कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल: कर्मचारी चयन बोर्ड परीक्षा में दिव्यांगों के अधिकारों का हनन
KHULASA FIRST
संवाददाता

श्री वैष्णव पॉलीटेक्निक केंद्र पर ऐन वक्त पर गैप प्रमाण पत्र मांगकर 3 अभ्यर्थियों को प्रवेश से रोका।
बिना किसी लिखित आदेश और अचानक लागू किए गए मनमाने नियमों से दिव्यांग परीक्षार्थियों का भविष्य अंधकार में।
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन बोर्ड की अड़ियल कार्यप्रणाली और परीक्षा केंद्र के मनमाने नियमों के कारण एक बार फिर प्रदेश के दिव्यांग परीक्षार्थियों के अधिकारों पर सीधा डाका पड़ा है।
कल पटवारी सहित कुल 2,106 पदों के लिए आयोजित की जा रही ग्रुप-2 सब ग्रुप-4 भर्ती परीक्षा के दौरान श्री वैष्णव पॉलीटेक्निक कॉलेज केंद्र महू नाका इंदौर पर दिव्यांग अभ्यर्थियों के प्रति घोर संवेदनहीनता देखने को मिली।
परीक्षा केंद्र प्रशासन ने अपनी ओर से गढ़े गए अनधिकृत नियमों का हवाला देकर और अंतिम समय में अवास्तविक शर्तें रखकर तीन दिव्यांग परीक्षार्थियों को परीक्षा देने से वंचित कर दिया।
100% दृष्टिबाधित छात्रा को भी नहीं बख्शा, शुरुआत में दी हरी झंडी और अंत में बदला फैसला... प्रवेश पत्र के अनुसार परीक्षा की तारीख 30 सितंबर 2026 निर्धारित थी, जिसमें रिपोर्टिंग का समय दोपहर 12.30 बजे, अंतिम प्रवेश का समय दोपहर 1.30 बजे और परीक्षा का समय दोपहर 2.30 बजे से शाम 5.30 बजे तक तय था।
घटनाक्रम के अनुसार सचिन राठौर, पूजा मीणा और शहडोल से सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करके आई पूरी तरह दृष्टिबाधित अभ्यर्थी अनीता साहू तय समय पर श्री वैष्णव पॉलीटेक्निक कॉलेज परीक्षा केंद्र पहुंचे थे।
तीनों अभ्यर्थी गंभीर शारीरिक दिव्यांगता और पूर्ण दृष्टिबाधा की श्रेणी में आते हैं, जिसके कारण वे स्वयं पर्चा लिखने में पूरी तरह असमर्थ हैं। बोर्ड के आधिकारिक दिशानिर्देशों का पूर्णतः पालन करते हुए वे अपने साथ नियमानुसार सहलेखक लेकर पहुंचे थे।
अचानक नया अड़ंगा लगा दिया... प्रारंभिक जांच में केंद्र के कर्मचारियों ने परीक्षार्थियों के सभी पहचान पत्र, दिव्यांगता प्रमाण पत्र और सहलेखक से संबंधित दस्तावेजों का गहन परीक्षण किया।
इसके बाद परीक्षार्थियों के फोटो खींचे गए और केंद्र के अधिकारियों से सत्यापन कराने के बाद उन्हें परीक्षा में शामिल होने की सहमति भी दे दी गई, लेकिन जैसे ही अंतिम प्रवेश समय समाप्त होने में महज कुछ ही मिनट बचे केंद्र प्रशासन ने अचानक नया अड़ंगा लगा दिया।
परीक्षार्थियों के तर्क खारिज, पुलिस के आने पर भी नहीं पिघला प्रशासन... परीक्षार्थियों ने अनुरोध किया कि यदि यह दस्तावेज अनिवार्य है तो उन्हें किसी परिचित के माध्यम से मंगवाने का अवसर दिया जाए, क्योंकि इतने कम समय में तहसील या नोटरी से नया प्रमाण पत्र बनवाना किसी भी स्थिति में संभव नहीं था। लेकिन केंद्र के अधिकारियों ने उनके इस व्यावहारिक प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया।
पुलिस के हस्तक्षेप के बावजूद बदलाव नहीं आया... विवाद बढ़ता देख मौके पर पुलिस बल भी पहुंचा, लेकिन पुलिस के हस्तक्षेप के बावजूद केंद्र अधिकारियों के रुख में कोई बदलाव नहीं आया। पूरी तरह दृष्टिबाधित अनीता साहू, सचिन राठौर और पूजा मीणा के लिए बिना सहलेखक के परीक्षा देना व्यावहारिक रूप से नामुमकिन था, जिसके चलते उन्हें बिना परीक्षा दिए ही भारी निराशा के साथ वापस लौटना पड़ा।
पीड़ित परीक्षार्थियों का कहना है कि महीनों की कठिन मेहनत के बाद वे इस परीक्षा में शामिल होने आए थे, जिसे केंद्र प्रशासन के तानाशाही पूर्ण रवैये ने तबाह कर दिया।
शहडोल से आई अनीता साहू, सचिन राठौर और पूजा मीणा ने अब कलेक्टर शिवम वर्मा से मिलकर पूरे मामले की शिकायत सौंपने और इस मनमाने नियम की निष्पक्ष जांच कराकर पुन परीक्षा का अवसर देने की मांग की है।
30 मिनट पहले रखी ऐसी शर्त, जो मूल नियम पुस्तिका में दर्ज ही नहीं
परीक्षा शुरू होने से कुछ ही समय पहले केंद्र के अधिकारियों ने अभ्यर्थियों के सामने शर्त रखी कि उनके सहलेखक के लिए गैप प्रमाण पत्र देना अनिवार्य है। परीक्षार्थी पूजा मीणा ने स्पष्ट किया कि उनके सहलेखक ने वर्ष 2025 में 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की है।
अधिकारियों ने बिना किसी लिखित आदेश या आधिकारिक निर्देश के यह तर्क दिया कि सहलेखक का वर्ष 2026 में अध्ययनरत होना अनिवार्य है या फिर उसके पास गैप प्रमाण पत्र होना चाहिए।
जब अभ्यर्थियों ने मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन बोर्ड की मूल नियम पुस्तिका निकालकर अधिकारियों को दिखाई तो उसमें सहलेखक के लिए किसी भी प्रकार के गैप प्रमाण पत्र की अनिवार्यता या ऐसी किसी शर्त का उल्लेख नहीं मिला।
इसके बावजूद अधिकारियों ने अपने मनमाने रवैये पर अड़े रहते हुए अभ्यर्थियों की एक न सुनी। शहडोल से इतनी दूर आई पूर्णतः दृष्टिबाधित अनीता साहू की शारीरिक स्थिति और मानवीय आधार पर भी केंद्र प्रशासन का दिल नहीं पसीजा और उन्हें कल इस परीक्षा में बैठने तक नहीं दिया गया।
कलेक्टर शिवम वर्मा से जांच की मांग... इस पूरे घटनाक्रम ने बोर्ड और परीक्षा केंद्र द्वारा अचानक बनाए जाने वाले मनमाने नियमों की पोल खोल कर रख दी है।
यदि सहलेखक से जुड़ा कोई अतिरिक्त दस्तावेज अनिवार्य था, तो इसकी स्पष्ट जानकारी अभ्यर्थियों के प्रवेश पत्र में या परीक्षा से पूर्व दी जानी चाहिए थी। केंद्र पर पहुंचकर अचानक नया नियम थमा देना सीधे तौर पर दिव्यांग अभ्यर्थियों के संवैधानिक और शैक्षणिक अधिकारों का हनन है।
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