मां चंद्रघंटा का संदेश: सौम्यता और शौर्य का संतुलन ही बनाता है मजबूत व्यक्तित्व
KHULASA FIRST
संवाददाता

शारदीय नवरात्रि: तृतीय दिवस
राजकुमार जैन स्वतंत्र लेखक खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
आज के दौर में क्रोध, मानसिक बेचैनी और भावनात्मक असंतुलन युवाओं की बड़ी समस्याएं बन चुकी हैं। सोशल मीडिया पर मामूली बातों पर ट्रोलिंग, बात-बात पर चिढ़ जाना और जरा-सी प्रतिकूल परिस्थिति में आपा खो देना आम होता जा रहा है।
कई बार हम मान लेते हैं कि शांत रहने का अर्थ कमजोर होना है या अपनी पहचान साबित करने के लिए आक्रामक होना जरूरी है। नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा हमें सिखाती है कि मन में चंद्रमा जैसी शीतलता और आवश्यकता पड़ने पर घंटे की गर्जना जैसा शौर्य-इन दोनों का संतुलन ही जीवन की वास्तविक शक्ति है।
मां दुर्गा का तीसरा स्वरूप मां चंद्रघंटा का है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, इसी कारण इन्हें ‘चंद्रघंटा’ कहा जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान शिव अपने औघड़ रूप और विचित्र गणों के साथ विवाह के लिए राजा हिमवान के महल पहुंचे, तो माता मैना भयभीत होकर अचेत हो गईं।
परिजनों को संबल देने और मर्यादा की रक्षा के लिए देवी पार्वती ने तत्काल एक अद्भुत, सौम्य और शांत रूप धारण किया, जिसके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित था।
उनकी स्तुति में कहा गया है—
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघंटेति विश्रुता॥
मां चंद्रघंटा का वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला है और वे सिंह अथवा व्याघ्र पर आरूढ़ हैं। उनकी दस भुजाओं में त्रिशूल, गदा, तलवार और बाण आदि अस्त्रों के साथ अभय और वरद मुद्राएं भी हैं।
मस्तक पर विराजमान अर्धचंद्र मानसिक शांति और शीतलता का प्रतीक है, जबकि घंटे की ध्वनि बुराई और नकारात्मकता को दूर कर साधकों में सजगता और साहस का संचार करती है। सिंह की सवारी यह संदेश देती है कि अपार शक्ति को भी अनुशासन और धैर्य के अधीन रखना चाहिए।
युवाओं के लिए मां चंद्रघंटा की तीन महत्वपूर्ण सीख
1. भावनात्मक संतुलन साधें, तुरंत प्रतिक्रिया देने से बचें: अक्सर युवा उत्तेजना या क्रोध में ऐसे निर्णय ले लेते हैं अथवा ऑनलाइन ऐसी बातें लिख बैठते हैं, जिनका बाद में उन्हें पछतावा होता है। मां चंद्रघंटा के मस्तक पर सुशोभित अर्धचंद्र सिखाता है कि तनावपूर्ण माहौल में भी अपने मन को शांत रखना चाहिए। समझदार वह नहीं, जो हर बात पर तुरंत भड़क जाए, बल्कि वह है, जो हर परिस्थिति में सोच-समझकर विवेकपूर्ण प्रतिक्रिया दे।
2. सौम्यता कमजोरी नहीं, समय आने पर मुखर होना भी सीखें: समाज में अक्सर सीधे और विनम्र स्वभाव वाले व्यक्ति को कमजोर समझ लिया जाता है। मां चंद्रघंटा का स्वरूप बताता है कि शालीन होना कायरता नहीं है।
लेकिन जब बात आत्मसम्मान, मर्यादा या किसी के साथ हो रहे अन्याय की हो, तो मौन रहने के बजाय घंटे की तरह मुखर होकर सही बात के पक्ष में खड़े होने का साहस भी होना चाहिए।
3. मन के डर को दूर करें और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें: असफलता का डर, दूसरों की राय का भय और स्वयं पर अविश्वास युवाओं को अपनी क्षमता का पूरा उपयोग करने से रोकते हैं। मां चंद्रघंटा के अस्त्र और घंटे की ध्वनि नकारात्मक विचारों तथा अज्ञात भय पर विजय पाने की प्रेरणा देते हैं। अपने भीतर के संकोच को दूर करें और चुनौतियों का सामना निडर होकर करें।
शोरगुल के बीच अपने भीतर की शांति बनाए रखें: आज डिजिटल दुनिया में हर ओर वैचारिक टकराव, विवाद और नकारात्मकता का शोर है। इस माहौल में अपने मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करना बड़ी चुनौती बन गया है।
इंटरनेट और सोशल मीडिया का उपयोग ज्ञान, कौशल और सकारात्मक संवाद के लिए करें, न कि व्यर्थ की बहसों में अपनी ऊर्जा और मानसिक शांति गंवाने के लिए। जब तक मन शांत नहीं होगा, तब तक किसी बड़े लक्ष्य को हासिल करना कठिन होगा।
इस नवरात्रि के तृतीय दिवस संकल्प लें कि हम अनावश्यक क्रोध और आक्रामकता से दूर रहेंगे। अपने स्वभाव में चंद्रमा जैसी शीतलता और विनम्रता बनाए रखेंगे, लेकिन अन्याय या गलत बात के सामने झुकने के बजाय निर्भीकता और गरिमा के साथ घंटे जैसी गूंजती आवाज में सत्य का साथ देंगे।
क्योंकि वास्तविक विजेता वही है, जो शांति के समय सौम्य रहे और कठिन परिस्थितियों में शौर्य का परिचय देते हुए संतुलन बनाए रखे।
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