इस ट्रस्ट की संपत्तियों पर कोर्ट में उठे सवाल: कौन है ट्रस्टी, कैसे होता है चुनाव; इस शहर की प्रॉपर्टी के मालिकाना हक पर भी बहस
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, उज्जैन।
केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया से जुड़े सिंधिया देवस्थान ट्रस्ट की उज्जैन स्थित संपत्तियों को लेकर चल रहा विवाद अब ट्रस्ट के कामकाज और कानूनी स्थिति तक पहुंच गया है।
मामला बायजाबाई सिंधिया कॉम्प्लेक्स के दुकानदारों को दुकान खाली करने के नोटिस से शुरू हुआ था, लेकिन अदालत में सुनवाई के दौरान ट्रस्ट के ट्रस्टी, उनके अधिकार, संपत्तियों के दस्तावेज और ट्रस्ट के रजिस्ट्रेशन को लेकर कई सवाल सामने आए।
बायजाबाई सिंधिया कॉम्प्लेक्स, गोपाल मंदिर और जवाहर मार्ग स्थित पाटनी बाजार सहित कई संपत्तियों को ट्रस्ट से जुड़ा बताया जाता है।
लंबे समय से यहां किराएदार दुकानें और अन्य कारोबार संचालित कर रहे हैं। किराया बढ़ाने और दुकानें खाली कराने के नोटिस के बाद दुकानदारों ने न्यायालय की शरण ली। मामला अब इंदौर हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है।
2019 में दुकानदारों को मिला था नोटिस
बायजाबाई सिंधिया कॉम्प्लेक्स के दुकानदारों को 16 अक्टूबर 2019 को नोटिस जारी किया गया था। इसमें किराया बढ़ाकर 10 हजार रुपए करने, पुराने बकाये का भुगतान करने व दुकान खाली करने की बात कही गई थी।
दुकानदारों ने इसके खिलाफ उज्जैन जिला न्यायालय में मामला दायर किया। अक्टूबर 2025 में निचली अदालत ने किराएदारों को बकाया राशि जमा करने और दो महीने के भीतर दुकानें खाली करने का आदेश दिया। इसके बाद दुकानदारों ने ऊपरी अदालत का रुख किया।
जिला कोर्ट में बदला मामले का रुख
मामला उज्जैन के पंचम जिला न्यायाधीश की अदालत में पहुंचा। सुनवाई के दौरान विवाद केवल दुकान खाली कराने तक सीमित नहीं रहा। अदालत के सामने ट्रस्ट के अस्तित्व, उसके अधिकार और संपत्तियों पर दावे से जुड़े सवाल भी उठे।
अदालत ने निचली अदालत के आदेश को खारिज करते हुए किराएदारों को राहत दी। इसके बाद अब सिंधिया देवस्थान ट्रस्ट ने इस फैसले को इंदौर हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
यानी अब हाईकोर्ट में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि ट्रस्ट किस कानूनी आधार पर संपत्ति पर अपना अधिकार जता रहा है और उसके प्रतिनिधियों को मुकदमा लड़ने का अधिकार किस तरह मिला।
ट्रस्ट को लेकर कोर्ट में उठे ये सवाल
सुनवाई के दौरान ट्रस्ट की ओर से पेश दस्तावेजों और दावों को लेकर कई सवाल सामने आए हैं।
याचिका में ज्योतिरादित्य सिंधिया को ट्रस्ट का ट्रस्टी और चेयरमैन बताया गया है, लेकिन उनके हस्ताक्षर वाला नियुक्ति संबंधी दस्तावेज या पत्र सामने नहीं रखा गया।
ट्रस्ट में वर्तमान में कौन-कौन ट्रस्टी हैं, इसकी पूरी जानकारी अदालत के सामने नहीं रखी गई। पुराने ट्रस्टी कौन थे और नए ट्रस्टी नियुक्त करने की प्रक्रिया क्या है, इस पर भी सवाल उठे।
किराएदारों को हटाने का निर्णय कब और किस प्रस्ताव के आधार पर लिया गया, इसका रिकॉर्ड भी सवालों के घेरे में रहा। ट्रस्ट की ओर से मुकदमा लड़ने वाले प्रतिनिधियों को किसने अधिकृत किया, इसको लेकर भी स्पष्ट दस्तावेज सामने नहीं आने की बात कही गई। ट्रस्ट की ओर से ठहराव-प्रस्ताव और ऑडिट रिपोर्ट पेश किए जाने को लेकर भी सवाल उठे।
बायजाबाई सिंधिया कॉम्प्लेक्स को ट्रस्ट की संपत्ति बताए जाने के समर्थन में कौन से दस्तावेज हैं, यह भी विवाद का महत्वपूर्ण बिंदु बना।
सबसे बड़ा सवाल
ट्रस्ट का रजिस्ट्रेशन कहां हुआ? मामले में ट्रस्ट के रजिस्ट्रेशन को लेकर भी विरोधाभास सामने आया है। रिकॉर्ड के मुताबिक सिंधिया देवस्थान ट्रस्ट का 5 फरवरी 1958 को बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट, 1950 के तहत पुणे में रजिस्ट्रेशन होने की बात सामने आई है। वहीं ट्रस्ट की ओर से इसके ग्वालियर में जून 1952 में रजिस्ट्रेशन होने का दावा किया गया है।
रजिस्ट्रेशन की तारीख और स्थान को लेकर सामने आए इस अंतर ने मामले को और महत्वपूर्ण बना दिया है। इसी के साथ यह सवाल भी उठाया गया कि संबंधित संपत्ति को लेकर अदालत में दावा करने के लिए ट्रस्ट के पास कौन से वैध दस्तावेज और अधिकार हैं।
उज्जैन की किन संपत्तियों से जुड़ा है ट्रस्ट?
सिंधिया देवस्थान ट्रस्ट से उज्जैन की कई धार्मिक व ऐतिहासिक संपत्तियों का प्रबंधन जुड़ा बताया जाता है। इनमें श्री द्वारकाधीश गोपाल मंदिर, राणोजी की छतरी, मदन मोहन मंदिर सहित कुछ जमीनें और भवन शामिल हैं।
इसके अलावा बायजाबाई सिंधिया कॉम्प्लेक्स और जवाहर मार्ग स्थित पाटनी बाजार की संपत्तियां भी विवाद के संदर्भ में सामने आई हैं।
इन संपत्तियों पर लंबे समय से किराएदारों के रहने और कारोबार करने के कारण ट्रस्ट और किराएदारों के बीच विवाद की स्थिति बनी हुई है।
अब हाईकोर्ट में क्या होगा?
मामला अब इंदौर हाईकोर्ट में है। ऐसे में विवाद का अगला चरण केवल किराएदारों को दुकान से हटाने तक सीमित नहीं रहेगा। ट्रस्ट की कानूनी स्थिति, ट्रस्टी की नियुक्ति, संपत्ति पर अधिकार और मुकदमा दायर करने के अधिकार से जुड़े दस्तावेज भी महत्वपूर्ण होंगे।
फिलहाल इन सवालों पर अंतिम स्थिति हाईकोर्ट की सुनवाई और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर ही स्पष्ट होगी। इसलिए ट्रस्ट की संपत्तियों के मालिकाना हक या किसी व्यक्ति की भूमिका को लेकर अंतिम निष्कर्ष अदालत के फैसले से पहले निकालना उचित नहीं होगा।
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