फिर भी केंद्र ने कम खरीदा मूंग: देश में मूंग दाल की कमी; विदेश से करते हैं खरीदी
KHULASA FIRST
संवाददाता

कैसे खाएं देशवासी दाल-रोटी
दलहन और तिलहन मिशन में भारत पिछड़ा
प्रमुख सिफारिशें...
डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
बैठक और मिशन के तहत सरकार ने जिन बिंदुओं पर जोर दिया, उनमें दलहन क्षेत्रफल बढ़ाना, उच्च गुणवत्ता एवं जलवायु-अनुकूल बीज उपलब्ध कराना, अनुसंधान और नई किस्मों का विकास, प्रसंस्करण और भंडारण क्षमता बढ़ाना, किसानों को एमएसपी पर खरीद का भरोसा देना तथा सहकारी नेटवर्क के माध्यम से खरीद और भुगतान की पारदर्शी व्यवस्था विकसित करना शामिल हैं।
मध्य प्रदेश के संदर्भ में महत्व
मध्य प्रदेश देश के प्रमुख मूंग उत्पादक राज्यों में है। यदि केंद्र सरकार आत्मनिर्भरता मिशन के अनुरूप मूंग की व्यापक एमएसपी खरीद सुनिश्चित करती है तो किसानों को उचित मूल्य मिलेगा, अगली फसल में दलहन का रकबा बढ़ेगा और देश का आयात बिल घटाने में मदद मिलेगी। यही कारण है कि हाल के महीनों में मूंग खरीदी का मुद्दा केवल किसानों का नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के राष्ट्रीय दलहन आत्मनिर्भरता मिशन से भी सीधे जुड़ा हुआ माना जा रहा है।
दे श में अनाज और दालों की कमी के चलते वर्षों से कहा जाता रहा है कि दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ। अब स्थिति यह हो गई है कि देशवासियों के लिए पर्याप्त दाल ही उपलब्ध नहीं है। इसका प्रमुख कारण दाल उत्पादन को प्रोत्साहित नहीं किया जाना है।
मध्य प्रदेश में मूंग का इस बार अच्छा खासा उत्पादन हुआ, लेकिन बावजूद इसके केंद्र सरकार ने समर्थन मूल्य पर खरीदी का कोटा मात्र 25% ही रखा। यह बताता है कि सरकार दाल और तिलहन की कमी के बावजूद इस विषय पर गंभीर नहीं है।
मूंग दाल केंद्रीय कृषि मंत्रालय और मध्य प्रदेश सरकार के बीच सियासत का कारण बन गई या बना दी गई। अब कहा जा रहा है कि मध्य प्रदेश सरकार के कृषि विभाग के मंत्री और अधिकारी केंद्रीय कोटा बढ़ाने के प्रति गंभीर नहीं थे।
जानकार लोगों का कहना है कि यह कारण बेहद कमजोर और जिम्मेदारी से बचने का बहाना है। केंद्र सरकार को दालों का भंडार भरने के लिए खुद ही राज्यों से अधिकाधिक खरीदी करनी चाहिए थी। मध्य प्रदेश के मामले में ऐसा नहीं किया गया।
हो सकता है इसके पीछे बड़े नेताओं की आपसी खींचतान और प्रभुत्व की राजनीति हो। इसका नतीजा यह हुआ कि किसानों को उग्र आंदोलन करने पड़े। फिर भी केंद्र सरकार ने अपना कोटा नहीं बढ़ाया। इससे स्पष्ट होता है कि केंद्र सरकार दालों के भंडार के प्रति गंभीर नहीं।
अन्यथा कोई कारण नहीं कि प्रदेश और किसानों की मांग का इंतजार केंद्र करे और मूंग की खरीदी नहीं करने की हठधर्मिता पर अड़ जाए। होना तो यह चाहिए था कि केंद्र सरकार खुद राज्यों से अधिकाधिक दाल खरीदी करती।
बजाय इसके कि राज्य की कमियां निकालने में अपनी ताकत खपाती। अभी भी केंद्र सरकार चाहे तो मूंग का क्रय करने का कोटा बढ़ा सकती है। इसके लिए केंद्र के जिम्मेदारी विभाग को राजनीति से ऊपर उठकर देश निकले कदम उठाना चाहिए।
एक ओर जहां केंद्र सरकार मूंग खरीदी में कंजूसी कर रही है, वहीं दूसरी ओर केंद्र के गृहमंत्री अमित शाह और जिम्मेदार कृषि मंत्रालय नियमित समीक्षा बैठकों में इसका उत्पादन बढ़ाने के लक्ष्य तय कर रहे हैं। इतना सब होने के बावजूद मध्य प्रदेश के किसानों से केंद्र सरकार ने सारा मूंग नहीं खरीदा।
यह नीति बताती है कि केंद्र का कृषि मंत्रालय केंद्र सरकार की नीतियों के प्रति कितना गंभीर है। उल्लेखनीय है केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने दलहन उत्पादन बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से कई उच्चस्तरीय समीक्षा बैठकें की हैं। इन बैठकों में सबसे बड़ी चिंता यह जताई गई कि देश में दालों की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन उत्पादन उसी गति से नहीं बढ़ पा रहा।
देश में मूंग फसल की स्थिति... मूंग भारत की प्रमुख खरीफ और ग्रीष्मकालीन दलहन फसल है। प्रमुख उत्पादक राज्य मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और गुजरात हैं। मूंग का उत्पादन बढ़ाने पर विशेष जोर इसलिए है, क्योंकि इसकी अवधि कम होती है, पानी कम लगता है और यह मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाकर भूमि की उर्वरता सुधारता है।
भारत में दलहन की स्थिति
भारत दुनिया का सबसे बड़ा दलहन उत्पादक और उपभोक्ता है। वर्तमान में देश का वार्षिक दलहन उत्पादन लगभग 240–250 लाख टन के आसपास है, जबकि मांग इससे अधिक। इसलिए हर वर्ष 50–70 लाख टन तक दालों का आयात करना पड़ता है। केंद्र सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030-31 तक दलहन उत्पादन 350 लाख टन (35 मिलियन टन) तक पहुंचाना है, ताकि देश आत्मनिर्भर बन सके।
प्रमुख चिंता
देश में दलहन और तिलहन कमी लंबे समय से बनी हुई है। दलहन मतलब मूंग, उड़द, मसूर आदि दाल और तिलहन मतलब मूंगफली, सोयाबीन व तेल से जुड़ी हुई फसलें। इनका उत्पादन देश में लगातार घट रहा है।
दाल और तिलहन को देश की जरूरत के लिए विदेश से मांगना पड़ रहा है, जिससे सरकार के खजाने पर भारी-भरकम वित्तीय भार आता है। देश में इन फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए केंद्रीय कृषि विभाग और सहकारिता विभाग लगातार समीक्षा बैठकें करते हैं, ताकि किसी तरह उत्पादन बढ़ाया जा सके। केंद्रीय गृहमंत्री और सहकारिता मामलों के मंत्री अमित शाह इस विषय में लगातार बैठक करते रहे हैं।
बैठकों में देश को 2027-28 तक दलहन में आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य तय किया गया है। किसानों को दलहन बोने के लिए प्रोत्साहित करने के अभियान चलाना चाहिए।
सहकारी संस्थाओं, विशेषकर एनएएफईडी और एनसीसीएफ के माध्यम से खरीद व्यवस्था मजबूत करना भी जरूरी है। किसानों का डिजिटल पंजीयन कर सीधे भुगतान सुनिश्चित करना और आयात पर निर्भरता कम कर एमएसपी पर प्रभावी खरीद बढ़ाना।
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