शोरूम विवाद मामले में बड़ा फैसला: इन पुलिस अधिकारियों को मिली राहत
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के बेटे मिलिंद महाजन के ऑटोमोबाइल शोरूम पर हुए हमले और तोड़फोड़ के मामले में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ दायर परिवाद पर जिला न्यायालय ने फैसला सुनाया है।
परिवाद को खारिज कर दिया
विशेष एससी-एसटी न्यायालय ने सफाई कर्मचारी आयोग के अध्यक्ष प्रताप करोसिया के परिवाद को खारिज कर दिया। इसके साथ ही पुलिस आयुक्त संतोष कुमार सिंह, तत्कालीन डीसीपी विनोद मीणा, एसीपी आशीष पटेल, आजादनगर थाना प्रभारी नीरज मेढ़ा सहित अन्य संबंधित लोगों को इस परिवाद में राहत मिली है।
एफआईआर दर्ज की गई थी
मामला 6 दिसंबर 2024 को मिलिंद महाजन के ऑटो शोरूम एवं सर्विस सेंटर मिडवेस्ट ऑटोमोबाइल प्राइवेट लिमिटेड में हुई तोड़फोड़ से जुड़ा है। घटना के बाद प्रताप करोसिया के रिश्तेदार सौरभ करोसिया और अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।
मामला बढ़ने के बाद आरोपियों के खिलाफ कठोर धाराएं जोड़ी गईं और उनका जुलूस भी निकाला गया। इसी कार्रवाई को लेकर प्रताप करोसिया ने पुलिस अधिकारियों और अन्य संबंधित लोगों के खिलाफ न्यायालय में परिवाद दायर किया था।
पुलिस अधिकारियों पर लगाए थे गंभीर आरोप
करोसिया ने अपने परिवाद में आरोप लगाया था कि टैंकर की सर्विसिंग के लिए उनसे अनुचित राशि मांगी गई, जबकि वाहन गारंटी अवधि में था। उन्होंने बंधक बनाने, जातिसूचक शब्द कहने और गाली-गलौज करने के आरोप भी लगाए थे।
इसके अलावा उनका आरोप था कि 9 दिसंबर 2024 को करीब 300 लोगों ने पुलिस आयुक्त से मुलाकात कर आरोपियों का जुलूस निकालने और उन पर कठोर धाराएं लगाने की मांग की थी। करोसिया ने दावा किया था कि बाद में गिरफ्तारी के बाद उन्हें हथकड़ी लगाकर शोरूम ले जाया गया और उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया।
इन आरोपों के आधार पर करोसिया ने पुलिस आयुक्त संतोष सिंह, तत्कालीन डीसीपी विनोद मीणा, एसीपी आशीष पटेल, टीआई नीरज मेढ़ा, पुलिसकर्मियों जावेद खान, कृष्णा पटेल और प्रदीप पटेल के साथ शोरूम मैनेजर भूषण तथा सुमित्रा महाजन के पोते सिद्धार्थ महाजन के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज करने की मांग की थी।
बयानों में अंतर को कोर्ट ने माना अहम
मामले की सुनवाई के दौरान विशेष एससी-एसटी न्यायालय ने करोसिया के कथनों, पुलिस प्रतिवेदन और उपलब्ध अन्य तथ्यों पर विचार किया। न्यायालय के समक्ष यह बात आई कि करोसिया के परिवाद और उनके बयान में अंतर था। उपलब्ध विवरण के अनुसार, बयान में कमोड से मूत्र पिलाने, जातिसूचक शब्द कहने और बंधक बनाने जैसे आरोपों का उल्लेख नहीं था, जबकि परिवाद में इनका जिक्र किया गया था।
हथकड़ी लगाए जाने के आरोप पर भी न्यायालय ने संबंधित परिस्थितियों पर विचार किया। अदालत के अनुसार, करोसिया के खिलाफ विभिन्न थानों में मामले दर्ज होने के मद्देनजर पुलिस कार्रवाई को गलत नहीं माना जा सकता था। इन तथ्यों और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर न्यायालय ने परिवाद खारिज कर दिया। इस फैसले से पुलिस अधिकारियों के खिलाफ करोसिया की ओर से दायर इस परिवाद पर न्यायिक कार्यवाही समाप्त हो गई।
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