एनएफएचएस रिपोर्ट 2026: आंकड़ों में सुधार, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी चिंताजनक; अधिकतर मामलों में ये ही आरोपी
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) 2026 की रिपोर्ट में मध्य प्रदेश में वैवाहिक हिंसा (Marital Violence) के मामलों में कुछ कमी दर्ज की गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले सर्वेक्षण की तुलना में राज्य में विवाहित महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा का प्रतिशत 28% से घटकर 21.4% हो गया है। यानी करीब 6.6 प्रतिशत अंकों की गिरावट दर्ज हुई है।
हालांकि, रिपोर्ट यह भी बताती है कि आंकड़ों में सुधार के बावजूद महिलाओं की सुरक्षा को लेकर स्थिति अब भी गंभीर बनी हुई है। घरेलू हिंसा झेलने वाली 90.8% विवाहित महिलाओं ने बताया कि उनके साथ सबसे अधिक हिंसा उनके पति ने ही की।
महिलाओं के लिए घर ही सबसे असुरक्षित
रिपोर्ट के अनुसार, 15 वर्ष की आयु के बाद हिंसा का सामना करने वाली अधिकांश विवाहित महिलाओं ने अपने ही घर में प्रताड़ना झेली। यह स्थिति इस बात की ओर संकेत करती है कि महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित माने जाने वाले पारिवारिक माहौल में ही हिंसा की घटनाएं सबसे अधिक हो रही हैं।
गर्भावस्था में भी जारी रहती है हिंसा
NFHS के आंकड़ों के मुताबिक, गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। पिछले सर्वेक्षण की तरह इस बार भी 2.3% गर्भवती महिलाओं ने घरेलू हिंसा का सामना करने की बात कही है। विशेषज्ञ इसे मां और गर्भस्थ शिशु, दोनों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता का विषय मानते हैं।
महिलाओं के साथ किस तरह की होती है हिंसा
रिपोर्ट में घरेलू हिंसा के विभिन्न स्वरूप भी सामने आए हैं। 25% पीड़ित महिलाओं को थप्पड़ मारे गए। 12% महिलाओं को धक्का दिया गया या उन पर वस्तुएं फेंकी गईं। करीब 7% मामलों में महिलाओं को मुक्के-लात मारकर जमीन पर घसीटा गया। लगभग 2% मामलों में गला घोंटने या जिंदा जलाने जैसी जानलेवा कोशिशों का भी उल्लेख किया गया।
मायके में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं
रिपोर्ट बताती है कि हिंसा केवल ससुराल तक सीमित नहीं है। कई महिलाओं और लड़कियों को मायके में भी शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है। 10.6% मामलों में मां या सौतेली मां जिम्मेदार पाई गईं। 8.5% मामलों में पिता या सौतेले पिता। 4.8% मामलों में भाई-बहन हिंसा के लिए जिम्मेदार पाए गए।
गांवों में स्थिति अधिक गंभीर
ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू हिंसा के मामले शहरी क्षेत्रों की तुलना में अधिक पाए गए। ग्रामीण क्षेत्र: 22.6% विवाहित महिलाओं ने घरेलू हिंसा की जानकारी दी। शहरी क्षेत्र में यह आंकड़ा 17.7% रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता, शिक्षा और सहायता तंत्र की कमी इसके प्रमुख कारणों में शामिल हो सकती है।
हर तीसरी महिला हिंसा को मानती है उचित
रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू सामाजिक सोच से जुड़ा है। 34% महिलाओं का मानना है कि कुछ परिस्थितियों में पति द्वारा पत्नी की पिटाई उचित हो सकती है। वहीं 28% पुरुषों ने भी इस सोच का समर्थन किया। यह दर्शाता है कि घरेलू हिंसा को समाज के एक वर्ग द्वारा अब भी सामान्य व्यवहार के रूप में स्वीकार किया जा रहा है।
शिक्षा के बावजूद नहीं बदल रही मानसिकता
रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षा का स्तर बढ़ने के बाद भी सोच में अपेक्षित बदलाव नहीं आया है। 12 वर्ष या उससे अधिक पढ़ी-लिखी 22% महिलाएं भी पति द्वारा हिंसा को कुछ परिस्थितियों में उचित मानती हैं। वहीं 20% शिक्षित पुरुष भी पत्नी के साथ मारपीट को सही ठहराते हैं।
केवल कानून नहीं, सोच बदलने की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू हिंसा जैसी गंभीर समस्या का समाधान केवल कानून और पुलिस कार्रवाई से संभव नहीं है। समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान, समानता और संवेदनशीलता की सोच विकसित करना जरूरी है। बच्चों, विशेषकर बेटों, को बचपन से ही महिलाओं के सम्मान और समान अधिकारों के मूल्य सिखाने की आवश्यकता है।
रिपोर्ट की प्रमुख बातें
वैवाहिक हिंसा का प्रतिशत: 28% से घटकर 21.4%
90.8% मामलों में पति ही हिंसा के आरोपी
गर्भावस्था के दौरान हिंसा: 2.3%
ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू हिंसा: 22.6%
शहरी क्षेत्रों में घरेलू हिंसा: 17.7%
34% महिलाएं और 28% पुरुष कुछ परिस्थितियों में पत्नी की पिटाई को उचित मानते हैं।
रिपोर्ट स्पष्ट संकेत देती है कि आंकड़ों में सुधार के बावजूद मध्य प्रदेश में घरेलू हिंसा अब भी एक गंभीर सामाजिक चुनौती बनी हुई है, जिसके समाधान के लिए कानून के साथ-साथ सामाजिक सोच में बदलाव भी जरूरी है।
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