1500 में करोड़ों की जमीन के सौदे में लाखों की स्टाम्प ड्यूटी चोरी: रविकांत बाहरी व्यक्ति; फिर कैसे हो गया 1000 की स्टाम्प ड्यूटी और 500 रुपए पंजीयन शुल्क पर मुख्तारनामा
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
जमीनों की खरीद-बिक्री में स्टाम्प ड्यूटी की कथित चोरी और मुख्तारनामे के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ग्राम मगरखेड़ा की कृषि भूमि से जुड़े प्रमाणीकरण मुख्तारनामे के पंजीयन प्रमाणपत्र में महज 1000 स्टाम्प ड्यूटी और 500 पंजीयन शुल्क दर्ज है।
चूंकि ये मुख्तारनामा कस्तुरीबाई पति बद्रीलाल शर्मा की ओर से रविकांत पंवार के पक्ष में हुआ था और रविकांत, कस्तुरीबाई का रिश्तेदार न होकर एक बाहरी व्यक्ति है। नियमानुसार परिवार के बाहर किसी व्यक्ति के पक्ष में मुख्तारनामा निष्पादित करने पर संपत्ति के मूल्य के आधार पर अधिक शुल्क देय होता है।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि संबंधित दस्तावेज पर केवल 1500 में पंजीयन कैसे हुआ और क्या इसी दस्तावेज के आधार पर आगे जमीनों की खरीद-बिक्री, रजिस्ट्री तथा नामांतरण किए गए?
14 अक्टूबर को लोकायुक्त विभाग ने पीटीसी के हेड कांस्टेबल फिरोज खान पर आय से अधिक संपत्ति के मामले में कार्रवाई की थी। जांच में कस्तुरीबाई की ग्राम मगरखेड़ा (45 बीघा) और लसूड़िया मोरी (7.50 बीघा) की जमीन को आम मुख्तारनामा के जरिए श्याम इंफ्रा फर्म और स्पार्कवेव फर्म को बेचे जाने का मामला सामने आया था। 150 करोड़ की मगरखेड़ा की जमीन के सौदे में फिरोज खान गवाह है।
वहीं, स्पार्कवेव द्वारा खरीदी लसूड़िया मोरी की जमीन के मामले में फर्म की पार्टनर फिरोज की पत्नी हीना खान, युवराज पिता रविकांत पंवार और शाकिर खान है। खुलासा फर्स्ट ने मामले की गहराई से तहकीकात की तो रविकांत के नाम कि ए गए दोनों जमीनों के मुख्तारनामा को लेकर चौंकाने वाला खुलासा हुआ।
मध्यप्रदेश पंजीयन एवं मुद्रांक विभाग के उपलब्ध पंजीयन प्रमाणपत्र के अनुसार ग्राम मगरखेड़ा की जमीन के मामले में मुख्तारनामा ई-पंजीयन क्रमांक एमपी319522024ए4830263 का पंजीयन 28 जून 2024 को उप-पंजीयक कार्यालय, रतलाम में हुआ।
प्रमाणपत्र में 1000 रुपए स्टाम्प ड्यूटी और 500 रुपए पंजीयन शुल्क दर्ज है। दस्तावेज में कस्तुरीबाई, निवासी रतलाम, निष्पादक और रविकांत पवार निवासी अरण्य नगर, इंदौर, मुख्तार के रूप में दर्ज हैं।
वरिष्ठ एडव्होकेट और विशेषज्ञ प्रमोद कुमार द्विवेदी ने मामले को गंभीर बताते हुए संबंधित दस्तावेजों की वैधानिकता की जांच, स्टाम्प ड्यूटी की संभावित चोरी की वसूली की जांच की मांग की है।
उनका कहना है कि यदि जांच में दस्तावेज कूटरचित या अवैध पाए जाते हैं, तो संबंधितों पर कानूनी कार्रवाई होना चाहिए। द्विवेदी के अनुसार, मुख्तारनामे की प्रकृति और पक्षकारों के संबंधों के आधार पर शुल्क निर्धारित होता है।
उन्होंने दावा किया कि परिवार के बाहर के व्यक्ति के पक्ष में मुख्तारनामा होने पर संपत्ति के मूल्य के आधार पर 5 प्रतिशत स्टाम्प ड्यूटी और उसके अतिरिक्त 0.8 प्रतिशत पंजीयन शुल्क का प्रावधान लागू होता है, जबकि पारिवारिक मामलों में अलग व्यवस्था है।
ऐसे में संबंधित दस्तावेज पर जमा राशि और वास्तविक देय शुल्क का मिलान किया जाना जरूरी है। बड़ा सवाल यह है कि संबंधित मुख्तारनामे पर कौन-सा शुल्क नियम लागू किया गया और उसकी गणना किस आधार पर हुई? इसका जवाब पंजीयन विभाग के अभिलेखों और लागू नियमों की जांच से ही सामने आ सकता है।
इंदौर की कई कृषि भूमियों का उल्लेख, पंजीयन रतलाम में
मुख्तारनामे में ग्राम लसुड़िया मोरी, तहसील एवं जिला इंदौर की सर्वे क्रमांक 264/2/1 की 1.7710 हेक्टेयर कृषि भूमि का भी उल्लेख है। इसके अतिरिक्त ग्राम मगरखेड़ा की विभिन्न सर्वे क्रमांकों की कृषि भूमि भी दस्तावेज में दर्ज है।
दस्तावेज के अनुसार, ग्राम मगरखेड़ा के सर्वे क्रमांक 190, 191 और 192 की कुल 5.418 हेक्टेयर तथा सर्वे क्रमांक 189, 193, 194, 195 और 229 की कुल 5.985 हेक्टेयर कृषि भूमि का उल्लेख किया गया है। इस प्रकार दस्तावेज में वर्णित कृषि भूमि का कुल रकबा लगभग 13.174 हेक्टेयर होता है।
मुख्तारनामे में संबंधित जमीनों के विक्रय लेख, विनिमय, दान और संशोधन संबंधी दस्तावेजों को पंजीयन के लिए प्रस्तुत करने तथा पंजीयन की कार्रवाई पूरी करने के अधिकार दिए जाने की बात लिखी है।
अब जांच का विषय यह है कि इस दस्तावेज के आधार पर वास्तव में कौन-कौन से सौदे हुए, कितनी भूमि के हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी हुई और राजस्व अभिलेखों में क्या बदलाव दर्ज किए गए।
प्रमाणीकरण मुख्तारनामा या जमीन के सौदों का माध्यम?
द्विवेदी के मुताबिक, प्रमाणीकरण मुख्तारनामे का इस्तेमाल सीमित उद्देश्य से किया जाता है। उनके अनुसार, इस प्रकार के दस्तावेज में मूल भूमि स्वामी द्वारा निष्पादित विक्रय लेख को पंजीयन कार्यालय में प्रस्तुत करने और पंजीयन की औपचारिकताएं पूरी करने के लिए अधिकार दिए जाते हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि दस्तावेज का उद्देश्य केवल पंजीयन संबंधी औपचारिकताएं पूरी करना था, तो इसके आधार पर हुए कथित जमीन हस्तांतरणों की प्रकृति और वैधानिकता की भी जांच होनी चाहिए।
हालांकि, उपलब्ध दस्तावेज में मुख्तार को विक्रय लेख, विनिमय, दान और संशोधन संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत करने तथा पंजीयन की कार्रवाई पूरी करने के अधिकार लिखे हैं। इसलिए अधिकारों का वास्तविक दायरा और संबंधित सौदों की वैधता मूल विक्रय लेखों, पंजीयन अभिलेखों और लागू कानून के परीक्षण के बाद ही तय हो सकेगी।
दस्तावेज के प्रारूप में भी जवाबदेही का उल्लेख
मुख्तारनामे में दर्ज टिप्पणी के अनुसार, दस्तावेज का प्रारूप एडवोकेट रवि पवार द्वारा पक्षकारों से प्राप्त जानकारी और निर्देशों के आधार पर तैयार किया गया था। टिप्पणी में यह भी लिखा गया है कि दस्तावेज की जानकारी और पक्षकारों के लेनदेन की जिम्मेदारी पक्षकारों की रहेगी तथा प्रारूप तैयार करने वाले एडवोकेट और सर्विस प्रोवाइडर का दायित्व नहीं होगा।
यह उल्लेख अपने आप में किसी व्यक्ति की संलिप्तता या निर्दोषता का अंतिम प्रमाण नहीं है। दस्तावेज तैयार करने, पक्षकारों की पहचान, हस्ताक्षर, निष्पादन और पंजीयन की पूरी प्रक्रिया की जांच के बाद ही जिम्मेदारी निर्धारित की जा सकती है।
अब जांच के दायरे में ये सवाल
1500 शुल्क किस नियम और किस आधार पर निर्धारित किया गया?
क्या संबंधित मुख्तारनामे पर संपत्ति के मूल्य के आधार पर शुल्क देय था?
मुख्तारनामे के आधार पर कितनी जमीनों की रजिस्ट्री और नामांतरण हुए?
क्या मूल भूमि स्वामी ने संबंधित विक्रय लेख स्वयं निष्पादित किए थे?
क्या दस्तावेजों के निष्पादन, हस्ताक्षर और पंजीयन की प्रक्रिया नियमानुसार हुई?
यदि स्टाम्प ड्यूटी कम जमा हुई या दस्तावेज में अनियमितता मिली, तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
स्टाम्प ड्यूटी की कमी मिली तो किसकी जवाबदेही?
एडवोकेट द्विवेदी का कहना है कि पंजीयन विभाग संबंधित मुख्तारनामे की श्रेणी, संपत्ति के मूल्य, लागू स्टाम्प ड्यूटी और पंजीयन शुल्क की गणना का परीक्षण करे। साथ ही, यह पता लगाया जाए कि दस्तावेज के आधार पर किन जमीनों की रजिस्ट्री और नामांतरण हुए तथा क्या किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन किया गया।
उन्होंने कथित अनियमितता सामने आने पर संबंधित दस्तावेजों और जमीन के सौदों पर कानून के अनुसार कार्रवाई करने तथा पात्रता और वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप मूल भूमि स्वामी के अधिकार बहाल करने की मांग उठाई है।
सवाल यह है कि जमीन के दस्तावेजों में दर्ज शुल्क और कथित जमीन हस्तांतरणों के बीच उठ रहे सवालों का जवाब पंजीयन एवं राजस्व विभाग की जांच से मिलना चाहिए। यदि नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदारों के विरुद्ध कार्रवाई और प्रभावित भूमि स्वामी के अधिकारों की बहाली के लिए कानून के अनुसार कदम उठाए जाने चाहिए।
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