संझाजी का लाड़ाजी लुगड़ो लाया जाड़ाजी: कंक्रीट के जंगलों में खो गईं संझा माता, मालवा-निमाड़ के आंगनों से विदा होती एक साझी संस्कृति
KHULASA FIRST
संवाददाता

नितिन मोहन शर्मा 94250-56033, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
न दीवारें कच्ची रहीं, न पशुधन बचा, इंटरनेट के शोर में मौन हो गए संझा माई के पारंपरिक गीत, शहरीकरण की भेंट चढ़ी हमारी लोक विरासत, संझा का आगमन तो हुआ, पर कहां खो गया वो पुराना उल्लास?
शहरीकरण के इस दौर-शोर में भी सुदामा नगर के एक मकान में बरसों से संझा पर्व की परंपरा निभाई जाती है। आज भी विद्या दिनेश बागोरा संझा माई के नियमित लाड़ लड़ाती हैं। श्राद्ध पक्ष में रोज ताजा गोबर लाना और नियमित संझाजी की आकृति को उकेरना उनकी दिनचर्या में शामिल है।
संझा का आगमन तो हुआ, पर किसी को खबर ही नहीं। कहां खो गया वो पुराना उल्लास, जो संझा माता के लोकपर्व पर कभी चहुंओर छा जाता था? आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी ही जड़ों से दूर होता मालवा-निमाड़ आज एक बड़े सांस्कृतिक संकट के मुहाने पर खड़ा है।
श्राद्धपक्ष के इन 16 दिनों में कभी जिन आंगनों और गलियों में संझा माई की अगवानी के लिए उत्सव जैसा माहौल होता था, वहां आज एक अजीब-सा सन्नाटा पसरा हुआ है। न दीवारें कच्ची रहीं, न पशुधन बचा और इंटरनेट के शोर में संझा माई के पारंपरिक गीत कहीं मौन हो गए हैं।
स्मार्टफोन की स्क्रीन पर सिमट गई लोककला, गायों की घटती संख्या और पक्के मकानों ने हमारे आंगनों की वो सोंधी रौनक छीन ली है। परंपराओं से मुंह मोड़ती नई पीढ़ी के बीच यह मालवा-निमाड़ के एक जीवंत लोकपर्व के दम तोड़ने की सबसे मार्मिक दास्तां है... गर आप सुनना चाहें...!
तरक्की की अंधी दौड़ ने हमसे हमारी माटी की सुगंध छीन ली है। जिन कच्चे मकानों की दीवारों पर लड़कियां पूरी श्रद्धा और चाव से संझा माता की आकृतियां उकेरती थीं, उन्हें हमने कंक्रीट और टाइल्स के आलीशान डिब्बों (फ्लैट्स) में तब्दील कर दिया है।
विडंबना देखिए, जिस त्योहार की आत्मा ही प्रकृति से जुड़ी थी, आज उसे बनाने के लिए न तो शहरों में शुद्ध मिट्टी बची है और न ही गाय का गोबर। हमारे घरों के बाहर बंधी रहने वाली गायें अब सड़कों पर पॉलिथीन खाने को मजबूर हैं।
घटते पशुधन ने इस लोकपर्व की रीढ़ ही तोड़ दी है। जब संझा को आकार देने के लिए बुनियादी तत्व ही नहीं बचे, तो भला कोई परंपरा कैसे सांस लेगी?
कभी शाम ढलते ही पूरा मोहल्ला छोटी-छोटी बच्चियों और किशोरियों की किलकारियों से गूंज उठता था। ‘संझा माई जीम ले चूठ ले...’ और ‘छोटी-सी गाड़ी लुढ़कती जाए...’, ‘संझाजी का लाड़ाजी, लुगड़ो लाया जाड़ाजी...’ जैसे लोकगीतों में मालवा और निमाड़ की सामूहिक आत्मा बसती थी।
वह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि बेटियों को अपनी सहेलियों के साथ हंसने, खेलने और लोककला को जीने का एक खुला आसमान देता था। मगर अफसोस, आज इंटरनेट और रील संस्कृति के शोर ने उन मासूम और मीठे सुरों का गला घोंट दिया है।
आज की नई पीढ़ी को कृत्रिम त्योहारों की कृत्रिम चकाचौंध तो भा रही है, लेकिन अपनी मिट्टी से उपजा यह अनूठा पर्व उन्हें पिछड़ा नजर आने लगा है।
...तो संझा! ये शहर निष्ठुर हो गए हैं। यहां लोक उत्सव का स्पंदन नहीं होता। ‘नेतागीरी’ के लिए एक दिन, एक दीवार पर तुम्हें सजा-संवारकर राजनीति तो की जा रही है, लेकिन अब यहां तुम्हारे आने-जाने से किसी को फर्क भले ही नहीं पड़ता।
यहां तुम्हारे ‘सोलह दिन’ भले ही बिसरा दिए गए हैं। फिर भी कुछ बच्चियों में कागज की बनी आकृतियों से ही सही, तुम्हें पूजा है। छोटी बस्ती में। तंग इलाके में तुम थीं मौजूद। बड़े शहर। बड़ी कॉलोनी-मोहल्लों।
ऊंची अट्टालिकाओं में तुम्हारा उत्सव भले ही ‘आउट डेटेड’ हो गया हो, लेकिन गांव अभी जिंदा हैं। और जब तक गांव जिंदा हैं, तब तक भारत जिंदा है। भारत की आत्मा जिंदा है। तुम्हारा उत्सव जिंदा है।
अब बीसी-किटी पार्टियों में तलाशी जा रही सामूहिकता
संझाबाई के इस सोलह दिन के शृंगारित उत्सव को लेकर अब पहले जैसी ललक कहीं नजर नहीं आती। न नवयौवनाओं के लिए अब संझाबाई का लोकपर्व कोई महत्व रखता है। इसका मतलब ये नहीं कि नई पीढ़ी संस्कृति-संस्कार, लोकपर्व-त्योहार से दूर है।
उसे पता ही नहीं कि हमारे लोकपर्व क्या हैं? कितने हैं? कब-कब आते हैं? क्यों आते हैं? क्या महत्व है इन लोकपर्वों का? अब कोई ये पढ़ाता-समझाता नहीं, इसलिए परस्पर लोगों से जुड़ते ये लोकपर्व खत्म होते जा रहे हैं।
संझा पर्व का आगमन भी तो समाज की सामूहिकता से ही जुड़ा है न? एक समय, एक साथ, एक स्वर में सब एकजुट। अब ये एकजुटता बीसी और किटी पार्टियों में तलाशी जा रही है, जहां कृत्रिम बनाव-शृंगार तो है, लेकिन संस्कृति से असली लगाव नहीं।
आत्ममंथन का वक्त: क्या किताबों और तस्वीरों में ही बची रहेगी संझा
यह खबर केवल एक त्योहार के कम होने की सूचना नहीं है, बल्कि हमारी सोई हुई सामूहिक चेतना को एक करारा तमाचा है। हम खुद को ‘ग्लोबल’ और ‘स्मार्ट’ बनाने के चक्कर में इतने खो गए हैं कि अपनी जड़ों को ही काट रहे हैं।
संझा माता का यह सूनापन मालवा-निमाड़ की लोक संस्कृति की वो सिसकी है, जिसे हम सब सुन तो रहे हैं, पर अनदेखा कर रहे हैं। अगर समाज अब भी नहीं जागा और अपनी इस अमूल्य सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के गंभीर प्रयास नहीं किए, तो वह दिन दूर नहीं, जब संझा माता की यह खूबसूरत परंपरा सिर्फ इतिहास के पन्नों, तस्वीरों और बुजुर्गों की कहानियों में ही सिमटकर रह जाएगी। वक्त आ गया है कि हम ठहरें, सोचें और अपनी बेटियों को फिर से संझा माई की उंगली थमाना सिखाएं।
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