष्टाचार के इन दागों के बावजूद महकमे के भीतर उन्हें बचाने के लिए किस-किस ने फाइलें घुमाईं, यह जांच का विषय है।
नियमों की हर दीवार को आसानी से लांघ दिया... दूसरी तरफ मितेंद्र सिंह परिहार की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। अनुकंपा नियुक्ति के प्रावधान का लाभ उठाकर वन विभाग की दहलीज पर कदम रखने वाले परिहार ने भी नियमों की हर दीवार को बड़ी आसानी से लांघ दिया।
अनुकंपा का मूल उद्देश्य तो परिवार के भरण-पोषण में मदद करना होता है, लेकिन यहां तो अनुकंपा को ही सीधे तरक्की का परमिट बना लिया गया। शारीरिक दक्षता और ऊंचाई के तमाम अनिवार्य मानदंडों को दरकिनार करते हुए वे न केवल वनपाल के पद पर आ गए, बल्कि उन्हें तलाई सब रेंज में प्रभारी डिप्टी रेंजर की जिम्मेदारी भी सौंप रखी है।
जिस कर्मचारी की शुरुआती पात्रता और फिटनेस पर ही गंभीर सवालिया निशान हों, उसे इतनी बड़ी रेंज का प्रभार सौंपना किस प्रशासनिक मजबूरी का हिस्सा है? क्या महकमे के वरिष्ठ अधिकारियों को यह सब नजर नहीं आता या फिर आंखें मूंदकर आदेश जारी करना ही उनकी कार्यशैली बन चुकी है?
निष्पक्ष जांच कर कार्रवाई की जाएगी
मामले में कर्मचारियों की नियुक्ति,शारीरिक मापदंडों और पदोन्नति से जुड़ी जो भी जानकारियां सामने आई हैं उनका विभागीय नियमों और सेवा अभिलेखों के आधार पर गंभीरता से परीक्षण कराया जा रहा है।
यदि किसी भी स्तर पर निर्धारित मानकों की अनदेखी या नियमों के विपरीत जाकर प्रक्रिया अपनाए जाने की पुष्टि होती है तो शासनहित और प्रशासनिक पारदर्शिता को सर्वोपरि रखते हुए नियमानुसार निष्पक्ष जांच कर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। - पीएन मिश्रा, सीसीएफ वन वृत्त इंदौर
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