आईडीए और नगर निगम में ‘कृपापात्र सेवा प्रदाताओं’ का खेल: लीज डीड, सेल डीड से लेकर पीएम आवास के दस्तावेज तक चुनिंदा सेवा प्रदाताओं पर मेहरबानी का आरोप
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इंदौर विकास प्राधिकरण (आईडीए) के संपदा विभाग और इंदौर नगर निगम की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर आरोप का खुलासा हुआ हैं। अधिवक्ता प्रमोद कुमार द्विवेदी ने आरोप लगाया है कि दोनों संस्थानों में दस्तावेज तैयार कराने की प्रक्रिया में कथित तौर पर चुनिंदा और कृपापात्र सेवा प्रदाताओं को प्राथमिकता दी जा रही है। आरोप है कि अन्य सेवा प्रदाताओं को जानबूझकर परेशान किया जाता है, जबकि मनचाही जगहों पर दस्तावेजी प्रक्रिया तेजी से पूरी कर दी जाती है।
लीज डीड से सेल डीड तक ‘चुनिंदा’ सेवा प्रदाताओं का दबदबा!... द्विवेदी के अनुसार आईडीए के संपदा विभाग में लीज डीड, सेल डीड, लीज अनुबंध और अन्य दस्तावेजों का काम कथित रूप से कुछ निर्धारित सेवा प्रदाताओं के माध्यम से ही करवाया जाता है।
इसके लिए मनमाने शुल्क वसूले जाने का भी आरोप है। उन्होंने आरोप लगाया कि सेवा प्रदाताओं को मिलने वाले कमीशन पर भी कथित रूप से अधिकारियों की नजर रहती है और कमीशन की राशि स्वयं रख लेने जैसी गंभीर अनियमितताएं हो रही हैं।
दूसरे सेवा प्रदाताओं को आईडी-ओटीपी तक नहीं देने का आरोप... सबसे गंभीर आरोप यह है कि जो सेवा प्रदाता अधिकारियों की पसंद के नहीं हैं, उन्हें कथित तौर पर अलग-अलग स्तर पर परेशान किया जाता है। द्विवेदी का कहना है कि कई मामलों में आईडी उपलब्ध नहीं कराई जाती, तो कहीं ओटीपी देने में अड़ंगा लगाया जाता है।
वहीं आरोप यह भी है कि अधिकारियों की मनचाही जगहों पर आवश्यक दस्तावेज पहले से उपलब्ध होने के बावजूद प्रक्रिया तत्काल पूरी कर दी जाती है। इससे पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
पीएम आवास योजना के दस्तावेजों पर भी सवाल... इंदौर नगर निगम की प्रधानमंत्री आवास योजना की दस्तावेजी प्रक्रिया को लेकर भी इसी तरह के आरोप लगाए गए हैं। द्विवेदी का दावा है कि यहां भी दस्तावेज तैयार कराने के लिए खास सेवा प्रदाताओं को प्राथमिकता दिए जाने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।
सवाल यह है कि यदि सरकारी योजना के दस्तावेज तैयार कराने की प्रक्रिया सभी के लिए समान है, तो फिर कुछ सेवा प्रदाताओं को कथित तौर पर बार-बार प्राथमिकता क्यों मिलती है?
‘खेल उजागर न हो, इसलिए बनाई गई व्यवस्था?’... द्विवेदी ने आरोप लगाया कि आईडीए के अधिकारियों के कथित कारनामे सामने न आएं और नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल न उठें, इसके लिए सेवा प्रदाताओं के स्तर पर ऐसी व्यवस्था बनाई गई है, जिसमें चुनिंदा लोगों के माध्यम से काम कराने को बढ़ावा मिलता है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सेवा प्रदाताओं को मिलने वाला कमीशन भी कथित तौर पर अधिकारियों तक पहुंचता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना महत्वपूर्ण होगा।
हुकुमचंद मिल की रजिस्ट्री का हवाला देकर उठाए सवाल... द्विवेदी ने हुकुमचंद मिल की रजिस्ट्री के मामले का हवाला देते हुए कहा कि वहां भी सेवा प्रदाता को कथित तौर पर नाममात्र की राशि दी गई थी। मामला सामने आने के बाद संबंधित सेवा प्रदाता को कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ा।
उनका कहना है कि इस पूरे घटनाक्रम से यह सवाल खड़ा होता है कि दस्तावेजी कार्य करने वाले सेवा प्रदाताओं को किस तरह इस्तेमाल किया जा रहा है और विवाद सामने आने पर जिम्मेदारी किसकी तय होती है।
अब ‘तथ्यों और दस्तावेजों’ के खुलासे करने का दावा... अधिवक्ता प्रमोद कुमार द्विवेदी ने कहा है कि आईडीए और नगर निगम में कथित तौर पर चल रही इस व्यवस्था से जुड़े मामलों को अब तथ्यों और दस्तावेजों के साथ खुलासा किया जाएगा।
उन्होंने स्पष्ट किया कि दस्तावेजी प्रमाणों के आधार पर यह बताया जाएगा कि किन मामलों में किस तरह प्रक्रिया अपनाई गई, किसे लाभ मिला और अन्य सेवा प्रदाताओं को किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
सरकारी कार्यालय में ‘अपना आदमी’ जरूरी क्यों?
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि आईडीए और नगर निगम की सेवाएं निर्धारित नियमों और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत संचालित होती हैं, तो किसी खास सेवा प्रदाता के माध्यम से ही दस्तावेज तैयार कराने की कथित मजबूरी क्यों है?
यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला केवल सेवा प्रदाताओं की परेशानी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी प्रक्रिया में कथित बिचौलिया व्यवस्था, कमीशनखोरी और अधिकारियों की भूमिका की जांच का विषय भी बन सकता है। अब निगाह इस बात पर है कि लगाए गए आरोपों के समर्थन में सामने आने वाले दस्तावेज क्या तस्वीर पेश करते हैं और आईडीए व नगर निगम इस पूरे मामले पर क्या जवाब देते हैं।
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