विकास का दैत्य और मलबे में दबी सिसकियां...
KHULASA FIRST
संवाददाता

तरुण व्यास वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट।
अखबारों के पन्नों और सरकारी विज्ञापनों में जब भी ‘विकास’ शब्द चमकता है, तो दिल बैठ जाता है। इस शब्द से ही अब डर लगने लगा है। हमारे शहर के लिए विकास अब कोई मसीहा या खुशहाली का पैगाम नहीं रहा, बल्कि यह ‘विकास का दैत्य' बन चुका है।
एक ऐसा खूंखार और भूखा दैत्य, जिसका पेट केवल काक्रीट, लोहे या फ्लाईओवरों से नहीं भरता; इसे निगलने के लिए गरीबों और मध्यमवर्गीय परिवारों के आशियाने चाहिए।
नगर निगम की हालिया ‘अतिक्रमण हटाओ कार्रवाई’ इसी दैत्य की भूख का खूनी नतीजा है, जिसने शहर के एक बड़े हिस्से की लंबी यात्रों को चंद घंटों में मलबे के कब्रिस्तान में तब्दील कर दिया है।
अपनी आंखों के सामने अपने ही आशियाने को तिनका-तिनका बिखरते देखने की पीड़ा क्या होती है, इसे शब्दों के तराजू में नहीं तोला जा सकता। अपने सपनों को बिखरता देख लोग चीख-पुकार रहे थे।
जब पीला बुलडोजर आम आदमी की चौखट की तरफ बढ़ता है, तो ऐसा लगता है जैसे साक्षात यमराज उनकी छाती पर पैर रखने आ रहा हो। जिन घरों की दीवारों को सजाने के लिए लोग हर साल त्योहार पर नए ख्वाब बुनते थे, उन्हीं दीवारों को जब सिस्टम का क्रूर पंजा बेरहमी से नोंच रहा था, तो मानो ऐसा लग रहा था जैसे सीधे सीने में खंजर घोंप दिया गया हो।
आम आदमी के जीवन में मचाई जा रही इस विनाश-लीला का असली जिम्मेदार कौन है? क्या सिर्फ नगर निगम के वो कर्मचारी जो ‘ऊपर' का आदेश बजा रहे थे? बिल्कुल नहीं। इस तबाही के असली सूत्रधार हमारे शहर के जनप्रतिनिधि और यह असंवेदनशील सरकार हैं।
हर बार सवाल वही खड़ा होता है कि जब ये बस्तियां बसती हैं, मकान तनते हैं और निर्माण कार्य होते हैं, तब यह पूरा प्रशासनिक तंत्र कहां सोया रहता है? जब यहां बिजली के खंभे गाड़े गए, जब पानी के कनेक्शन बांटे गए और जब हर साल हमसे बाकायदा हाउस टैक्स और वॉटर टैक्स वसूला गया, तब क्या सरकारी फाइलों में यह अतिक्रमण नहीं था?
सच तो यह है कि जब-जब चुनाव आते हैं, यही पार्षद और विधायक हाथ जोड़कर इन्हीं गलियों की धूल फांकते नजर आते हैं। तब इन्हें यहां कोई अवैध निर्माण नहीं दिखता, तब इन्हें यहां सिर्फ अपना ‘वोट बैंक’ दिखाई देता है।
और आज? आज जब यह विकास का दैत्य आम आदमी की जीवनभर की कमाई का भक्षण कर चुका था तब विपक्ष के नेता सफेद कमीज पहनकर, बांह फड़काते हुए यहां ‘पॉलिटिकल पर्यटन' करने आए थे।
मानो इन्हें पहले से मालूम ही नहीं था कि नगर निगम के विनाश का काल किस ओर बढ़ने वाला है! इन्हें भी बस सत्ता चाहिए, वह भी जनता की असली आवाज बने बिना। इनकी राजनीति का स्टाइल भी गजब है-मानो किसी की मौत के बाद सिर्फ ‘तीसरे' की रस्म अदायगी करने आए हों। ऐसे ये लोकतंत्र और संविधान बचाएंगे और ऐसे बनेंगे ये जनता की आवाज! ऐसे जीतेंगे ये जनता का विश्वास?
आज जब जनता पर वज्रपात हुआ है, तो क्षेत्र के विधायक जी लापता हैं। महापौर ‘विकास' की गहरी नींद में सोए हुए हैं। जब नींद से जागते हैं रोजाना शहर भर में तबाही मचाई जाती है।
जिन हाथों को हमने अपनी हिफाजत के लिए चुना था, अफसोस कि आज उन्हीं हाथों ने हमारे आशियानों को ढहाने के क्रूर आदेशों पर दस्तखत किए हैं।
नगर निगम की इस बर्बर कार्रवाई ने सिर्फ ईंट और सीमेंट के ढांचे नहीं तोड़े, बल्कि इस लोकतांत्रिक व्यवस्था पर से आम आदमी के भरोसे को हमेशा के लिए चकनाचूर कर दिया है। सरकार जिसे ‘शहर का सौंदर्यीकरण’ कह रही है, वह वास्तव में एक मनमाना और भयानक विनाश है।
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