नवरात्रि इंस्टेंट के दौर में तप, सौम्यता और शौर्य का महामंथन
KHULASA FIRST
संवाददाता

शॉर्टकट और वर्चुअल चकाचौंध के बीच जरूरी है ब्रह्मचारिणी का संयम और चंद्रघंटा का वैचारिक संतुलन
जब समाज में अन्याय हो रहा हो और आप विनम्रता की आड़ में मौन साध लें, तो वह सज्जनता नहीं, कायरता है। चंद्रघंटा सिखाती हैं कि मर्यादा पर आंच आए तो घंटे की तरह गरज उठिए।
राजकुमार जैन स्वतंत्र लेखक, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नवरात्रि केवल नौ रातों का पारंपरिक अनुष्ठान, उपवास की औपचारिकता या लाउडस्पीकर पर बजते भजनों के बीच डांडिया की थिरकन नहीं है। यह ऋतु-परिवर्तन के संधिकाल में मानव चेतना को भीतर से मथने का एक आध्यात्मिक और सामाजिक घोषणापत्र है।
पौराणिक आख्यानों में यह पर्व महिषासुर के आतंक पर आदिशक्ति के विजय-शंखनाद का प्रतीक है। इतिहास गवाह है कि जब-जब समाज में जड़ता, विलासिता और असुर प्रवृत्तियां हावी हुईं, तब-तब बिखरी हुई शक्तियों को एकजुट कर सामूहिक ऊर्जा का संधान किया गया।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने भी लंका विजय से पूर्व नौ दिनों तक इसी शक्ति की साधना की थी। यह किसी अलौकिक चमत्कार की प्रतीक्षा का उत्सव नहीं, बल्कि शून्य से महाशक्ति के सृजन का महापर्व है। विडंबना यह है कि हमने इस दर्शन को पंडालों के शोर और सोशल मीडिया की सजावट तक समेट दिया है, जबकि इसकी वास्तविक पुकार हमारे भीतर के विकारों को चीरने की है।
नौ रातों का यह क्रम वास्तव में मनुष्य के रूपांतरण की एक क्रमिक विकास-यात्रा है। प्रथम दिवस शैलपुत्री का संदेश है, पर्वतराज हिमालय की तरह अपने पैरों को धरातल पर जमाए रखना। देहत्याग के बाद सती ने आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना के लिए फिर से देह धरी।
वृषभ पर सवार यह स्वरूप स्पष्ट करता है कि बिना रीढ़ और बिना आत्मसम्मान के कोई साधना संभव नहीं। आज की युवा पीढ़ी यदि जरा सी विफलता पर बिखर जाती है, तो उसे शैलपुत्री से चट्टानी संकल्प सीखना होगा।
दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी का तप हमें तात्कालिक सुखों की बीमारी से आगाह करता है। नंगे पैर, हाथ में जपमाला लिए वर्षों तक सूखे पत्तों पर रहने वाली अपर्णा याद दिलाती हैं कि स्थायी सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। आज जब दो सेकंड की रील भी लंबी लगने लगी है, तब ब्रह्मचारिणी का मौन अनुशासन बताता है कि पसीना बहाए बिना जो मिलता है, वह रेत की दीवार की तरह ढह जाता है।
तीसरे दिन चंद्रघंटा का प्राकट्य मस्तक पर चंद्रमा की शीतलता और हाथों में संहारक अस्त्रों के साथ होता है। यह सौम्यता और शौर्य का दुर्लभ संतुलन है। जब समाज में अन्याय हो रहा हो और आप विनम्रता की आड़ में मौन साध लें, तो वह सज्जनता नहीं, कायरता है। चंद्रघंटा सिखाती हैं कि दिमाग में बर्फ जैसी ठंडक रखिए, लेकिन मर्यादा पर आंच आए तो घंटे की तरह गरज उठिए।
चौथे दिन कूष्मांडा का दर्शन उस अंधकार को चुनौती देता है जिसे हम आज अवसाद और भविष्य की चिंता कहते हैं। जब ब्रह्मांड में कुछ नहीं था, तब देवी ने केवल एक मंद मुस्कान से शून्य में सृष्टि रच दी। कूष्मांडा का संदेश साफ है, समस्याओं पर रोने के बजाय भीतर रचनात्मक ऊर्जा की लौ जलाइए; अभावों के बीच से भी सृजन का रास्ता निकल सकता है।
पांचवें दिन स्कंदमाता का मातृत्व नेतृत्व के अहंकार को धोता है। देवासुर संग्राम के सेनापति कार्तिकेय को गोद में थामे सिंहवाहिनी बताती हैं कि अपनी उपलब्धियों पर इतराने से बड़ा काम यह है कि आप अपने पीछे आने वाली पीढ़ी को कितना सक्षम बना रहे हैं। शक्ति का असली उपयोग दूसरों पर रौब गालिब करने में नहीं, उन्हें सहारा देने में है।
छठे दिन कात्यायनी का प्राकट्य सामूहिक शक्ति का सर्वोच्च दर्शन है। जब समस्त देवताओं ने अपने-अपने तेज का अंश मिलाया, तब महिषासुरमर्दिनी का जन्म हुआ। आज का समाज व्यक्तिवाद की अंधी दौड़ में बिखर चुका है। कात्यायनी सिखाती हैं कि बड़ी बुराइयों और व्यवस्थागत सड़ांध से अकेले नहीं लड़ा जा सकता; उसके लिए समान सोच वाले लोगों का निस्वार्थ संगठन और साझा प्रहार चाहिए।
सातवें दिन कालरात्रि का भयावह, श्यामवर्ण स्वरूप समाज के उस दोगलेपन पर तमाचा है जो केवल गोरे रंग और बाहरी चमक-दमक का दीवाना है। कालरात्रि बताती हैं कि सत्य हमेशा मीठा या सुहावना नहीं होता; कभी-कभी वह कड़वा और रौद्र भी होता है।
वे रक्तबीज का समूल नाश करती हैं। हमारे भीतर भी नकारात्मक विचारों, कुंठाओं और आलस्य का रक्तबीज पल रहा है, जो एक बहाने से सौ नई कमजोरियां पैदा करता है। कालरात्रि बनिए और अपने भीतर के अज्ञात भय को जड़ से मिटाइए।
आठवें दिन महागौरी की शुचिता का संदेश है। कठोर तप की कालिमा जब गंगाजल से धुलती है, तब महागौरी का निष्पाप श्वेत रूप प्रकट होता है। यह मन से प्रतिशोध, ईर्ष्या और अतीत के बोझ को उतार फेंकने की प्रेरणा है। जब तक अंतःकरण का मैल नहीं धुलेगा, तब तक बुद्धि निर्मल नहीं हो सकती।
नौवें दिन सिद्धिदात्री समस्त सिद्धियों, दक्षता और पूर्णता की अधिष्ठात्री बनकर आती हैं, जिनसे स्वयं महादेव ने शक्तियां प्राप्त कीं। किंतु सिद्धिदात्री की सबसे बड़ी सीख है, सर्वोच्च शिखर पर पहुंचकर भी जमीन से जुड़े रहना और विनम्र बने रहना।
आज थोड़ी सी डिग्री, पद या दौलत मिलते ही इंसान का अहंकार आसमान छूने लगता है। सिद्धिदात्री याद दिलाती हैं कि असली महारत वह है जो आपको सहज और लोक-कल्याणकारी बना दे। और अंत में आती है विजयादशमी, अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की अंतिम पताका।
रावण प्रकांड पंडित था, वेदों का ज्ञाता था और स्वर्ण लंका का स्वामी था; लेकिन चरित्र, मर्यादा और संयम के अभाव ने उसकी तमाम शक्तियों को भस्म कर दिया। मैदानों में बांस और पटाखों से बने रावण के पुतले फूंकना महज एक वार्षिक औपचारिकता है।
असली चुनौती अपने भीतर कुंडली मारकर बैठे काम, क्रोध, लोभ, ईर्षा और अहंकार के दस सिरों को पहचानने और उन्हें दग्ध करने की है। राम की विजय यही उद्घोष करती है कि साधन सीमित हों तब भी यदि चरित्र और सत्य आपके साथ हैं, तो विजय अंततः आपकी ही होगी।
नवरात्रि केवल देवी की मूर्तियों के आगे अगरबत्ती जलाने का पर्व नहीं है। यह अपने भीतर सोई हुई मनुष्यता को जगाने का नौ चरणीय आत्म-साधना क्रम है। शैलपुत्री का अडिग संकल्प, ब्रह्मचारिणी का संयम, चंद्रघंटा का संतुलन, कूष्मांडा की सृजनात्मक मुस्कान, स्कंदमाता का पोषण, कात्यायनी का संगठन, कालरात्रि की निर्भीकता, महागौरी की शुचिता और सिद्धिदात्री की विनम्रता।
यही एक समर्थ जीवन की संपूर्ण आचार संहिता है। अगर इन नौ दिनों के उपवास और पूजन के बाद भी हमारे व्यवहार मेंअहंकार कम नहीं हुआ, हमारी जुबान की कड़वाहट नहीं घटी और समाज के प्रति हमारी संवेदनशीलता नहीं जागी, तो मान लीजिए कि हमारी घट-स्थापना पूरी तरह व्यर्थ रही। उत्सव के सतही शोर से बाहर निकलिए, भीतर के महिषासुर से लड़िए और अपने आचरण से एक मजबूत, निर्भीक और सत्यनिष्ठ समाज की नींव रखिए।
आत्ममंथन की अनिवार्यता "घट-स्थापना केवल कलश और जौ तक सीमित नहीं"
नौ दिन का उपवास और पूजा तब तक निष्फल है, जब तक हमारे आचरण में बदलाव न आए। यदि व्रत के बाद भी मन का दंभ, वाणी की कटुता और दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति नहीं घटी, तो मान लीजिए कि घट-स्थापना केवल एक सामाजिक औपचारिकता बनकर रह गई।
सामूहिक शक्ति का दर्शन "सड़ांध से अकेले नहीं लड़ा जा सकता"
मां कात्यायनी का जन्म समस्त देवताओं के सम्मिलित तेज से हुआ था। आज का समाज व्यक्तिवाद और एकाकी आक्रोश में भटक रहा है। व्यवस्थागत कुरीतियों और अन्याय के विरुद्ध जब तक समान सोच वाले लोग संगठित होकर साझा प्रहार नहीं करेंगे, तब तक किसी महिषासुर का अंत संभव नहीं है।
मर्यादा बनाम अहंकार "पुतले फूंकने से पहले मन के रावण को पहचानें"
रावण प्रकांड विद्वान, वेदों का ज्ञाता और स्वर्ण लंका का स्वामी था; फिर भी चरित्र, मर्यादा और संयम के अभाव ने उसे भस्म कर दिया। मैदानों में पटाखों से भरा पुतला जलाना आसान है, कठिन काम अपने भीतर कुंडली मारकर बैठे दस विकारों को पहचानकर उनका दहन करना है।
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