रंगमंच को पांच दशक देने का सम्मान: राष्ट्रपति इस शख्सियत को नवाजा; धार्मिक नगरी की रंगपरंपरा को मिली राष्ट्रीय पहचान
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, उज्जैन।
भारतीय रंगमंच को पांच दशक से अधिक समय देने वाले वरिष्ठ रंगकर्मी सतीश दवे को उनके लंबे और उल्लेखनीय नाट्य सफर के लिए राष्ट्रीय सम्मान मिला है।
नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें वर्ष 2024 के संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया। नाट्य निर्देशन के क्षेत्र में दवे के योगदान को मिली यह राष्ट्रीय मान्यता उज्जैन और मध्यप्रदेश के सांस्कृतिक जगत के लिए गौरव का विषय है।
सतीश दवे ने अपने पांच दशक लंबे रंगमंचीय जीवन में अनेक महत्वपूर्ण नाटकों का निर्देशन किया। उन्होंने रंगमंच को केवल प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि नई पीढ़ी के कलाकारों को प्रशिक्षित कर रंगपरंपरा को आगे बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके निर्देशन में मंचित नाटकों में सामाजिक सरोकार, सांस्कृतिक मूल्य और मानवीय संवेदनाओं को प्रमुखता मिली।
अनुशासन और समर्पण ने बनाई अलग पहचान
दवे की रंगयात्रा में कला के प्रति अनुशासन और निरंतर समर्पण प्रमुख रहा है। उन्होंने बच्चों से लेकर वयस्कों तक के लिए नाटकों की रचना और निर्देशन किया। उनके चर्चित नाटक ‘जयति पार्श्वनाथ’ का देशभर में एक हजार से अधिक बार मंचन हो चुका है
सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े अमित माथुर के अनुसार, दवे को मिले इस सम्मान पर नाट्य, सामाजिक और सांस्कृतिक जगत से जुड़े संगठनों, कलाकारों और गणमान्य लोगों ने उन्हें बधाई दी है। इस उपलब्धि को उज्जैन की समृद्ध रंगपरंपरा के लिए भी गौरवपूर्ण माना जा रहा है।
कला के साथ अध्ययन का भी व्यापक दायरा
सतीश दवे का जन्म 14 मार्च 1950 को उज्जैन में हुआ। उन्होंने संस्कृत, हिंदी, पुरातत्व और संग्रहालय विज्ञान में एमए किया। इसके अलावा मध्यप्रदेश नाटक लोक कला अकादमी, भोपाल से थिएटर आर्ट्स में डिप्लोमा प्राप्त किया। उन्होंने ललित कला के साथ सुगम और शास्त्रीय गायन का भी प्रशिक्षण लिया।
वर्तमान में वे मध्यप्रदेश स्कूल ऑफ ड्रामा में विजिटिंग फैकल्टी के रूप में जुड़े हुए हैं। दवे ने बीवी कारंत, शांता गांधी, केएन पणिक्कर, हबीब तनवीर, एमके रैना और बंसी कौल जैसे देश के दिग्गज रंगकर्मियों के साथ काम किया है।
मालवा के माच पर किया शोध
दवे ने मालवा की प्रसिद्ध लोकनाट्य परंपरा ‘माच’ और तुलनात्मक रंगमंच पर भी शोध किया है। उनकी पुस्तक ‘रंगमंच सरोकार’ एमए हिंदी के विद्यार्थियों के लिए संदर्भ पुस्तक के रूप में चर्चित रही है।
उन्होंने ‘रंगमंच सरोकार’, ‘मालविकानिमित्रम्’, ‘पर्यावरण की कहानी’, ‘कतरा-कतरा जिंदगी’, ‘एक भूला-सा सेनानी’ और ‘बात का बतंगड़’ सहित कई पुस्तकें लिखी हैं। उनकी कृति ‘गप्पू गोप गपंगुमदास’ भी चर्चित रही है।
पहले भी मिल चुके हैं कई सम्मान
रंगमंच और साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए सतीश दवे को पहले भी कई सम्मान मिल चुके हैं। वर्ष 2023 में उन्हें शिखर सम्मान और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
अब संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार उनके पांच दशक से अधिक लंबे रंगमंचीय सफर में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में जुड़ गया है।
राष्ट्रपति के हाथों मिले इस सम्मान से न केवल सतीश दवे की रंगसाधना को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है, बल्कि उज्जैन और मालवा की रंगपरंपरा को भी देश के सांस्कृतिक मानचित्र पर नई मजबूती मिली है।
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