यात्रा की पहली चढ़ाई से ठीक पहले का वो स्थान: जहां शिवजी ने पुत्र गणेश को रोककर अमरकथा का मार्ग निष्कंटक किया था
KHULASA FIRST
संवाददाता

अमरकथा से पहले पुत्र का त्याग: लिद्दर किनारे बसा ‘गणेश बल’, जहां से शुरू होती है शिव की विरक्ति
गाड़ियों के शोर में ओझल होता ‘गणेश बल’: अमरनाथ यात्रा का वो पौराणिक द्वार, जहां छंटते थे यात्रा के विघ्न...
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
पहलगाम से लगभग 16 किलोमीटर आगे लिद्दर (लंबोदरी) नदी के किनारे बसा चंदनवाड़ी, अमरनाथ यात्रा के पारंपरिक मार्ग का पहला आधिकारिक पड़ाव है। यहाँ मोटर गाड़ियाँ आकर रुक जाती हैं और यहां से श्रद्धालुओं की असली पैदल या खच्चरों-पालकियों की दुर्गम चढ़ाई शुरू होती है।
गाड़ियों की भागमभाग, लाउडस्पीकरों की आवाजें, पोनी-वालों (खच्चर चालकों) के सौदे और सुरक्षा बलों के निर्देशों के बीच चंदनवाड़ी का यह इलाका हमेशा आपाधापी से भरा रहता है। चंदनवाड़ी पहुंचने से ठीक पहले, लिद्दर नदी के तट पर एक ऐसा अति-प्राचीन स्थान स्थित है, जिसके दर्शन किए बिना पुराने समय में अमरनाथ यात्रा को अधूरा माना जाता था। इस स्थान को कश्मीरी भाषा में ‘गणेश बल’ कहा जाता है। कश्मीरी भाषा में नदी के घाट, तट या पावन स्थान को ‘बल’ कहा जाता है।
विडंबना यह है कि आधुनिक समय में अधिकांश यात्री यहां बिना रुके सीधे चंदनवाड़ी बेस कैंप पहुंच जाते हैं और इस ऐतिहासिक व पौराणिक महत्व वाले स्थल की अनदेखी कर आगे बढ़ जाते हैं।
कश्मीरी भाषा में ‘बल’ का अर्थ और पौराणिक संदर्भ...कश्मीरी भाषा और स्थानीय भूगोल में ‘बल’ शब्द का अर्थ होता है- स्थान, ‘तीर्थ’ या ‘पावन तट’। उदाहरण के लिए, जैसे ‘हज़रतबल’ का अर्थ हज़रत का स्थान है, वैसे ही ‘गणेश बल’ का अर्थ है श्री गणेश का पावन स्थान।
प्राचीन कश्मीरी ग्रंथों- भृंगेश संहिता और ‘अमरनाथ महात्म्य’ के अनुसार, जब भगवान शिव माता पार्वती को परम ज्ञान यानी ‘अमरकथा’ सुनाने के लिए अमरनाथ गुफा की ओर प्रस्थान कर रहे थे, तो वे चाहते थे कि कथास्थल पूर्णतः एकांत हो।
अमरकथा की परम पवित्रता और गोपनीयता बनाए रखने के लिए महादेव ने अपने सभी संगियों, आभूषणों और गणों का एक-एक कर त्याग करना शुरू किया। इसी क्रम में, जब वे लिद्दर नदी के इस तट पर पहुंचे, तो उन्होंने अपने प्रथम पूज्य पुत्र श्री गणेश को यहीं रुकने का आदेश दिया।
मान्यता है कि भगवान शिव ने विघ्नहर्ता गणेश को इस स्थान पर इसलिए स्थापित किया ताकि अमरनाथ यात्रा पर निकलने वाले श्रद्धालुओं के मार्ग में आने वाले सभी विघ्न और बाधाएँ दूर हो सकें। इसीलिए सनातन परंपरा में आज भी किसी भी शुभ कार्य या यात्रा से पूर्व गणेश पूजन का विधान है, जिसकी आधारशिला अमरनाथ यात्रा में इसी ‘गणेश बल’ पर रखी गई थी।
भौगोलिक सौंदर्य और प्राचीन शिला का अस्तित्व
भौगोलिक दृष्टि से गणेश बल का क्षेत्र अत्यंत मनोरम है। यहां लिद्दर नदी की दूधिया जलधारा पत्थरों से टकराती हुई तीव्र गति से बहती है। नदी के तट पर एक विशाल प्राकृतिक शिला (पत्थर) स्थित है, जिसे स्थानीय लोग और प्राचीन श्रद्धालु भगवान गणेश का प्राकृतिक स्वरूप मानते हैं।
प्राचीन काल में, जब पहलगाम से चंदनवाड़ी तक पक्की सड़कें नहीं हुआ करती थीं और श्रद्धालु पैदल ही यात्रा करते थे, तब छड़ी मुबारक (भगवान शिव की पवित्र गदा) के साथ चलने वाले साधु-संत और यात्री गणेश बल पर रुककर बाकायदा पूजन और आचमन करते थे। यहां विघ्नहर्ता से यात्रा के निर्विघ्न संपन्न होने की प्रार्थना की जाती थी, जिसके बाद ही पिस्सू टॉप जैसी प्राणघातक चढ़ाई की शुरुआत होती थी।
आपाधापी में छूटती पहली सांस्कृतिक परंपरा...आज के समय में चंदनवाड़ी तक सीधी सड़क बन जाने के कारण यात्री बसों और टैक्सियों में बैठकर गणेश बल के पास से तेज़ी से गुज़र जाते हैं।
अधिकतर लोगों को यह पता ही नहीं चल पाता कि जिस रास्ते से वे गुज़र रहे हैं, वह स्थान अमरनाथ कथा के ‘त्याग और विरक्ति’ के दर्शन का पहला पड़ाव है।
यात्रा के आध्यात्मिक मर्म को समझने वाले... विद्वानों का मानना है कि गणेश बल केवल एक पौराणिक कथा का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह यात्रा का ‘मानसिक द्वार’ है।
यह स्थान श्रद्धालु को यह संदेश देता है कि अपनी सांसारिक चिंताओं और पारिवारिक मोह-माया को गणेश जी के चरणों में सौंपकर ही व्यक्ति को शिव की अमरकथा के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।
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