आस्था का हिसाब या सियासत का 'सेल्फ डिफेंस'?: दिग्विजय सिंह की सनातन स्वाभिमान यात्रा
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने 79 वर्ष की उम्र में एक बार फिर सड़कों पर उतरने की घोषणा की है। विजयादशमी (20 अक्टूबर) को उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर से शुरू होकर प्रभु श्रीराम की नगरी अयोध्या तक 904 किलोमीटर लंबी ‘सनातन स्वाभिमान यात्रा’ का ध्येय वाक्य रखा गया है- यतो धर्मस्ततो जयः अर्थात जहां धर्म है, वहां जीत निश्चित है।
भले ही दिग्विजय सिंह इसे 'चंदा चोरी और धर्म के नाम पर अधर्म के खिलाफ गैर-राजनीतिक जनजागरण' बता रहे हों, लेकिन इस यात्रा की टाइमिंग, रूट और पृष्ठभूमि को देखें तो यह यात्रा केवल आस्था का मामला नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश से लेकर उत्तर प्रदेश तक फैली सियासत की एक नई बिसात है।
मुद्दा जमीन पर: 70 हजार पन्नों की चार्जशीट बनाम 300 करोड़ की आशंका... इस यात्रा की सीधी जड़ अयोध्या राम मंदिर का चढ़ावा चोरी प्रकरण है।
एसआईटी की कानूनी रिपोर्ट : सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर गठित एसआईटी ने अदालत में करीब 70,000 पन्नों का आरोपपत्र दाखिल किया है। इसमें नकदी गिनती के दौरान 105 सीसीटीवी घटनाओं में हेराफेरी दर्ज पाई गई और पुलिस ने आरोपियों से 79.85 लाख नकद, डॉलर व आभूषण बरामद किए हैं। एसआईटी ने ट्रस्ट के वरिष्ठ पदाधिकारियों (चंपत राय व अनिल मिश्रा) को क्लीन चिट दी है।
सॉफ्ट हिंदुत्व से सनातन स्वाभिमान की ओर... दिग्विजय सिंह ने स्पष्ट किया है कि वे आरएसएस या विहिप की विचारधारा का समर्थन नहीं करते, लेकिन वे राम मंदिर के समर्थक रहे हैं और उन्होंने स्वयं दान दिया है।
संतों और भाजपा का रुख: दूसरी ओर, अयोध्या में हनुमानगढ़ी और तपस्वी छावनी से जुड़े कई संतों ने इसे विशुद्ध राजनीतिक स्टंट बताया है। वहीं भाजपा का कहना है कि दोषी कर्मचारियों पर एसआईटी कार्रवाई कर चुकी है, इसलिए आस्था पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।
2018 की नर्मदा परिक्रमा का फॉर्मूला: यह पहली बार नहीं है। सितंबर 2017 से अप्रैल 2018 के बीच दिग्विजय ने 3,300 किलोमीटर की नर्मदा परिक्रमा की थी। तब भी वह गैर-राजनीतिक थी, लेकिन उसने नर्मदा किनारे की 110 सीटों का समीकरण बदलकर 2018 में कांग्रेस को सत्ता की दहलीज तक पहुंचा दिया था।
घर की उलझन और 'डैमेज कंट्रोल' का दांव
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस यात्रा का समय पार्टी के अंदरूनी घमासान से गहरा ताल्लुक रखता है।
पार्टी के भीतर खींचतान: मई में एक सार्वजनिक बैठक में दिग्विजय सिंह द्वारा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी पर कसा गया तंज हो या जुलाई में प्रदेश महासचिव निधि चतुर्वेदी द्वारा हाईकमान से अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग कांग्रेस के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था।
निजी प्लान, पार्टी से दूरी: यह यात्रा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का आधिकारिक कार्यक्रम नहीं है। इसमें न तो कांग्रेस का झंडा होगा और न ही बैनर। दिग्विजय सिंह का यह कदम पार्टी के भीतर खुद पर बढ़ते दबाव से ध्यान हटाकर खुद को एक बड़े व्यापक अभियान में स्थापित करने का सोचा-समझा 'सेल्फ डिफेंस' दांव नजर आता है।
दिग्विजय के सवाल: दिग्विजय सिंह का दायरा एसआईटी की इस रिपोर्ट से बहुत आगे जाता है। वे 800 करोड़ से बढ़कर 2200 करोड़ हुई निर्माण लागत, ठेकों में 40 प्रतिशत कमीशन, जमीन डील और 1989 के रामशिला पूजन के चंदे का हिसाब मांग रहे हैं।
वे गबन का आंकड़ा 200 से 300 करोड़ रुपये होने की आशंका जताते हैं। कानूनी रूप से मामला अदालत में सिद्ध होना बाकी है, लेकिन राजनीतिक रूप से दिग्विजय सिंह इस मुद्दे को पारदर्शिता और दानदाता के अधिकार के रूप में पेश कर रहे हैं।
आगे के बड़े सवाल
पार्टी का रुख: क्या मध्य प्रदेश और केंद्रीय कांग्रेस नेतृत्व इस यात्रा से दूरी बनाए रखेगा या अंततः इसे अपना समर्थन देगा?
समय और दूरी: रोज 10-15 किमी चलने के हिसाब से 904 किलोमीटर की इस यात्रा में लगभग 2 से 3 महीने का समय लगेगा।
यूपी राजनीति पर असर: यात्रा का समापन उत्तर प्रदेश में होगा, जहां 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में अयोध्या पहुंचकर यह यात्रा क्या नया मोड़ लेगी, इस पर पूरे देश की नज़र रहेगी।
जानकारों का कहना है कि उज्जैन से अयोध्या की यह पदयात्रा अदालत की कानूनी कार्यवाही से परे जनता की अदालत में नैतिकता और हिसाब का सवाल खड़ा करने का प्रयास है।
यह दिग्विजय सिंह का एक ऐसा दांव है, जो अगर सही बैठा तो उनके सियासी जीवन को नया आधार देगा, और यदि भटका तो पार्टी और उनकी निजी राजनीति के सामने नई चुनौतियां खड़ी करेगा।
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