मुख्यमंत्री के लिए साबित हुई सेहतमंद: सियासत की चक्की में पिसी मूंग दाल ने बदले समीकरण
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मूंग खरीद के किसान आंदोलन से निकले फैसले से मध्य प्रदेश की सियासत में मुख्यमंत्री का प्रभुत्व और ज्यादा मजबूत हुआ है। मूंग खरीद की असल जिम्मेदारी केंद्रीय कृषिमंत्री की थी, लेकिन गेहूं की तरह ही मूंग के मामले में भी वे पलायन कर गए।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने तमाम चुनौतियों के बावजूद आंदोलनकारी किसानों की मांग मानकर उनके बीच अपनी व्यक्तिगत और राजनीतिक पैठ मजबूत कर ली।
राज्य से लेकर केंद्र तक मुख्यमंत्री के राजनीतिक और प्रशासनिक दांव-पेंच प्रदेश व केंद्र में बैठे राज्य के वरिष्ठ नेता-मंत्रियों पर भारी पड़ रहे हैं। गेहूं, सोयाबीन और अब मूंग की सरकारी खरीद के बाद मुख्यमंत्री के प्रति किसानों की सुहानुभूति और समर्थन बढ़ गया है। दतिया उपचुनाव के ठीक पहले किसानों के हित में हुआ यह फैसला मुख्यमंत्री के लिए फायदेमंद रहा।
किसानों के एक बड़े वर्ग को अपने साथ लाने में केंद्रीय कृषिमंत्री शिवराजसिंह चौहान जिस तेजी से किसानों के अभियान में लगे थे, उसे मूंग और गेहूं की सीमित खरीदी की नीति ने कमजोर किया है। सियासत के जानकार कह रहे हैं कि गेहूं में भी केंद्र ने समर्थन मूल्य पर सीमित मात्रा में ही खरीदी की नीति अख्तियार की थी। इससे मध्य प्रदेश के किसान नाराज हुए और आंदोलन किए। उसके बाद भी केंद्र ने मांग नहीं मानी।
आखिर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को प्रदेश की वित्तीय हालत कमजोर होने के बावजूद कठोर निर्णय करते हुए किसानों के हित में अतिरिक्त खरीदी का ऐलान करना पड़ा और अधिकतम खरीदी कर ली। इससे किसानों के मन की हो गई और मुख्यमंत्री के प्रति उनका समर्थन बढ़ गया।
मूंग में भी शिवराज ने 25% से अधिक की खरीदी समर्थन मूल्य पर करने से इनकार कर दिया और एक कड़ी चिट्ठी मुख्यमंत्री को लिख दी। इस चिट्ठी की नुक्ता-चीनी के बाद कहा जा रहा है कि शिवराज चाहते तो सोयाबीन की तरह दलहन मिशन में मूंग की खरीदी का प्रतिशत बढ़ा सकते थे।
केंद्र की दूसरी योजनाएं भी हैं, जिनमें अतिरिक्त खरीदी का प्रावधान है, लेकिन सलाहकारों ने शिवराज को शायद अंधेरे में रखा। हो सकता है उनकी राजनीति मुख्यमंत्री को उलझाने वाली रही हो, लेकिन मुख्यमंत्री ने इस संकट को भी अवसर में बदल दिया। उनके समर्थन में वे किसान भी आ गए, जो कांग्रेस समर्थित मूंग खरीदी आंदोलन से जुड़े थे।
शिवराज के लिए अतिरिक्त मूंग खरीदी इसलिए भी ज्यादा समस्या वाली नहीं थी, क्योंकि मूंग की फसल मात्र करीब 12 जिलों में ही है और दलहन मिशन में तो वैसे भी बड़ा बजट उपलब्ध है। शिवराज चाहते तो मध्य प्रदेश सरकार पर समर्थन मूल्य पर 35% मूंग खरीदी का वित्तीय बोझ नहीं आता।
कहा जा रहा है कि खेती-किसानी के दांव-पेंच मुख्यमंत्री को बार-बार पटखनी देने के लिए खेले जा रहे हैं, लेकिन इनसे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की राजनीति और ज्यादा मजबूत होती जा रही है। केंद्र सरकार ने गेहूं के बाद मूंग की खरीदी में जिस तरह से पलायन किया और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के भरोसे अतिरिक्त खरीदी छोड़ दी, उसे मुख्यमंत्री ने राजनीतिक चातुर्य से अपने पक्ष में कर लिया।
वह मूंग को देश-विदेश के बाजारों में खापा देंगे। जैसा कि भारतीय किसान संघ के प्रदेश अध्यक्ष कमलसिंह आंजना कहते हैं, गेहूं, मूंग या फिर सोयाबीन की समर्थन मूल्य पर खरीदी सरकार के लिए किसी भी तरह से घाटे का सौदा नहीं है। सरकार में बैठे अधिकारी और मंत्री समय पर सही निर्णय नहीं लेते, इस कारण फसल उत्पादन के भाव प्रभावित होते हैं और नुकसान किसानों का होता है, जिसके चलते आंदोलन होते हैं और सरकार, समाज व किसानों को बड़ी कीमत चुकाना पड़ती है।
इतनी-सी बात सरकारी सिस्टम को समझ में नहीं आती। केंद्र हो चाहे राज्य, स्थायी समाधान करना नहीं चाहते। मूंग खरीदी का उदाहरण देते हुए आप कहते हैं कि इससे पैसा किसानों को अधिक मिलेगा तो उतना ही अधिक पैसा बाजार में आएगा और अर्थव्यवस्था में सुधार होगा।
इकोनॉमी की इस छोटी-सी समझ को सरकार में बैठे नीति-निर्धारक, सलाहकार और अफसर क्यों नहीं समझ पाते? यह बात केंद्रीय कृषि मंत्रालय और वित्त मंत्रालय को भी समझ में नहीं आती। यही कारण है कि देश में किसानों का आक्रोश बार-बार सड़कों पर नजर आता है।
आंदोलन से बदलते सियासी मायने
मध्य प्रदेश में मूंग खरीदी को लेकर चला किसान आंदोलन अब केवल कृषि नीति का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि उसने भाजपा की आंतरिक राजनीति और केंद्र-राज्य के रिश्तों पर भी नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार द्वारा खरीदी की सीमा 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत करने का फैसला किसानों के लिए बड़ी राहत बना, लेकिन इसके राजनीतिक मायने इससे कहीं अधिक गहरे हैं।
दूसरी ओर, केंद्रीय कृषिमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने 29 जुलाई को मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर खरीद व्यवस्था पर अपना पक्ष रखा, लेकिन केंद्र की ओर से राष्ट्रीय स्तर पर खरीदी का कोटा बढ़ाने का कोई निर्णय सामने नहीं आया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे यह संदेश गया कि केंद्र ने अतिरिक्त वित्तीय दायित्व अपने ऊपर लेने के बजाय राज्य सरकार पर डाल दिया। परिणाम यह हुआ कि आर्थिक बोझ राज्य पर आया, लेकिन राजनीतिक श्रेय भी राज्य सरकार के खाते में दर्ज हो गया।
इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा के भीतर बदलते सत्ता संतुलन के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। एक ओर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय कृषिमंत्री शिवराजसिंह चौहान राष्ट्रीय स्तर की भूमिका में हैं, वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री यादव राज्य में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान और निर्णय क्षमता स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। सोयाबीन, गेहूं और अब मूंग खरीदी का फैसला इस दिशा में उनके लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक अवसर बन गया है।
इधर, राज्य सरकार ने कृषि उपज मंडियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) से जोड़ने की दिशा में भी बड़ा कदम उठाया है। निजी मंडियां, साइलो-वेयरहाउस और डीम्ड मंडियां भी अब ई-नाम प्लेटफॉर्म से जुड़ सकेंगी।
यदि यह व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो किसानों को देशभर के खरीदारों तक पहुंच मिलेगी, स्थानीय व्यापारियों पर निर्भरता घटेगी और भविष्य में फसलों के दाम अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकते हैं। हालांकि सबसे बड़ा सवाल अभी भी बना हुआ है कि यदि प्रदेश में मूंग का उत्पादन अनुमान से अधिक हुआ है, तो क्या भविष्य में उसकी पूरी खरीदी की जिम्मेदारी राज्यों पर ही रहेगी या केंद्र सरकार भी खरीद नीति में अधिक सक्रिय भूमिका निभाएगी?
फिलहाल इतना तय है कि इस पूरे प्रकरण ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को किसान हितैषी फैसले लेने वाले नेता के रूप में उभरने का अवसर दिया है, जबकि भाजपा के भीतर नेतृत्व और राजनीतिक प्रभाव को लेकर नई चर्चाओं को भी हवा दे दी है।
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