जल संकट के बीच नर्मदा पाइप लाइन फोड़ी: बगीचे की जमीन पर अवैध निर्माण का आरोप
KHULASA FIRST
संवाददाता

वार्ड 14 की अंबिकापुरी मेन कॉलोनी में सरकारी जमीन पर कब्जे की शिकायत; निगम के रिकॉर्ड में भवन अनुमति नहीं, निर्माण रोकने का नोटिस जारी
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर एक ओर जल संकट की आशंका से जूझ रहा है, वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक नर्मदा पाइपलाइन को क्षतिग्रस्त कर कथित तौर पर निर्माण कार्य किए जाने के मामले का खुलासा हुआ है। वार्ड 14 की अंबिकापुरी मेन कॉलोनी में बगीचे की जमीन पर निर्माण को लेकर विवाद खड़ा हो गया है।
मामले में नगर निगम के आधिकारिक नोटिस ने भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। निगम के अनुसार संबंधित निर्माण की भवन अनुज्ञा और स्वीकृति से जुड़े दस्तावेज उसके रिकॉर्ड में नहीं मिले हैं। इसके बावजूद निर्माण होने और सार्वजनिक नर्मदा पाइपलाइन क्षतिग्रस्त होने का खुलासा हुआ है।
मामले को लेकर मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश प्रवक्ता एडवोकेट प्रमोद कुमार द्विवेदी ने भाजपा पदाधिकारी से जुड़े होने का आरोप लगाते हुए सरकारी जमीन पर कब्जे व अफसरों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।
निगम के नोटिस में क्या निकला?- नगर निगम के जोन क्रमांक 16 में 27 अक्टूबर के नोटिस में अंबिकापुरी मेन कॉलोनी में भूखंड क्रमांक 77 के पास निर्माणाधीन भवन के संबंध में हरिशंकर खंडेलवाल, धीरज खंडेलवाल, सुनील खंडेलवाल व अन्य लोगों से भूमि स्वामित्व व भवन अनुज्ञा के दस्तावेज मांगे हैं।
नोटिस के मुताबिक निगम के एबीपीएएस पोर्टल और संबंधित रिकॉर्ड की जांच में निर्माण की स्वीकृति और भवन अनुज्ञा से जुड़े दस्तावेज नहीं मिले। पूर्व में मौके पर निरीक्षण के दौरान भी वैध अनुमति के दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए जाने का उल्लेख किया गया है।
निगम ने निर्माण को अनधिकृत प्रतीत होने की बात कहते हुए तत्काल काम रोकने और सात दिन में वैध दस्तावेज पेश करने के निर्देश दिए हैं। संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर मध्यप्रदेश नगर पालिक निगम अधिनियम की धारा 307 तथा संबंधित भूमि विकास नियमों के तहत कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
जनप्रतिनिधि पहुंचे, फिर भी निर्माण क्यों नहीं रुका?- द्विवेदी ने बताया कि क्षेत्रीय पार्षद एवं महापौर परिषद सदस्य अश्विनी शुक्ला और जल समिति अध्यक्ष बबलू शर्मा भी मौके पर पहुंचे थे। इसके बावजूद उनके मुताबिक निर्माण कार्य तत्काल बंद नहीं कराया गया और निगम की कार्रवाई नोटिस जारी करने तक सीमित रही।
सवाल यह है कि जब मौके पर सार्वजनिक पाइपलाइन क्षतिग्रस्त होने और भवन अनुमति के दस्तावेज नहीं मिलने की बात का खुलासा हुआ, तो निगम ने निर्माण रोकने के निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए? क्या स्थल का दोबारा निरीक्षण किया गया? पाइपलाइन को हुए नुकसान की भरपाई किससे कराई जाएगी? और क्या कथित बगीचे की जमीन की सीमाओं तथा स्वामित्व की जांच होगी?
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देकर उठाए सवाल- द्विवेदी ने सार्वजनिक उपयोग की जमीनों से अतिक्रमण हटाने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी जमीनों की सुरक्षा में किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
उन्होंने भाजपा सरकार और नगर निगम से पूछा कि यदि सार्वजनिक बगीचे की जमीन पर अवैध निर्माण हुआ है, तो उसे हटाने के लिए ठोस कार्रवाई कब होगी? उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी जमीनों पर कथित कब्जों के मामलों में राजनीतिक संरक्षण और अधिकारियों की निष्क्रियता की शिकायतें सामने आती रही हैं। उनका कहना है कि केवल नोटिस जारी करना पर्याप्त नहीं है; निगम को जमीन की स्थिति स्पष्ट कर नियमानुसार कार्रवाई भी करनी चाहिए।
अब निगम की कार्रवाई पर निगाहें- इस पूरे मामले में तीन बिंदु अहम हैं—बगीचे की जमीन का वास्तविक स्वामित्व और भूमि उपयोग, निर्माण की वैध अनुमति तथा क्षतिग्रस्त नर्मदा पाइपलाइन की मरम्मत और जिम्मेदारी।
बगीचे की जमीन किसकी, निर्माण किस आधार पर?- द्विवेदी ने आरोप लगाया कि अंबिकापुरी मेन कॉलोनी के बगीचे की जमीन पर निजी निर्माण किया जा रहा है और इसे भाजपा के एक बड़े पदाधिकारी द्वारा खरीदे जाने की चर्चा है।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि जमीन सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित है तो उस पर निजी निर्माण किस आधार पर किया जा रहा है? जमीन के स्वामित्व, उपयोग की निर्धारित श्रेणी और निर्माण की वैधानिकता की जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
द्विवेदी के अनुसार, अंबिकापुरी एक्सटेंशन और अंबिकापुरी मेन कॉलोनी वर्ष 2014 में नगर निगम के दायरे में आई थीं। उनका दावा है कि यहां भवन नक्शे स्वीकृत नहीं होने के बावजूद निर्माण कार्य जारी हैं। अब बगीचे की जमीन और नर्मदा पाइपलाइन को लेकर सामने आया मामला निगम की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है।
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