भागवत के प्यारे मोहन: संघ के आयोजन से सरकार को मिली मजबूती
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का 28 अक्टूबर को इंदौर के डेली कॉलेज परिसर में आयोजित ‘चरैवेति-एकत्रीकरण’ संघ के शताब्दी वर्ष की गतिविधियों के समापन का महत्वपूर्ण कार्यक्रम था। संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत के नेतृत्व में यह आयोजन हुआ।
आयोजन के लिए मध्य प्रदेश का मालवा और मालवा का इंदौर केंद्र में रहा। इस दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव इंदौर में शहरी विकास से जुड़े अर्बन कॉन्क्लेव में शामिल हुए। इस सहयोग के राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं।
इ न घटनाक्रमों ने एक राजनीतिक सवाल खड़ा किया है कि क्या संघ का यह आयोजन केवल संगठनात्मक कार्यक्रम था या इसके व्यापक राजनीतिक संदेश भी थे? वैसे संघ राजनीति से कोसों दूर रहने का दावा करता है, लेकिन राजनीति के साथ उसका चोली-दामन का साथ रहा है और इस समय तो जब केंद्र और कई राज्यों में संघ की अपनी भाजपा की सरकार है, तो राजनीतिक चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।
लंबे समय से केंद्र सरकार और संघ के बीच खटपट की खबरें आती रही हैं, लेकिन अब लगता है कि युवाओं के आंदोलन और भाजपा के साथ भाजपा की सरकारों से बढ़ती जनता की नाराजगी के बाद केंद्र के सब लोग संघ के सर की शरण में फिर आ गए हैं।
संघ अपनी सरकारों को फिर से सुरक्षा कवच देने में लगा हुआ है। यह हाल ही के दिनों में संघ प्रमुख के उद्बोधनों से समझ में आ रहा है। इसी तरह देखें तो मालवा के इंदौर में हुआ यह आयोजन मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार को मजबूती दे गया है।
अभी तक संघ की गुड बुक में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ही माने जाते रहे हैं, लेकिन अब यह जगह मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने ले ली है, क्योंकि प्रदेश एक तरह से संघ की प्रयोगशाला बना हुआ है और मुख्यमंत्री संघ के हर एजेंट को प्रमुखता से लागू कर रहे हैं।
ऐसा माना जाता है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के लिए संघ बेक बोन बना हुआ है। यहां तक कहा जाता है कि सरकार में हर जगह संघ की मौजूदगी है। लंबे समय से चरणबद्ध तरीके से डेली कॉलेज को संघ के रंग में रंगने की कवायद इसी का हिस्सा है।
शताब्दी वर्ष का समापन कार्यक्रम इसका प्रत्यक्ष उदाहरण बताया जा रहा है। ऐसे में कहा जा सकता है कि संघ के इस आयोजन से मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार को परोक्ष मजबूती मिली है।
विश्लेषकों का कहना है कि इंदौर के डेली कॉलेज में हुआ यह आयोजन महज एक साधारण वार्षिक जलसा नहीं, बल्कि यह संघ का एक सुविचारित शक्ति परीक्षण और वैचारिक हुंकार है।
यह आयोजन एक ही साथ मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार को वैचारिक संबल प्रदान करता है, तो वहीं विरोधियों को सांगठनिक ताकत का अहसास भी कराता है।
सरकार को मजबूती देने का संदेश...मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के संदर्भ में इस आयोजन के खास मायने हैं-
सरकार और संगठन के बीच तालमेल: मध्य प्रदेश में राजनीतिक नेतृत्व में हुए बदलाव के बाद संघ और सरकार के बीच वैचारिक समन्वय को और अधिक प्रगाढ़ करना इस आयोजन का एक उद्देश्य हो सकता है।
क्षेत्रीय और राजनीतिक संतुलन: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव खुद उज्जैन (मालवा क्षेत्र) से आते हैं। ऐसे में मालवा में संघ का यह महाआयोजन राज्य सरकार और मुख्यमंत्री के प्रशासनिक व राजनीतिक रसूख को वैचारिक पीठ थपथपाहट देने के रूप में देखा जा रहा है, ताकि विपक्ष को यह कड़ा संदेश जाए कि सरकार और संगठन पूरी तरह एकजुट और मजबूत हैं।
विपक्ष और राष्ट्रीय स्तर के लिए भी संकेत... यह आयोजन केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके राष्ट्रीय राजनीतिक निहितार्थ भी हैं-
चुनावी राज्यों और वैचारिक एकजुटता का संदेश... देश के विरोधी दलों और विपक्ष को यह करारा जवाब है कि धरातल पर संघ का कैडर और उसका जन आधार पूरी तरह सक्रिय और अनुशासित है।
इंदौर में ही आयोजन क्यों
सवाल यह उठ रहा है कि जब देश में अनगिनत अन्य राज्य या शहर मौजूद हैं और जब मालवा में संघ की जड़ें पहले से ही बेहद मजबूत हैं, तब संघ ने इंदौर को ही इस बड़े आयोजन का केंद्र क्यों बनाया? क्या यह आयोजन डॉ. मोहन यादव सरकार को मजबूती देने के लिए है, या फिर इसके पीछे कोई बड़ा राष्ट्रीय और राजनीतिक संदेश छिपा है? मालवा में संघ का वैचारिक और राजनीतिक एवं सामाजिक नेटवर्क लंबे समय से मजबूत है।
मालवा का गढ़ मजबूत होने के बावजूद रणनीतिक अहमियत... राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संघ की कार्यपद्धति में ‘मजबूत गढ़’ का मतलब आत्मसंतुष्टि नहीं, बल्कि उसे और अधिक धार देना होता है।
शहरी शक्ति और वैचारिक प्रयोगशाला : इंदौर मध्य प्रदेश का वैचारिक, व्यावसायिक और वैविध्यपूर्ण केंद्र है। मालवा क्षेत्र से पूरे मध्य प्रदेश और आसपास के राज्यों की राजनीति तय होती है।
बड़े आयोजनों की प्रशासनिक क्षमता : एक लाख से अधिक स्वयंसेवकों को अनुशासित तरीके से जुटाना, उनके ठहरने, पार्किंग और सुरक्षा की व्यवस्था करना आदि जैसे बड़े दावे करना और फिर उसको क्रियान्वित करने के लिए इंदौर जैसी सुव्यवस्थित व्यवस्था वाला शहर ही उपयुक्त बैठता है। संसाधनों के लिए सरकार का पूरा सहयोग की आसानी से मिलता रहता है।
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