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‘वंदे मातरम्’ के साथ क्या’ जय हिंद’ को रोकेगी कांग्रेस...?

Khulasa First

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संवाददाता

02 जून 2026, 8:42 pm
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‘वंदे मातरम्’ के साथ क्या’ जय हिंद’ को रोकेगी कांग्रेस...?

आलोक मेहता वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट।
केरलम में सत्ता में आने के बाद राहुल गांधी और सतीशन की कांग्रेस सरकार विधानसभा के उद्घाटन सत्र में ही राष्ट्र गीत ‘वंदे मातरम्’ के पूरे 6 अंश को राज्यपाल के लिए तय प्रोटोकॉल नियमानुसार नहीं बजने देने और इस गीत को आरएसएस का बताए जाने पर कई आपत्तियों के साथ सवाल भी खड़े हुए हैं।

एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी उठा है कि अब अन्य राज्यों और 2029 में केंद्र में सत्ता के लिए ‘जय हिन्द’ और ‘हिंदुस्तान जिंदाबाद’ के नारों को भी राहुल गांधी की टीम सार्वजनिक कार्यक्रमों पर बंद करवा देगी? आखिर इनमें तो सीधे हिन्द और हिन्दू शब्दों का उपयोग है।

और यह आशंका आज मेरी ही नहीं है, बल्कि जनवरी 1946 में महात्मा गांधी ने गुवाहाटी के एक भाषण में व्यक्त की थी। महात्मा गांधी ने कहा था कि कांग्रेस की स्थापना के समय से ही वंदे मातरम् गाया जा रहा है। जो लोग इसका विरोध कर त्याग करने को कह रहे हैं, वे एक दिन जय हिन्द को भी त्याग देंगे। वंदे मातरम् का बहिष्कार नहीं होना चाहिए।

केरल विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण से पहले पुलिस बैंड द्वारा ‘वंदे मातरम्’ को पूरा न बजाकर केवल शुरुआती दो छंद (पुराना/संक्षिप्त हिस्सा) बजाने पर विवाद छिड़ा है’।

राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने इस बात पर नाराजगी जतायी कि जब वह संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) सरकार के नीतिगत अभिभाषण के लिए विधानसभा में मौजूद थे, तब ‘वंदे मातरम्’ पूरा नहीं गाया गया।

उन्होंने कहा कि ‘जब राज्यपाल ऐसे कार्यक्रमों में उपस्थित हों, तब उचित प्रोटोकॉल का पालन किया जाना चाहिए।’ राज्यपाल ने विधानसभा से लौटने के बाद लोक भवन में पत्रकारों से कहा कि यह पहले से तय था कि जब भी राज्यपाल सदन में मौजूद हों, तब ‘वंदे मातरम्’ पूरा गाया जाना चाहिए।

नीतिगत अभिभाषण से पहले और बाद में एक बैंड दल ने ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती अंतरे प्रस्तुत किए। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने इस वर्ष के प्रारम्भ में ही सरकार के सभी संस्थानों और राज्य सरकारों के लिए दिशा निर्देश जारी कर आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के पूरे छह अंश बजाना अनिवार्य कर दिया है ।

केरल के नए मुख्यमंत्री सतीशन ने इस मामले में संवाददाताओं के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि कांग्रेस और उसका यूडीएफ गठबंधन एक राजनीतिक विचारधारा के ढांचे के भीतर काम करते हैं और वे पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के फैसलों के अनुसार संचालित होते हैं।

उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व का स्पष्ट रुख है और वही गठबंधन पर भी लागू होता है।’ मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि ‘वंदे मातरम्’ को पूरा गाना अनिवार्य नहीं है, क्योंकि संसद ने इस संबंध में कोई कानून पारित नहीं किया है।

सवाल यह है कि क्या कांग्रेस पार्टी राष्ट्र गीत , राष्ट्रीय चिन्ह अथवा भारत सरकार द्वारा निर्धारित दिशा निर्देशों का विरोध इस हद तक करेगी और सरकार की संरक्षक बनी मुस्लिम लीग के निर्देशों का पालन करेगी?

मुस्लिम लीग तो आज़ादी से पहले भी वंदेमातरम का विरोध और मुस्लिम नागरिकों के लिए केवल मुस्लिम उम्मीदवार को वोट देने के अधिकार की मांग कर रही थी। संविधान निर्माताओं ने इसे ठुकरा दिया था ।

शायद राहुल गांधी और उनकी सलाहकार मण्डली इस बात को भी याद नहीं रखना चाहती कि बंकिमचंद्र चटोपाध्याय द्वारा लिखित गीत वन्देमातरम 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में ही पहली बार गाया गया।

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पहली बार इसे कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया। इसके बाद यह पूरे देश में प्रसिद्ध हो गया। उन्हीं टैगोर ने जिनके शांति निकेतन में कुछ समय इंदिरा गांधी ने शिक्षा भी ली।

1905 के बंगाल विभाजन आंदोलन के समय वंदे मातरम् ब्रिटिश शासन के विरोध का प्रमुख नारा बन गया। कांग्रेस कार्यकर्ता इसका प्रयोग करते थे। ब्रिटिश सरकार कई जगह इसके सार्वजनिक प्रयोग पर रोक लगाती थी।

कांग्रेस-अधिवेशनों के अलावा आजादी के आन्दोलन के दौरान इस गीत के प्रयोग के काफी उदाहरण मौजूद हैं। लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस ‘जर्नल’ का प्रकाशन शुरू किया था उसका नाम वन्दे मातरम् रखा।

अंग्रेजों की गोली का शिकार बनकर दम तोड़नेवाली आजादी की दीवानी मातंगिनी हाजरा की जिह्वा पर आखिरी शब्द वन्दे मातरम् ही थे। सन् 1907 में मैडम भीखाजी कामा ने जब जर्मनी के स्टुटगार्ट में तिरंगा फहराया तो उसके मध्य में वन्दे मातरम् ही लिखा हुआ था।

आर्य प्रिन्टिंग प्रेस, लाहौर तथा भारतीय प्रेस, देहरादून से सन् 1929 में प्रकाशित काकोरी के शहीद पं. राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ की प्रतिबन्धित पुस्तक क्रान्ति गीतांजलि में पहला गीत मातृ-वन्दना वन्दे मातरम् ही था।

वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं बल्कि भारत के राष्ट्रवादी आंदोलन का एक प्रमुख प्रतीक रहा है। इसके समर्थन और विरोध का इतिहास भारत की राजनीति, सांप्रदायिक संबंधों, स्वतंत्रता आंदोलन और आधुनिक राजनीतिक विमर्श से गहराई से जुड़ा हुआ है।

यह गीत जहां एक ओर लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा बना तब कुछ मुस्लिम नेताओं और मुस्लिम लीग ने राष्ट्र गीत की कुछ पंक्तियों पर आपत्ति जताई क्योंकि उनमें भारत माता को देवी स्वरूप में प्रस्तुत किया गया था। फिर बी आजादी के बाद 1950 में राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा को सम्बोधित करते हुए कहा- शब्दों व संगीत की वह रचना जिसे जन गण मन से सम्बोधित किया जाता है, भारत का राष्ट्रगान है; बदलाव के ऐसे विषय, अवसर आने पर सरकार अधिकृत करे और वन्दे मातरम् गान, जिसने कि भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभायी है; को जन गण मन के समकक्ष सम्मान व पद मिले।

मैं आशा करता हूं कि यह सदस्यों को सन्तुष्ट करेगा। (भारतीय संविधान परिषद, खंड 12, 24 जनवरी 1950। शुरुआती दौर में कांग्रेस पार्टी ने वंदे मातरम् को व्यापक रूप से अपनाया।

कुछ मुस्लिम नेताओं और संगठनों ने इस पर आपत्ति जतानी शुरू की। उनकी मुख्य आपत्तियां थीं कि गीत में भारत माता को देवी स्वरूप में दिखाया गया। कुछ पंक्तियों में देवी पूजा जैसी व्याख्या संभव थी। इसी कारण कांग्रेस नेतृत्व ने समझौता करने की कोशिश की। यानी कांग्रेस ने समर्थन और राजनीतिक समझौते दोनों किए।

दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने प्रारम्भ से वंदे मातरम् को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रमुख प्रतीक माना। संघ के दृष्टिकोण में यह राष्ट्रीय एकता का गीत है। इसका विरोध तुष्टीकरण की राजनीति का परिणाम माना गया।

इसे व्यापक राष्ट्रवादी पहचान से जोड़ा गया। संघ से जुड़े संगठनों ने स्कूलों, शाखाओं और कार्यक्रमों में इसका उपयोग जारी रखा। उसकी भारतीय जनसंघ पार्टी ने वंदे मातरम् को अनिवार्य राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में समर्थन दिया।

फिर भारतीय जनता पार्टी ने वंदे मातरम् को लगातार राष्ट्रीय पहचान से जोड़ा। नेताओं ने कई बार कहा कि वंदे मातरम् राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है । इसका विरोध राजनीतिक तुष्टीकरण है। इसे स्कूलों और सरकारी कार्यक्रमों में बढ़ावा मिलना चाहिए यह प्रतीकात्मक मातृभूमि की स्तुति है ।

वंदे मातरम् का इतिहास केवल एक गीत का इतिहास नहीं बल्कि भारत की राजनीति, राष्ट्रवाद, सांप्रदायिक संबंधों और लोकतांत्रिक समझौतों का इतिहास भी है। एक पक्ष इसे राष्ट्रीय गौरव और स्वतंत्रता संघर्ष की आत्मा मानता है। दूसरा पक्ष कहता है कि राष्ट्रवाद को किसी एक सांस्कृतिक प्रतीक तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

अब 26 अक्टूबर 2025 को ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘वंदे मातरम्’ गीत के इतिहास की देशवासियों को फिर से याद दिलाई और राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में 7 नवंबर से भारत सरकार की ओर से एक वर्ष तक अलग-अलग कार्यक्रमों का आयोजन करने का निर्णय लिया।

इन आयोजनों के माध्यम से देश भर में ‘वंदे मातरम्’ का पूर्ण गान के आयोजन हो रहे हैं, जिससे देश की युवा पीढ़ी ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के विचार को आत्मसात कर पाए।

संसद में वन्दे मातरम् पर लगभग 10 घंटे की की चर्चा हुई जिसमें प्रधानमन्त्री एवं अन्य सदस्यों ने भाग लिया। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ‘वंदे मातरम हजारों वर्ष की सांस्कृनतिक ऊर्जा भी थी। उसमें आजादी का जज्बा भी था और आजाद भारत का विजन भी था। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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