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‘मेम साब’ माया पर भाजपा की अजब-गजब ‘माया’: केंद्रीय मंत्री के घर के सामने विधायक का धरना

Khulasa First

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संवाददाता

06 अक्टूबर 2026, 3:05 pm
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‘मेम साब’ माया पर भाजपा की अजब-गजब ‘माया’

भाजपा और सरकार पर भारी माया

महिला अधिकारी को लेकर आमने-सामने आए कालू सिंह और सावित्री ठाकुर

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
कहते हैं ‘माया बड़ी ठगिनी...’! ( इस कहावत का सरोकार किसी के नाम या व्यक्ति से बिलकुल भी नहीं है।) फिर यह माया राजनीति की हो तो मायावी हो जाती है, जिसे समझना आसान नहीं रह जाता और ठगी की यह माया भाजपा की हो तो वह महाठग कही जाने लगती है।

जैसा आमतौर पर सुनने में आता है। राजनीतिक और वह भी भाजपा की माया की ठगी का नेता, मंत्री और उसके सांसद, विधायक द्वारा आखिर में प्रजा को शिकार बनाया जाता है। जैसा कि एक छोटे-से नगर धामनोद की प्रजा इस समय अपने आप को राजनीति की माया के आगे ठगा हुआ महसूस कर रही है, लेकिन राजनीति की माया तो मायावी होती है, इसलिए अंगद के पैर की तरह हमेशा बनी हुई है और ऐसा ही सिलसिला चलता रहा तो आगे भी बनी रहेगी।

यह कहानी है एक धारावाहिक की तरह, जहां प्रशासन और राजनीति के आगे प्रजा बेहाल है। कहानी नहीं, धारावाहिक बन गया है। इसमें भाई हैं, जीजी है, दादा है, हर तरह की राजनीति के पात्र इस धारावाहिक में हैं।

पहले भाई प्रभावित थे, अब वैसा नहीं प्रतीत होता, इसलिए जीजी को आगे किया हुआ लगता है, तो फिर इस स्थिति में दादा कैसे पीछे रह सकते हैं? वह भी खुलकर सामने आ गए हैं।

यह एक बहुत छोटे-से कस्बेनुमा नगर की कहानी है। यहां एक छोटे-से अधिकारी को हटाने के लिए पार्षद और जनता वर्षों से जोर लगा रही, लेकिन भाई के कारण बात नहीं बनी। जैसा कि कहा जाता है। विभाग के मंत्री का इसमें क्या रोल है पता नहीं, पर नाम आता है, बार-बार आता है।

विधायक कालू दादा ने अब मोर्चा खोला है कि यह अधिकारी वर्षों से यहीं हैं, इसलिए अब इन्हें हटाया जाए और उनकी शिकायतें भी बहुत हैं। इनकी बात भी नहीं बन रही, क्योंकि पार्श्व में जीजी आ गई हैं या उन्हें आगे कर दिया गया है।

जो भी हो, पेंच उलझ गया है, जो मुख्यमंत्री को भारी पड़ सकता है। इसकी वजह यह है कि अब सरकार का मजाक इस छोटे-से नगर की एक सीएमओ के कारण बनने लगा है। मध्य प्रदेश के धार जिले की धरमपुरी तहसील का एक समृद्ध, वाणिज्यिक और व्यापारिक नगर है धामनोद।

यहां की एक छोटी नगर परिषद है, लेकिन मोटा पैसा है। यीशु परिषद की प्रशासनिक मुखिया हैं माया मंडलोई। इसे अंग्रेजी में सीएमओ (चीफ म्युनिसिपल ऑफिसर) कहा जाता है। धामनोद, देखा जाए तो इंदौर-मुंबई राजमार्ग पर स्थित बड़ा व्यापारिक केंद्र है, लेकिन इसकी बदहाली बताती है कि इस सीधे-सादे, भोले-भाले गांव से नगर बने धामनोद को विकास का नहीं, भ्रष्टाचार का राजनीतिक अखाड़ा बना दिया गया है।

यह अखाड़ा इतना मजबूत है कि केंद्र, प्रदेश और विधायक तक यहां खुलकर अखाड़ेबाजी करते हैं और यह सब कुछ मात्र एक छोटे-से पद पर पदस्थ महिला अधिकारी के कारण हो रहा है। यह अधिकारी तो सरकारी नौकरी बजा रही है, लेकिन वह भाजपा की राजनीति, संगठन और सरकार से ऊपर व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है।

बीते कई वर्षों से ‘माया मैडम’ को लेकर विभागीय मंत्री से लेकर पार्षदों, संगठन के स्थानीय नेताओं और जागरूक नागरिकों का खुला व मौन युद्ध चल रहा है। इस अधिकारी के खिलाफ ढेर सारे आरोप और शिकायतें हैं।

ऐसा बताते हैं कि शिकायतें लोकायुक्त तक की गईं, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। विरोध, असंतोष और नगर की बदहाली देखते हुए तबादले भी हुए, लेकिन मैडम फिर लौट आईं या उन्हें अदृश्य राजनीतिक शक्तियों ने वापस भिजवा दिया?

जैसा लंबे समय से आरोप लगते रहे हैं और कहा जाता रहा है कि विभाग के मंत्री इस छोटी-सी परिषद में बहुत बड़ा इंटरेस्ट बने हुए हैं। उनका संरक्षण जग-जाहिर है, इसलिए धामनोद और धामनोद के नागरिकों व आसपास के ग्रामीणों को भी धामनोद नगर की गंदगी, खराब सड़क, अव्यवस्थित यातायात, स्वास्थ्य सेवा आदि बुनियादी सुविधाओं के संकट का सामना करना पड़ता है।

इन्हीं सब परिस्थितियों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप लगाए जाते हैं। इस मामले में बताया जाता है कि पहले विभागीय मंत्री का नाम लिया जाता था। इसके बाद संसद का, इसलिए सीएमओ को लेकर कहीं कोई सुनवाई नहीं होती थी।

मैडम किसी तरह से स्थानांतरित हुईं तो आदेश फिर रुक गया। विधायक कालूसिंह ठाकुर के पास भी शिकायतें पहुंची थीं और हो सकता है उनको भी भाजपा की स्थानीय गुटबाजी के कारण सीएमओ ने निराश किया, यानी उनकी सुनी नहीं होगी। वैसे भी एक पद पर 3 साल से अधिक समय तक बने रहने का प्रावधान नहीं है।

सब तरह के हालातों को देखते हुए विधायक ने मैडम को हटाने के लिए प्रयास किया। मैडम गईं जरूर, लेकिन वापस भी आ गईं। मतलब यह प्रशासनिक नहीं, बल्कि भाजपा की भ्रष्ट राजनीति और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का सवाल बन गई हैं। इतनी बड़ी ताकत तो किसी कलेक्टर के लिए भी नहीं लगती, जितनी माया मैडम के लिए भाजपा के विधायक, मंत्री और केंद्रीय मंत्री तक लगा रहे हैं।

विधानसभा और लोकसभा दोनों जनजातीय आरक्षित सीट हैं, इसलिए जनप्रतिनिधि बेबाकी से अपनी बात कहते हैं। वैसे भाजपा के बड़े नेता भी अक्सर कहते हैं कि पार्टी के अंदर लोकतंत्र है, इसलिए नेता और कार्यकर्ता अपनी बात कह देते हैं। जैसा धामनोद में हो रहा है। यह पार्टी और सरकार की लोकतंत्र व्यवस्था का सबसे अच्छा उदाहरण है।

जो भी हो, लेकिन भाजपा के वरिष्ठ स्थानीय नेता, जिन्होंने जिले और तहसील में भाजपा को खड़ा करने में जीवन खपा दिया, बताते हैं कि धामनोद सहित इलाके में विकास कार्य चिंताजनक है।

महिला अधिकारी माया मंडलोई को लेकर अब स्थानीय प्रशासन का विवाद सीधे भाजपा की अंदरूनी राजनीति का मुद्दा बन जाए, तो हालात की गंभीरता समझी जा सकती है। यह विषय चर्चा में इसलिए आया है कि धरमपुरी से भाजपा विधायक कालूसिंह ठाकुर ने नगर की समस्याओं और नगर परिषद की कार्यप्रणाली को लेकर मोर्चा खोलते हुए 9 अक्टूबर से केंद्रीय राज्यमंत्री एवं धार की सांसद सावित्री ठाकुर के निवास के सामने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की घोषणा की है। मीडिया रिपोर्ट बताती है कि

विधायक का मुख्य आरोप नगर परिषद की सीएमओ माया मंडलोई की कार्यप्रणाली को लेकर है। उनका कहना है कि लंबे समय से शिकायतों और विकास कार्यों से जुड़े मुद्दों को प्रशासन तथा पार्टी नेतृत्व के सामने उठाने के बावजूद समाधान नहीं हुआ। विधायक ने यह भी आरोप लगाया है कि सीएमओ को हटाने के प्रयासों के बाद भी उन्हें दोबारा पद पर बने रहने का अवसर मिला।

स्थानीय नेता बताते हैं कि असल सवाल अधिकारी का नहीं, संरक्षण की राजनीति का है।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि यदि विवाद केवल नगर परिषद की एक अधिकारी की कार्यप्रणाली को लेकर है, तो मामला विधायक और केंद्रीय मंत्री के बीच टकराव तक कैसे पहुंच गया?

विधायक कालूसिंह ठाकुर सार्वजनिक रूप से आरोप लगा रहे हैं कि माया मंडलोई को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होने के कारण उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पा रही। मीडिया रिपोर्ट बताती है कि दूसरी ओर केंद्रीय राज्यमंत्री सावित्री ठाकुर ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि विकास कार्य चल रहे हैं और अधिकारी के स्थानांतरण अथवा न्यायालयीन मामलों में उनकी कोई भूमिका नहीं है।

उन्होंने विधायक को बातचीत के लिए आमंत्रित भी किया है। यहीं से धामनोद का स्थानीय प्रशासनिक विवाद भाजपा की अंदरूनी शक्ति-समीकरण की कहानी बन गया है। एक तरफ विधायक, दूसरी तरफ केंद्रीय मंत्री और पीछे विभागीय मंत्री हो तो बात दूर तक जाएगी ही।

सत्तारूढ़ भाजपा के विधायक का अपनी ही पार्टी की केंद्रीय राज्यमंत्री के निवास के सामने भूख हड़ताल पर बैठने का फैसला सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम नहीं है। यह संकेत देता है कि स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधि और प्रशासन के बीच समन्वय की समस्या अब पार्टी के भीतर खुले टकराव तक पहुंच चुकी है।

विधायक का कहना है कि उन्होंने मुख्यमंत्री और प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों तक अपनी बात पहुंचाई, लेकिन अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। इसी कारण उन्होंने आंदोलन का रास्ता चुना है।

माया मंडलोई के पक्ष में न्यायालय का आदेश भी अहम कड़ी है। इस विवाद में एक दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष भी है। सीएमओ माया ने अपने खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों को राजनीतिक षड्यंत्र बताया।

उनका कहना है कि उनके खिलाफ पूर्व में कार्रवाई और शिकायतों के मामलों में उन्होंने न्यायालय का रुख किया और हाई कोर्ट से राहत मिली है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने लोकायुक्त से जुड़े एक मामले में भी हाई कोर्ट से स्टे मिलने की बात कही है।

इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आरोपों, प्रशासनिक आदेशों और न्यायालयीन आदेशों को अलग-अलग देखना जरूरी होगा। राजनीतिक संदेश इससे कहीं बड़ा है। धामनोद का विवाद अब तीन स्तरों पर देखा जा सकता है-

पहला- नगर विकास और प्रशासनिक जवाबदेही।

दूसरा- विधायक और प्रशासन के बीच अधिकार एवं समन्वय का प्रश्न।

तीसरा- भाजपा के भीतर स्थानीय नेतृत्व बनाम केंद्रीय राजनीतिक प्रभाव का टकराव।

खास बात यह कि विवाद किसी विपक्षी सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि भाजपा के विधायक और भाजपा की ही केंद्रीय मंत्री के बीच सार्वजनिक रूप से सामने आया है। विपक्ष के नेता उमंग सिंघार ने भी इसी बिंदु को पकड़कर भाजपा पर हमला बोला है।

धामनोद का आंदोलन भाजपा के लिए ‘लोकल इश्यू’ से बड़ा क्यों?

अब निगाह 9 अक्टूबर पर... यदि विधायक 9 अक्टूबर को घोषित भूख हड़ताल पर बैठते हैं और आंदोलन लंबा चलता है, तो यह केवल माया मंडलोई के स्थानांतरण का प्रश्न नहीं रहेगा।

यह सवाल उठेगा कि भाजपा की सरकार में एक विधायक को अपनी ही पार्टी की केंद्रीय मंत्री के घर के सामने आंदोलन क्यों करना पड़ा? और यदि दूसरी ओर मंत्री यह स्पष्ट कर देती हैं कि अधिकारी के स्थानांतरण या पदस्थापना में उनका कोई हस्तक्षेप नहीं है, तो फिर विधायक के आरोपों का परीक्षण कर ट्रांसफर पर फैसला होना चाहिए।

हो सकता है माया मंडली खुद अपना कॅरियर इस राजनीति के कारण खराब करना नहीं चाहते हुए स्थानांतरण के पक्ष में हो, लेकिन यह भी हो सकता है उनके पक्ष में खड़ी राजनीतिक ताकत ऐसा नहीं होने दे रही हो। यही धामनोद विवाद को धार जिले की स्थानीय राजनीति से निकालकर भाजपा की अंदरूनी राजनीति का शर्मनाक विवाद बना देता है।

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