आस्था का हरिद्वार: जहां महादेव के थके चरणों के लिए बिछ गया बैकुंठ का वैभव
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संवाददाता

हेमंत उपाध्याय99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
अमरनाथ यात्रा मार्ग का वह रहस्य, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं; पिस्सू टॉप की चढ़ाई से पहले ‘हरा चमत्कार’, पत्थरों के बीच कैसे लहलहा रही है देव-दूब? प्रकृति का अद्भुत विस्मय देता है शिव और विष्णु की परम एकात्मकता का संदेश।
अ मरनाथ यात्रा केवल शारीरिक सहनशक्ति की कठिन परीक्षा नहीं, बल्कि पग-पग पर बिखरे अध्यात्म और विस्मयकारी रहस्यों से साक्षात्कार का एक पावन माध्यम है। इस बेहद कठिन और पथरीले यात्रा मार्ग पर एक ऐसा गुप्त कोना भी है, जो सृष्टि के दो महानायकों यानी हरि (भगवान विष्णु) और हर (भगवान शिव) के अटूट प्रेम का जीवंत गवाह है।
इस स्थान को स्थानीय परंपराओं में ‘हरिपथ’ या ‘हरि-प्रतिष्ठा’ के नाम से पुकारा जाता है। आखिर दुर्गम चढ़ाइयों के बीच बसा यह अछूता स्थान क्या है, इसकी पौराणिक पृष्ठभूमि क्या है और क्यों यह वैज्ञानिकों के लिए भी कौतूहल का विषय बना हुआ है।
चंदनवाड़ी से आगे का वह अछूता कोण... जब अमरनाथ यात्री अपनी यात्रा के पहले पड़ाव चंदनवाड़ी से आगे की बेहद कठिन और खड़ी चढ़ाई चढ़ते हैं, तो उनकी सांसें फूलने लगती हैं। पिस्सू टॉप की ओर बढ़ते इन थका देने वाले पथरीले रास्तों के बीच अचानक एक छोटा सा, शांत और समतल पथरीला मैदानी भाग दिखाई देता है।
चारों तरफ फैली सूखी, ठंडी और पथरीली चट्टानों के बीच यह हरी-भरी पट्टी बिल्कुल अलग और चमत्कारी दिखाई देती है। इसी हिस्से को हरिपथ कहा जाता है। विडंबना यह है कि पिस्सू टॉप की चढ़ाई जल्द से जल्द पार करने की होड़ में अधिकांश श्रद्धालु इस चमत्कारी स्थल के महत्व को जाने बिना ही आगे बढ़ जाते हैं।
जब महादेव की थकान मिटाने बैकुंठ छोड़ आए नारायण: क्या है पौराणिक कथा?... इस अनूठे पथरीले मैदान के पीछे एक बेहद भावुक और सुंदर पौराणिक प्रसंग छिपा है।
अमरकथा का सफर और त्याग... जनश्रुतियों के अनुसार, जब देवाधिदेव महादेव माता पार्वती को अमरत्व का गुप्त रहस्य सुनाने के लिए अमरनाथ गुफा की ओर प्रस्थान कर रहे थे, तब वे पूर्ण एकांत चाहते थे। इसी परम एकांत को सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने राह में अपने आभूषण, सिर पर विराजमान चंद्रमा, नंदी और यहां तक कि जटाओं में रहने वाली मां गंगा तक का त्याग कर दिया था।
नारायण की व्याकुलता... इस भीषण ठंड, पथरीली राह और अत्यंत दुर्गम हिमालयी मार्ग पर नंगे पैर चलते हुए जब महादेव के चरणों में थकान के लक्षण दिखाई देने लगे, तो बैकुंठ में बैठे भगवान विष्णु व्याकुल हो उठे। वे अपने आराध्य शिव को इस कठोर मार्ग पर कष्ट पाते नहीं देख सकते थे।
दूब का बिछौना... शिव की थकान को तत्क्षण मिटाने के लिए नारायण ने अपनी योगमाया का उपयोग किया। उन्होंने इस कठोर, बर्फीले और कंकरीले मार्ग के एक हिस्से पर पल भर के लिए मखमली और कोमल हरी दूब (घास) बिछा दी।
जैसे ही महादेव के चरण इस शीतल दूब पर पड़े, उनकी सारी थकान हवा हो गई। नारायण के इस परम प्रेम से गदगद होकर महादेव ने इस स्थान को विशेष आशीर्वाद दिया, जिसके बाद यह हरिपथ के रूप में अमर हो गया।
सूखी बर्फीली चट्टानों के बीच ‘हरा विस्मय’: क्या कहता है विज्ञान?
समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर, जहां पेड़-पौधे उगना बंद हो जाते हैं और ऑक्सीजन का स्तर बेहद कम होता है, वहां हरी घास और औषधीय वनस्पतियों का लहलहाना किसी चमत्कार से कम नहीं है। वैज्ञानिक और स्थानीय शोधकर्ता भी इस पर चकित हैं।
दुर्लभ वनस्पति और जड़ी-बूटियां... हरिपथ के इस सीमित हिस्से में उगने वाली जड़ी-बूटियां और घास आसपास के पूरे हिमालयी क्षेत्र की वनस्पतियों से बिल्कुल भिन्न हैं।
औषधीय गुणों की भरमार...आयुर्वेद के जानकारों का मानना है कि इस पैच की मिट्टी में कुछ ऐसे दुर्लभ खनिज मौजूद हैं, जो अत्यधिक ठंड के बावजूद इसे उपजाऊ बनाए रखते हैं। यहां उगने वाले पौधों में उच्च स्तर के औषधीय गुण पाए जाते हैं।
प्राकृतिक एयर-कंडिशनर...इस स्थान पर पहुंचते ही यात्रियों को एक अलौकिक ठंडक और मानसिक शांति का अहसास होता है। यह जादुई अहसास पिस्सू टॉप की चढ़ाई से ठीक पहले यात्रियों में नई ऊर्जा भर देता है।
हरि-हर की एकात्मकता का जीवंत प्रतीक... आज के दौर में जहां संप्रदायों और मतों को लेकर समाज में टकराव देखने को मिलता है, वहीं हरिपथ यह संदेश देता है कि हरि (विष्णु) और हर (शिव) वास्तव में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
शास्त्रों में भी कहा गया है- शिव ही विष्णु का रूप हैं और विष्णु ही शिव का रूप हैं। शिव के हृदय में विष्णु का वास है और विष्णु के हृदय में शिव विराजमान हैं। हरिपथ इसी अद्वैत सत्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है, जहां एक ईश्वर ने दूसरे ईश्वर के स्वागत में खुद को बिछा दिया।
यदि आप इस वर्ष या भविष्य में कभी अमरनाथ यात्रा पर जाने का मन बना रहे हैं, तो चंदनवाड़ी और पिस्सू टॉप के बीच इस छोटे से मखमली मैदान हरिपथ पर कुछ पल रुकना न भूलें।
वहां की हवा में बहने वाली दिव्य शांति को महसूस करें, उस अनूठी हरी दूब को नमन करें और सोचें जहां खुद विष्णु ने कदम बिछाए हों, वहां आपकी यात्रा की थकान भला कैसे नहीं मिटेगी।
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