बगलामुखी मंदिर में सिस्टम का खेल: रसूखदारों की गोद में प्रशासन
KHULASA FIRST
संवाददाता

• करोड़ों के फंड के बावजूद भक्तों से चांदी और नकदी की कथित उगाही
खुलासा फर्स्ट, इंदौर/नलखेड़ा।
विश्व प्रसिद्ध मां बगलामुखी मंदिर एक बार फिर गंभीर विवादों के केंद्र में है। मंदिर के नाम पर कथित समानांतर व्यवस्था, दान और चढ़ावे में अनियमितताओं, लॉकर से बड़ी मात्रा में सोना-चांदी मिलने और गैर-शासकीय तत्वों की बढ़ती दखल के बीच अब मंदिर प्रशासन की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में आ गई है।
स्थानीय लोगों और शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि मंदिर की पवित्र व्यवस्था को कुछ रसूखदारों और अधिकारियों की कथित साठगांठ ने बंधक बनाकर रख दिया है।
पूर्व में विवादों के चलते तत्कालीन समिति अध्यक्ष को हटाए जाने के बाद उम्मीद थी कि मंदिर की व्यवस्थाओं में पारदर्शिता आएगी, लेकिन अब आरोप लग रहे हैं कि नई व्यवस्था भी पुराने प्रभावशाली समूहों के दबाव से मुक्त नहीं हो सकी।
सूत्रों के अनुसार, मंदिर प्रबंधन से जुड़े कुछ प्रभावशाली लोगों का वर्षों से ऐसा प्रभाव बना हुआ है कि प्रशासनिक निर्णय भी उनके हितों के अनुरूप लिए जा रहे हैं। आरोप यह भी हैं कि कुछ पूर्व अधिकारियों की भूमिका और उनके कार्यकाल में शुरू हुई व्यवस्थाओं की निष्पक्ष जांच अब तक नहीं हो सकी।
'रिमोट कंट्रोल' से चल रहा मंदिर प्रबंधन?
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि मंदिर की प्रशासनिक व्यवस्था पर कुछ पूर्व पदाधिकारियों और रसूखदारों का प्रभाव अब भी कायम है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कई महत्वपूर्ण निर्णय मंदिर हित से अधिक कुछ चुनिंदा लोगों के हितों को ध्यान में रखकर लिए गए। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार उठ रहे सवालों ने मंदिर प्रशासन की निष्पक्षता पर गंभीर संदेह खड़े कर दिए हैं।
बंद कमरों में रणनीति, बाहर भक्तों से उगाही?
मंदिर परिसर में कथित रूप से हुई कुछ बैठकों को लेकर भी चर्चाओं का बाजार गर्म है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि मंदिर की व्यवस्थाओं और प्रभावशाली पदों को लेकर बंद कमरों में रणनीतियां बनाई जा रही हैं, जबकि दूसरी ओर श्रद्धालुओं से गर्भगृह शुद्धिकरण, विशेष अनुष्ठानों और चांदी व्यवस्था के नाम पर धन एकत्रित किया गया।
यदि मंदिर के पास पहले से करोड़ों रुपये का फंड उपलब्ध था, तो फिर अतिरिक्त चांदी, नगदी और दान एकत्रित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? यही प्रश्न अब पूरे विवाद का केंद्र बन गया है।
पुस्तिकाओं के माध्यम से राशि संग्रहित की
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि मंदिर प्रशासन के पास पर्याप्त संसाधन होने के बावजूद श्रद्धालुओं से चांदी और नकद राशि की मांग की गई। आरोप यह भी हैं कि कथित मौखिक स्वीकृतियों के आधार पर समानांतर समितियां बनाई गईं और अलग-अलग रसीद पुस्तिकाओं के माध्यम से राशि संग्रहित की गई।
यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के साथ गंभीर खिलवाड़ माना जाएगा।
कलेक्टर के आदेशों को भी नजरअंदाज करने के आरोप
मंदिर से जुड़े लोगों का आरोप है कि ब्राह्मणों के पंजीयन और व्यवस्थाओं से जुड़े मामलों में जिला प्रशासन के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद कार्रवाई लंबित रखी गई। इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर किसके दबाव में निर्णयों को टाला गया और किन लोगों को इसका लाभ मिला? स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्रशासनिक आदेशों के बावजूद व्यवस्थाएं नहीं सुधर रहीं, तो फिर मंदिर में वास्तविक नियंत्रण किसके हाथ में है?
समानांतर व्यवस्था और बढ़ते सवाल
मंदिर में कथित रूप से गैर-अधिकृत व्यक्तियों, समानांतर धार्मिक गतिविधियों और विशेष अनुष्ठानों के नाम पर धन संग्रह की शिकायतें पहले से सामने आती रही हैं। अब जब लॉकर से बड़ी मात्रा में सोना-चांदी मिलने का मामला सामने आया है, तो पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की मांग और तेज हो गई है। श्रद्धालुओं का कहना है कि मां बगलामुखी मंदिर आस्था का केंद्र है, किसी समूह विशेष की निजी व्यवस्था नहीं।
जनता की प्रमुख मांगें
क्षेत्र के नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और श्रद्धालुओं ने निम्न मांगें उठाई हैं—
• पूरे मामले की उच्च स्तरीय SIT जांच कराई जाए।
• मंदिर में प्राप्त दान, चढ़ावे, स्वर्ण-रजत और बैंक खातों का विशेष ऑडिट कराया जाए।
• समानांतर समितियों और कथित वित्तीय लेनदेन की जांच की जाए।
• मंदिर प्रशासन और संबंधित अधिकारियों की भूमिका तय की जाए।
• यदि कोई अधिकारी या व्यक्ति दोषी पाया जाता है, तो उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।
अब जांच नहीं, कार्रवाई का इंतजार
मंदिर से जुड़े विवाद अब आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रह गए हैं। करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस मामले में बड़ा सवाल यह है कि क्या जांच के बाद कार्रवाई होगी या यह मामला भी अन्य विवादों की तरह फाइलों में दब जाएगा। मंदिर की पवित्रता और प्रशासनिक जवाबदेही अब कटघरे में है। आने वाले दिनों में जांच की दिशा और प्रशासनिक कार्रवाई यह तय करेगी कि सच सामने आएगा या फिर सवालों के बीच आस्था फिर जवाब तलाशती रह जाएगी।
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