करोड़ों के बिल घोटालों में अब इन पर भी कस सकता है शिकंजा: अनेक वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका भी ईडी की जांच के घेरे में; पहले ही हो चुके हैं कई महत्वपूर्ण खुलासे
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इंदौर नगर निगम के बहुचर्चित 150 करोड़ रुपए के फर्जी बिल घोटाले में अब बड़े अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा मुख्य आरोपी और निगम के इंजीनियर अभय राठौर समेत दो ठेकेदारों को रिमांड पर लेने के बाद जांच का दायरा और व्यापक होने की संभावना जताई जा रही है। सूत्रों के अनुसार पूछताछ के दौरान कई वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका भी जांच एजेंसी के राडार पर आ सकती है।
जांच पहले ही कई अहम खुलासे कर चुकी
साल 2024 में सामने आए इस घोटाले की जांच पहले ही कई अहम खुलासे कर चुकी है। अब तक ED को करीब 92 करोड़ रुपए की कथित वित्तीय अनियमितताओं के दस्तावेजी साक्ष्य मिल चुके हैं। इसी आधार पर एजेंसी ने कार्रवाई तेज कर दी है।
अभय राठौर और दो ठेकेदार रिमांड पर
ED ने नगर निगम के इंजीनियर और कथित मास्टरमाइंड अभय राठौर के साथ ठेकेदार राहुल बडेरा और मोहम्मद जाकिर को तीन दिन की रिमांड पर लिया है। एजेंसी इनसे घोटाले में हुए भुगतान, फर्जी कंपनियों, संपत्तियों की खरीद और कथित लाभार्थियों के संबंध में पूछताछ कर रही है। जांच एजेंसी को उम्मीद है कि रिमांड के दौरान मिले इनपुट से घोटाले के पीछे मौजूद पूरे नेटवर्क का खुलासा हो सकता है।
PMLA के तहत बयान बन सकते हैं अहम साक्ष्य
मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि यह जांच धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत की जा रही है। इस कानून के अंतर्गत जांच के दौरान दर्ज किए गए बयान महत्वपूर्ण साक्ष्य माने जाते हैं।
जिम्मेदार लोगों की भूमिका का उल्लेख
सूत्रों के अनुसार अभय राठौर पहले भी विभिन्न न्यायालयों में दाखिल शपथपत्रों और अपने बयानों में कई वरिष्ठ अधिकारियों तथा उच्च स्तर पर बैठे जिम्मेदार लोगों की भूमिका का उल्लेख कर चुका है। ऐसे में माना जा रहा है कि ED की पूछताछ में भी वह कई बड़े नामों का जिक्र कर सकता है।
सीवरेज और ड्रेनेज विभाग के अधिकारी राडार पर
जांच से जुड़े सूत्रों का कहना है कि नगर निगम के सीवरेज और ड्रेनेज विभाग से संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर विशेष नजर रखी जा रही है। घोटाले से जुड़ी अधिकांश फाइलें इन्हीं विभागों से संबंधित बताई जा रही हैं।
कई फाइलों पर वरिष्ठ अधिकारियों के हस्ताक्षर
अभय राठौर पहले भी दावा कर चुका है कि कई फाइलों पर वरिष्ठ अधिकारियों के हस्ताक्षर मौजूद हैं और भुगतान की प्रक्रिया विभिन्न स्तरों से मंजूर हुई थी। ऐसे में ED इन फाइलों और अनुमोदन प्रक्रिया की गहन जांच कर सकती है। हालांकि दूसरी ओर कुछ ठेकेदारों ने अपने बयानों में अभय राठौर को ही पूरे घोटाले का मुख्य जिम्मेदार बताया है। ऐसे में जांच एजेंसी दोनों पक्षों के दावों का परीक्षण कर रही है।
43 संपत्तियां पहले ही हो चुकी हैं अटैच
ED इस मामले में पहले भी बड़ी कार्रवाई कर चुकी है। बीते वर्ष एजेंसी ने करीब 20 ठिकानों पर छापेमारी की थी। जांच के दौरान मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में स्थित आरोपियों की 43 संपत्तियां अटैच की गई थीं, जिनकी कुल अनुमानित कीमत करीब 34 करोड़ रुपए बताई गई है। जांच एजेंसी का दावा है कि इन संपत्तियों का संबंध कथित घोटाले से अर्जित धन से है।
ऐसे खुला था घोटाले का मामला
घोटाले का खुलासा तब हुआ जब तत्कालीन निगमायुक्त हर्षिका सिंह को कुछ भुगतान फाइलों में अनियमितताएं दिखाई दीं। प्रारंभिक जांच में पता चला कि कुछ कंपनियों के नाम पर भुगतान की प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी, जबकि संबंधित कार्यों के निष्पादन को लेकर गंभीर सवाल थे।
फाइलों के गायब होने और चोरी होने की शिकायत
जांच के दौरान कुछ महत्वपूर्ण फाइलों के गायब होने और चोरी होने की शिकायत भी दर्ज कराई गई थी। इसके बाद मामले की परतें खुलती गईं और कई कंपनियों को किए गए भुगतान संदिग्ध पाए गए। मामले की गंभीरता को देखते हुए शासन स्तर पर जांच समिति भी गठित की गई थी, लेकिन उसकी रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है।
आगे क्या?
ED की मौजूदा कार्रवाई के बाद अब निगाहें अभय राठौर और अन्य आरोपियों से हो रही पूछताछ पर टिकी हैं। यदि पूछताछ में नए नाम सामने आते हैं तो जांच का दायरा और बढ़ सकता है। ऐसे में नगर निगम के कई वर्तमान और पूर्व अधिकारियों की भूमिका भी जांच एजेंसी के दायरे में आ सकती है।
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