धर्मनगरी के इतने कुंडों का पानी नहाने लायक भी नहीं: फिकल कोलिफॉर्म तय मानक से कई गुना ज्यादा; एनजीटी सख्त, प्रशासन को 30 दिन के भीतर सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, उज्जैन।
सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के बीच धार्मिक नगरी उज्जैन से चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आई है। शहर के सात पवित्र कुंडों में से छह का पानी नहाने योग्य भी नहीं पाया गया है। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) की जांच में इन कुंडों के पानी में फिकल कोलिफॉर्म यानी मल संबंधी जीवाणु तय मानक से कई गुना अधिक मिले हैं।
सिंहस्थ में करोड़ों श्रद्धालुओं के उज्जैन पहुंचने की संभावना
हालात की गंभीरता को देखते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने उज्जैन प्रशासन को 30 दिन के भीतर सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।
सिंहस्थ के दौरान देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालुओं के उज्जैन पहुंचने की संभावना है। ऐसे में कुंडों के प्रदूषित पानी ने श्रद्धालुओं की आस्था के साथ उनकी सेहत को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
रत्नाकर सागर को छोड़कर सभी छह कुंड प्रदूषित
एमपीपीसीबी ने उज्जैन के सातों कुंडों के पानी की जांच कर रिपोर्ट एनजीटी के सामने पेश की थी। रिपोर्ट के मुताबिक रत्नाकर सागर को छोड़कर रुद्र सागर, क्षीर सागर, पुरुषोत्तम सागर, विष्णु सागर, पुष्कर सागर और गोवर्धन सागर के पानी की गुणवत्ता बेहद खराब मिली।
इन छह कुंडों में फिकल कोलिफॉर्म का स्तर निर्धारित मानकों से काफी अधिक पाया गया। कुल कोलिफॉर्म की मात्रा भी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के निर्धारित मानकों से अधिक मिली है।
कोलिफॉर्म की मौजूदगी सीवेज का संकेत
फिकल कोलिफॉर्म ऐसे जीवाणु हैं जो इंसान या जानवरों के मल से पानी में पहुंचते हैं। पानी में इनकी अधिक मात्रा आमतौर पर सीवेज या मल-मिश्रित पानी के प्रदूषण का संकेत देती है।
ऐसे पानी के संपर्क में आने से त्वचा और पेट से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए नहाने के पानी की गुणवत्ता जांच में फिकल कोलिफॉर्म को महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है।
एनजीटी ने पूछा- प्रदूषण की वजह क्यों नहीं बताई?
एनजीटी की भोपाल स्थित सेंट्रल बेंच ने 4 अगस्त को दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई की। इन याचिकाओं में उज्जैन के सप्त सागर यानी सात पवित्र कुंडों के पुनरुद्धार की मांग की गई थी।
सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल ने पानी में फिकल कोलिफॉर्म की अधिक मात्रा को गंभीरता से लिया। एनजीटी ने कहा कि पानी में कोलिफॉर्म का ऊंचा स्तर सीवेज प्रदूषण की ओर इशारा करता है, लेकिन एमपीपीसीबी की रिपोर्ट में इसके सटीक कारण स्पष्ट नहीं किए गए हैं। ट्रिब्यूनल ने यह भी सवाल उठाया कि यदि पानी की गुणवत्ता इतनी खराब है तो इसे सुधारने के लिए अब तक ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए।
कुंडों के आसपास अतिक्रमण भी बड़ी समस्या
एनजीटी ने कुंडों के आसपास हुए अतिक्रमण और अवैध निर्माण को भी प्रदूषण की संभावित वजह माना है। कई स्थानों पर कुंडों के आसपास निर्माण होने से गंदे पानी की निकासी प्रभावित हो रही है और सीवेज के कुंडों में पहुंचने की आशंका है।
ट्रिब्यूनल ने नगर निगम को अतिक्रमण हटाने के साथ-साथ कुंडों के आसपास की सीवेज व्यवस्था की जांच और जरूरी सुधार करने के निर्देश दिए हैं।
श्रद्धालुओं की आस्था और स्वास्थ्य पर सवाल
सिंहस्थ के दौरान इन कुंडों में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के स्नान करने की परंपरा है। ऐसे में प्रदूषित पानी में स्नान को लेकर स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं बढ़ गई हैं।
सुनवाई के दौरान एनजीटी की बेंच ने इस स्थिति को गंभीर माना। बेंच में जस्टिस शेव कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुर्वेदी शामिल थे। ट्रिब्यूनल ने श्रद्धालुओं को प्रदूषित पानी में स्नान कराने को उनकी सेहत और धार्मिक आस्था, दोनों के लिहाज से गंभीर विषय माना।
30 दिन में सुधार के निर्देश
एनजीटी ने उज्जैन नगर निगम आयुक्त को 30 दिनों के भीतर सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। इसमें कुंडों के आसपास का अतिक्रमण हटाना, सीवेज के प्रवेश को रोकना और पानी की गुणवत्ता सुधारने के ठोस उपाय करना शामिल है।
प्रशासन को अगली सुनवाई से पहले किए गए कार्यों की अनुपालन रिपोर्ट भी ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश करनी होगी।
बड़ी चुनौती
उज्जैन में सिंहस्थ 2028 की तैयारियां तेज हो चुकी हैं। ऐसे में शहर के पवित्र कुंडों के पानी की खराब गुणवत्ता प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि सिंहस्थ शुरू होने से पहले इन कुंडों को प्रदूषण से मुक्त कर पानी को श्रद्धालुओं के स्नान योग्य बनाने के लिए प्रशासन कितनी तेजी से काम करता है।
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