खंडहरों में सांस लेता कश्मीर का गौरव: मार्तंड सूर्य मंदिर की अनकही दास्तान
KHULASA FIRST
संवाददाता

ललितादित्य के पत्थरों की गूंज: मार्तंड सूर्य मंदिर का वह गौरव, जो समय भी नहीं मिटा सका
इतिहास के पन्नों से झांकता वैभव: अमरनाथ मार्ग पर खड़ा वास्तुकला का सबसे भव्य खंडहर
84 स्तंभों का गणितीय
रहस्य: आस्था की राह में कश्मीर की प्राचीन इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना
पहाड़ी पठार पर थमा हुआ समय: मट्टन का वह सूर्य मंदिर जिसे हर अमरनाथ यात्री को देखना चाहिए
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
अमरनाथ यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं के कदम जब कश्मीर के अनंतनाग जिले से होकर गुजरते हैं, तो अधिकांश नज़रें पहाड़ों की गोद में बसी गुफा और बर्फानी राहों को तलाश रही होती हैं। लेकिन इसी मार्ग से कुछ ही दूरी पर, मट्टन के ऊंचे पठार (करेवा) पर समय का एक ऐसा गवाह खड़ा है जो कभी भारतीय वास्तुकला और कश्मीर के स्वर्णिम इतिहास का मुकुटमणि हुआ करता था।
यह है आठवीं शताब्दी का ‘मार्तंड सूर्य मंदिर’। आज भले ही यह मंदिर खंडहरों के रूप में खड़ा है, लेकिन इन पत्थरों की खामोशी में कश्मीर के उस गौरव की गूंज है, जिसे हर अमरनाथ यात्री को यात्रा पूरी करने से पहले एक बार ज़रूर सुनना चाहिए।
समय की मार और वर्तमान की खामोशी... इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि 15वीं शताब्दी की शुरुआत में सुल्तान सिकंदर शाह मीरी (जिसे इतिहास में ‘बुतशिकन’ भी कहा गया) के शासनकाल में इस विशाल मंदिर को भारी नुकसान पहुंचाया गया था। कश्मीरी इतिहासकार कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ में भी इस क्षेत्र के वैभव का उल्लेख मिलता है।
अब यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में यह स्थल एक राष्ट्रीय महत्व का स्मारक है। गर्भगृह की छतें ढह चुकी हैं, स्तंभ आंशिक रूप से टूट चुके हैं और दीवारों पर उकेरी गई देवी-देवताओं की मूर्तियां समय और बर्बरता की मार से धुंधली हो चुकी हैं। इसके बावजूद, मट्टन की पहाड़ियों पर जब ढलता सूरज आखिरी किरणें इन खंडहरों पर बिखेरता है, तो इसकी भव्यता देखने वालों को स्तब्ध कर देती है।
विरासत को सहेजने की पुकार... नजर जब इन विशाल पत्थरों पर पड़ती है, तो यहां एक अलग तरह का ‘स्टैमिना’ और दृढ़ता नजर आती है। समय से लड़कर टिके रहने की दृढ़ता। यह परिसर आज केवल सैलानियों के लिए एक ‘फोटो पॉइंट’ बनकर रह गया है, जबकि इसे एक सजीव ऐतिहासिक धरोहर के रूप में देखा जाना चाहिए।
यात्रा के इस रूट पर मट्टन के सूर्य मंदिर के इन खंडहरों के बीच कुछ पल बिताना, इतिहास के उस अध्याय को जीने जैसा है जिसे समय की धूल ने भले ही धुंधला कर दिया हो, लेकिन मिटा नहीं सकी है।
राजा ललितादित्य का बेजोड़ वास्तुकला चमत्कार
इस ऐतिहासिक मंदिर का निर्माण कार्कोट राजवंश के महान सम्राट राजा ललितादित्य मुक्तापीड़ ने आठवीं शताब्दी (लगभग 725-761 ईस्वी) के दौरान करवाया था। यह वह दौर था जब कश्मीर की सीमाएं मध्य एशिया से लेकर बंगाल तक फैली थीं।
कला का अनूठा संगम... मार्तंड मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं था, बल्कि यह गांधार, गुप्त, रोमन और यूनानी वास्तुकला शैली के मिलन का एक अद्भुत उदाहरण था।
चूने के बिना पत्थरों का संतुलन... बिना किसी चूने या गारे के, केवल विशालकाय चूना-पत्थरों को आपस में जोड़कर बनाई गई यह भव्य संरचना उस दौर के भारतीय इंजीनियरों की वैज्ञानिक और तकनीकी दक्षता को दर्शाती है। इसके मुख्य गर्भगृह के चारों ओर बने 84 स्तंभ (खंभे) सूर्य की 84 कलाओं और साल के दिनों के गणितीय चक्र को प्रदर्शित करते थे।
अमरनाथ यात्रियों के लिए क्यों जरूरी है यह पड़ाव... अमरनाथ यात्रा पर निकलने वाले सनातन धर्मावलंबियों के लिए मार्तंड सूर्य मंदिर का दर्शन आस्था और इतिहास के अटूट संबंध को समझने का जरिया है। कश्मीर घाटी सिर्फ सूफी संतों की ही नहीं, बल्कि उससे पहले की महान वैदिक और शैव संस्कृति की भी कर्मभूमि रही है।
मार्तंड का यह परिसर यात्रियों को यह याद दिलाता है कि जिस कश्मीर की वादियों में वे बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए आए हैं, उसकी जड़ें कितनी गहरी और गौरवशाली हैं। यह मंदिर साक्ष्य है कि कैसे सदियों के उतार-चढ़ाव के बाद भी कश्मीर की सांस्कृतिक विरासत का यह ढांचा अडिग खड़ा है।
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