किया-धरा ठेकेदार का भरपाई कर रहा एनवीडीए: कंप्यूटराइज्ड की जगह पुराने खर्चीले तरीके से प्रोजेक्ट का संचालन
KHULASA FIRST
संवाददाता

स्काडा सिस्टम करवा दिया बंद? उपकरणों की सुरक्षा प्रभावित
सरकार के माथे... करोड़ों के बिजली बिल व लाखों लीटर पानी की बर्बादी
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्य प्रदेश की महत्वाकांक्षी नर्मदा-मालवा गंभीर लिंक सिंचाई परियोजना में आधुनिक तकनीक के उपयोग और रखरखाव को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। करीब 50 हजार हेक्टेयर कृषि क्षेत्र को सिंचाई सुविधा देने के उद्देश्य से विकसित इस परियोजना में वायरलेस स्काडा सिस्टम के माध्यम से केंद्रीय नियंत्रण कक्ष से पानी की निगरानी, मीटरिंग और वितरण की व्यवस्था की गई है।
परियोजना संचालन में इस सिस्टम का उपयोग अनिवार्य समझा जाता है, लेकिन जिस ठेकेदार कंपनी पॉवर लिंकर ने परियोजना मेंटेनेंस का ठेका लिया है, वह इस आधुनिक सिस्टम का उपयोग करने से बच रही है, क्योंकि इसके संचालन पर हर महीने 50 हजार रुपए से अधिक का खर्च होता है।
कहा जा रहा है इस खर्च को बचाने के प्रलोभन में ठेकेदार कंपनी के प्रबंधक परियोजना के आधुनिक सिस्टम को बंद करने में लगे हुए हैं और इस नियम विरुद्ध काम में उनके साथ नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के विवादास्पद कार्यकाल में यंत्री और अन्य जिम्मेदार अधिकारी दे रहे हैं। इस आधुनिक कंप्यूटराइज्ड सिस्टम से परियोजना का संचालन करने पर बिजली का खर्च कम होता है और पानी की बर्बादी भी नहीं होती।
बताया जा रहा है ठेकेदार कंपनी को उपकृत करने में लगे एनवीडीए के अधिकारी सरकार के खजाने से परियोजना के बिजली बिल पर करोड़ों रुपए का अतिरिक्त खर्च कर रहे हैं। हालत यह है कि पॉवर लिंकर कंपनी इस महत्वपूर्ण, संवेदनशील और कुछ वर्षों पूर्व निर्मित आधुनिक टेक्नोलॉजी पर आधारित परियोजना को हर तरह से बर्बाद करने में लगी है और सरकारी अधिकारी इस काम में उसका साथ देते दिखाई दे रहे हैं।
भारतीय मजदूर संघ का कहना है क्या वजह है कि 2023 के पहले इस प्रोजेक्ट का मेंटेनेंस करने वाली कंपनी सरकार की शर्तों अनुसार आधुनिक तरीके से संचालन कर रही थी तो अब पॉवर लिंकर जालसाजी व नियम विरुद्ध कार्य कैसे कर पा रही है? मामले में प्राधिकरण की ओर से क्या कार्रवाई की गई, इसकी जांच होना चाहिए।
पानी की लिफ्टिंग मैनुअली करने का आरोप... उल्लेखनीय है इस कंपनी के पहले नवयुग इंजीनियरिंग कंपनी की आधिकारिक जानकारी में भी स्काडा आधारित नियंत्रण प्रणाली और आउटलेट मैनेजमेंट का उल्लेख है, लेकिन परियोजना के रखरखाव को लेकर शिकायत करने वालों का आरोप है कि मेंटेनेंस का काम संभाल रही पॉवर लिंकर कंपनी द्वारा स्काडा सिस्टम का प्रभावी उपयोग नहीं किया जा रहा और पानी की लिफ्टिंग पुराने मैनुअल तरीके से की जा रही है।
यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो सवाल उठता है कि आधुनिक तकनीक से लैस इस परियोजना में कंप्यूटराइज निगरानी और नियंत्रण व्यवस्था का पूरा लाभ क्यों नहीं मिल रहा?
आधुनिक परियोजना, फिर मैनुअल संचालन क्यों?... नर्मदा-मालवा गंभीर लिंक परियोजना सामान्य नहर व्यवस्था नहीं, बल्कि दबावयुक्त पाइप लाइन नेटवर्क पर आधारित एक बड़ी लिफ्ट सिंचाई प्रणाली है।
निर्माण एजेंसी की जानकारी के अनुसार परियोजना में चार पंप हाउस हैं, जिनमें प्रत्येक में 3 मेगावॉट क्षमता के 9 पंप हैं। पूरी प्रणाली के लिए केंद्रीय नियंत्रण कक्ष से स्काडा के माध्यम से निगरानी, मीटरिंग और नियंत्रण की व्यवस्था विकसित की गई है।
इसके जरिये उपलब्ध सेंसर और मीटरों के आधार पर पानी का प्रवाह, पाइप लाइन का दबाव, पंपों की स्थिति और आउटलेट पर पानी की आपूर्ति देखी जा सकती है। सिस्टम की डिजाइन के अनुसार असामान्य स्थिति में अलर्ट मिलने से समय रहते तकनीकी कार्रवाई करना भी संभव होता है।
संचालन क्षमता प्रभावित होने का डर... जानकारों का कहना है यदि यह व्यवस्था निष्क्रिय है और पंपों को केवल स्थानीय या मैनुअल नियंत्रण से चलाया जा रहा है, तो परियोजना की निगरानी और संचालन क्षमता प्रभावित हो सकती है। स्काडा की वास्तविक वर्तमान स्थिति और पंपों के संचालन के तरीके की पुष्टि तकनीकी निरीक्षण से होना आवश्यक है।
स्वतंत्र तकनीकी जांच जरूरी
एनवीडीए से मांग की जानी चाहिए कि परियोजना के स्काडा कंट्रोल रूम, सेंसर, फ्लो मीटर, वायरलेस संचार व्यवस्था और आउटलेट मैनेजमेंट सिस्टम का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराया जाए।
साथ ही पंप संचालन के लॉग, बिजली खपत, पानी की आपूर्ति और लीकेज संबंधी रिकॉर्ड की तुलना की जाए। यह भी देखा जाए कि सिस्टम पूरी तरह बंद है, आंशिक रूप से काम कर रहा है या केवल कुछ नियंत्रण मैनुअल तरीके से किए जा रहे हैं।
बड़ा सवाल यह है कि जब 50 हजार हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई के लिए आधुनिक निगरानी और नियंत्रण प्रणाली बनाई गई है, तो उसका उपयोग निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुसार क्यों नहीं हो रहा? परियोजना प्रबंधन, एनवीडीए और मेंटेनेंस कंपनी को इस पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
बिजली खर्च और महंगे पंपों पर कितना असर?
लिफ्ट सिंचाई परियोजना में पानी को ऊंचाई तक पहुंचाने के लिए बड़ी क्षमता के मोटर-पंपों का इस्तेमाल होता है। ऐसे में बिजली की खपत परियोजना के संचालन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि पंपों का संचालन वास्तविक मांग, निर्धारित दबाव और आवश्यक प्रवाह के अनुरूप नहीं किया जाता, तो ऊर्जा का अनावश्यक उपयोग हो सकता है।
यदि संबंधित नियंत्रण और सेंसर स्थापित तथा चालू हों, तो पंपों के संचालन की निगरानी और असामान्य स्थितियों की पहचान स्काडा की मदद से की जा सकती है। इसके विपरीत निगरानी कमजोर होने पर खराबी का पता लगाने में देरी और संचालन संबंधी गलतियों का जोखिम बढ़ सकता है।
तीन साल के मेंटेनेंस टेंडर में जवाबदेही का सवाल भी है। ऐसे में संबंधित विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वर्तमान अनुबंध में स्काडा सिस्टम के संचालन, रखरखाव और तकनीकी निगरानी के लिए क्या शर्तें निर्धारित हैं। जांच में लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
पानी की बर्बादी और असमान वितरण की आशंका
स्काडा और आउटलेट मैनेजमेंट के प्रभावी उपयोग से विभिन्न क्षेत्रों में पानी के प्रवाह तथा आपूर्ति की निगरानी करने में मदद मिलती है। यदि मीटरिंग और निगरानी प्रभावी ढंग से नहीं हो रही है, तो पानी की वास्तविक मात्रा का हिसाब रखने और वितरण में गड़बड़ी पहचानने में कठिनाई हो सकती है।
परियोजना में संभावित लीकेज, अनियंत्रित प्रवाह और आउटलेट पर पानी के असमान वितरण की जांच इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका सीधा संबंध किसानों को मिलने वाली सिंचाई सुविधा से है।
यदि कहीं निर्धारित मात्रा से अधिक पानी निकलता है या पाइप लाइन में रिसाव होता है, तो उपलब्ध पानी का प्रभावी उपयोग प्रभावित हो सकता है। हालांकि केवल स्काडा बंद होने से पानी की बर्बादी स्वतः साबित नहीं होती। इसके लिए फ्लो मीटर की रीडिंग, आउटलेटवार आपूर्ति, दबाव के रिकॉर्ड और लीकेज निरीक्षण रिपोर्ट की जांच आवश्यक होगी।
ऐसी है पूरी परियोजना…
इस परियोजना के निर्माण की कुल लागत लगभग 2,187 करोड़ रुपए है।
50 हजार हेक्टेयर (लगभग 1.23 लाख एकड़) कृषि भूमि को सिंचाई की सुविधा प्रदान करती है।
इंदौर व उज्जैन जिलों के करीब 164 गांवों के किसानों को सीधे सिंचाई का पानी मिलता है।
आधुनिक तकनीक स्काडा से नर्मदा नदी के पानी को पंपों के जरिये 427 मीटर से अधिक की ऊंचाई तक लिफ्ट करके मालवा के पठार तक पहुंचाया गया है।
यह परियोजना पूरी तरह से एक भूमिगत दबावयुक्त पाइप लाइन नेटवर्क पर आधारित है। इसमें पारंपरिक खुली नहरों की तरह पानी बर्बाद नहीं होता। किसान सीधे 40 हेक्टेयर चक (माइक्रो लेवल) तक बिछी पाइप लाइन से अपने खेतों को जोड़कर ड्रिप या स्प्रिंकलर पद्धति से सिंचाई कर सकते हैं।
परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता इसका पूरी तरह भूमिगत पाइप लाइन नेटवर्क से संचालित होना है। इसमें आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल पानी लिफ्ट करने में किया गया है, जो बेहद महंगी तकनीक है।
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